बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

चमकीले पत्ते


​चमकदार पत्ता, गौरों का गुमान और दलदली नाले का नया राजा

​सुंदरवन एक खूबसूरत जंगल था,अरावली पहाड़ियों से लग कर जो  अपनी शांति और ज्ञान के लिए जाना जाता था। लेकिन जब से 'चंपक' नाम की चालाक लोमड़ी ने जंगल का प्रशासन संभाला, सब कुछ बदल गया। चंपक ने जंगल के हर जानवर को एक 'चमकदार पत्ता' बाँट दिया।

​चंपक ने घोषणा की, "इस पत्ते में पूरा जंगल बसा है। इसे देखो, अपना मनोरंजन करो और जानो कि दुनिया में क्या हो रहा है।"

​लेकिन इस चमकदार पत्ते ने जानवरों को अंदर से दुखी और डरा हुआ बना दिया। बंदर दूसरे पेड़ों के रसीले आमों की तस्वीरें देखकर हीन भावना से भरे रहते। हिरणों के झुंड में हर आधे घंटे में अफवाह फैलती कि पड़ोसी जंगल के भेड़िये हमला करने वाले हैं, जिससे वे दिन भर झाड़ियों में काँपते रहते। 'पंडित उल्लू' दिन-रात अपने पत्ते पर झूठी खबरों के स्क्रीनशॉट रटता और चिल्लाता, "जो जितना शोर मचाएगा, वही सबसे बड़ा विद्वान कहलाएगा!"

​'शेर बहादुर', जो जंगल का बूढ़ा राजा था, लाचार हो चुका था। उसका काम बस इतना बचा था कि वह दिन में दो बार मंच पर आकर एक भयानक दहाड़ मारे, ताकि जानवरों को लगे कि पुराना शासन अभी भी कायम है।

​गौरों का अहंकार और 'विरोध की राजनीति'

​इस शासन के खिलाफ जंगल में एक मजबूत विरोधी ताकत मौजूद थी—'भारतीय गौर' (विशाल जंगली भैंसे) का झुंड।

​गौरों को इस बात का बहुत बड़ा गुमान था कि उनके पूर्वजों ने अपनी सींगों से जमीन खोद-खोदकर यह जंगल, इसके रास्ते और सीमाएँ बनाई थीं। वे हमेशा गर्व से रंभाते, "यह जंगल हमारे पुरखों के खून-पसीने और सींगों की देन है! सदियों तक हमारे पूर्वजों ने यहाँ राज किया है, इसलिए इस जंगल के असली वारिस हम ही हैं।"

​लेकिन समय के साथ गौरों का प्रभाव खत्म हो चुका था। अब उनका काम सिर्फ 'विरोध के लिए विरोध' करना रह गया था। वे खुद को क्रांति और बदलाव का सबसे बड़ा झंडाबरदार (वामपंथी विचारक) मानते थे। चंपक लोमड़ी कोई भी योजना लाती, गौर झुंड बनाकर विरोध में रंभाने लगते। लेकिन उनके पास कोई ठोस समाधान नहीं था—वे केवल पुरानी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की बयानबाजी करते थे।

​तिलचट्टों का षड्यंत्र और अवसरवादी गठबंधन

​दूसरी तरफ, जंगल के सबसे गंदे कोने—'दलदली नाले' के कीचड़ में—'तीलू' नाम का चालाक कॉकरोच रहता था। तीलू और उसके तिलचट्टों का नेटवर्क केवल सुंदरवन तक सीमित नहीं था; उनके गुप्त तार पड़ोसी जंगलों के बाहरी ताकतों और जहरीले कीटों से भी जुड़े हुए थे।

​जब जंगल में भीषण सूखा पड़ा और नदियाँ सूख गईं, तब भी चंपक लोमड़ी के चमकदार पत्तों पर लगातार प्रचार चल रहा था: "पानी की कोई कमी नहीं है! जो ऐसा कह रहे हैं, वे गद्दार हैं।"

​तीलू कॉकरोच समझ गया कि यह सही मौका है। उसने गौरों के सरदार से संपर्क किया।

​तीलू ने गौर सरदार के कान में फुसफुसाया, "हे महान गौर राजवंश! आपके पूर्वजों ने अपनी सींगों से यह जंगल बनाया, और आज आप इस लोमड़ी का जुल्म सह रहे हैं? आपकी विरोध की विचारधारा और हमारा नेटवर्क मिल जाए, तो हम इस चंपक लोमड़ी को उखाड़ फेंकेंगे!"

​गौरों ने सोचा कि वे तिलचट्टों जैसे छोटे कीड़ों का इस्तेमाल अपनी सत्ता वापसी के लिए कर लेंगे। गौरों के सड़क पर रंभाने और विरोध प्रदर्शनों के बीच, तीलू के तिलचट्टों, दीमकों और झींगुरों ने रात के अंधेरे में जानवरों के चमकदार पत्तों के तार कुतर दिए।

​अगली सुबह चमकदार पत्ते बंद हो गए। चंपक लोमड़ी का झूठ बेनकाब हुआ और वह डरकर भाग गया। शेर बहादुर का ढाँचा ढह गया। क्रांति सफल हुई। गौरों के सहयोग से तिलचट्टों ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया।

​मूल अंत: नया महल, काला पत्ता और अंतिम सच

​लेकिन यह 'आजादी' सबसे बड़ा धोखा निकली।

​तीलू कॉकरोच और उसके साथियों के पास जंगल चलाने, नदियाँ जीवित करने या जानवरों को पानी देने की न तो कोई समझ थी, न ही नीयत। उनका इकलौता मकसद सिर्फ तख्त और ताकत हासिल करना था।

​सत्ता में आते ही तीलू ने अपना असली रूप दिखाया। पानी की समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ, बल्कि उसने अपने 'दलदली नाले' का गंदा माहौल पूरे जंगल में फैला दिया।

​तीलू अब गंदगी में नहीं रेंगता था; वह दलदली नाले के सबसे बड़े कीचड़ के टीले पर बने एक भव्य महल में ऊँचे सिंहासन पर सोने का मुकुट पहने बैठ गया। उसके हाथ में चंपक लोमड़ी से भी बड़ा डिजिटल रिमोट था।

  • ​काले पत्ते का नया डर: तीलू ने ऐलान किया, "चंपक लोमड़ी का चमकदार पत्ता धोखा था, लेकिन हमारे 'दलदली नाले का काला पत्ता' ही परम सत्य है। जो हमारी बात नहीं मानेगा, उसे इस नाले में सड़ने के लिए फेंक दिया जाएगा।"
  • ​पंडित उल्लू का नया रूप: पंडित उल्लू ने तुरंत पाला बदला और चिल्लाने लगा, "इतिहास का सबसे महान और सर्वज्ञ राजा कोई और नहीं, बल्कि राजा तीलू है!"
  • ​कचरे की नई अर्थशास्त्र: साफ पानी का इंतजाम करने के बजाय, तीलू जानवरों को नाले का गंदा पानी पीने और कीचड़ में रहने की आदत डालने का उपदेश देने लगा।

​एक दिन, वही बूढ़ी चींटी—जो क्रांति की रात तीलू के साथ खड़ी थी—तीलू के नए महल के बाहर प्यास से गिर पड़ी।

​उसने महल की ओर देखा और रुँधे गले से पूछा, "तीलू! तुमने क्रांति के बाद हमसे साफ पानी और आजादी का वादा किया था! नदियाँ अब भी सूखी हैं, और पानी का कोई हल नहीं हुआ! तुमने पूरे सुंदरवन को एक बदबूदार दलदली नाला बना दिया!"

​तीलू कॉकरोच चालाकी से मुस्कुराया, अपनी लंबी मूँछें हिलाईं और रिमोट का बटन दबाते हुए बोला:

​"अरे मूर्ख चींटी! क्रांतियाँ कभी पानी या सच के लिए नहीं लड़ी जातीं। क्रांतियाँ तो बस यह तय करने के लिए लड़ी जाती हैं कि चाबुक किसके हाथ में रहेगा। चंपक लोमड़ी तुम्हें एक सुंदर झूठ का सपना बेचता था; मैं तुम्हें इस नाले के खौफ का सच बेचता हूँ। तख्त बदल गया है—यही तुम्हारा अंतिम सच है!"

​चींटी ने पीछे मुड़कर देखा कि जंगल के सारे जानवर (और निराश खड़े गौर) चमकदार पत्तों की जगह दलदली नाले के काले पत्तों के सामने झुक रहे थे और तीलू के नाम के नारे लगा रहे थे।

​सूखे हुए जंगल में बहती हवा में नाले की भारी बदबू भरी हुई थी, और पूरे जंगल में महल में बैठे नए तानाशाह की भयानक, निर्दयी हँसी गूँज रही थी।

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

नीलकंठ

 गोस्वामी तुलसी दास रचित श्रीरामचरितमानस के 'श्री   रुद्राष्टकम्' श्लोक में भगवान शिव के नीलकंठ  रूप में वर्णन मिलता है

 चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।

यही कारण है कि दशहरा पर्व में नीलकंठ पक्षी के दर्शन का माहात्म्य साक्षात महाशिव के दर्शन के समान है,,श्रुति है कि श्री राम जब रावण वध हेतु जब प्रस्थान कर रहे थे तब उनकी दाहिनी ओर से आवाज लगाते यह परिन्दा उड़ा,, और रावण की पराजय हुई,,एक पक्षी प्रेमी के रूप में मैने अपने परिवार में यह परम्परा बनाई है कि सुबह सुबह हम  नीलकंठ की खोज में निकलते है,,

                            आज सुबह से हम शिव रूपी परिंदे की खोज में भटकते हुए खारुन नदी के किनारे किनारे चल निकले

इंडियन रोलर के नाम से जाने जाना वाला यह परिन्दा खेतों नदियों के आस पास कीट पकड़ते मिल ही जाता है ,,लेकिन जिस दिन उसका माहात्म्य हो वहां बिना प्रयत्नों के ये कैसे मिलता,,खोजते हुए हमें लगभग एक से लेकिन भिन्न वाइट थ्रोटेड किंगफिशर के कई जोड़े मिले पर नीलकंठ नहीं, यहां तक भगवान शिव के प्रिय सफेद कुमुद का भी दर्शन हो गया , इस यात्रा में  आगे बढ़ते हम देवबलोदा के प्राचीन शिव मंदिर तक पहुंच गए ,,जहां बारहवीं सदी से महाशिव आसान जमाये है,, आखिर कार लौटते हुए ही नीलकंठ ने दर्शन दिया एक नहीं चार पांच,,,यात्रा धन्य हुई,,, अब आप बताइए कौन सा परिंदा नील कंठ है

गालिया


हो ख़ैर तो हर शख़्स को सम्मान देता हूँ,
गुस्ताख़ रहे कोई, उसे भी मक़ाम  देता हूँ।

ख़ामोश हूँ जब तक कोई  बदतमीज़ी, न हो
गर हो गई तो तेरी ,,?? कुनबे को नाम देता हु

अच्छा हूँ मगर इतना नहीं, कि गिरेबाँ धर लो,
मोहल्ले भर में तेरे पाजामे को टांग देता हूँ!

हम्माम में नंगे हैं सभी, फिर वहाँ क्यूं जाएँ?
भरी महफ़िल में ही सबको कलाम देता हूँ।

ये गुलुच, ये गालियाँ, 'अनुभव' की विरासत हैं,
जब जी करे, इनको तकिया-कलाम देता हूँ।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

अंगाकार रोटी

इधर मौसम भी करवट बदलता है ,,,बारिश बिदा लेती है तो मासूम ओंस सुबह सवेरे,,, दूर्वा घांस की आंखें भी भिगो देती है,,ठंड गुलाबी कैसे होती यह केवल महसूस किया जा सकता है बयाँ नहीं,,,वक्त होता है माटी के चूल्हों में गुलाबी अंगार के सुलगने का,,, और फिर जायकों की फरमाइश जारी होती है,, छुटपन के टेस्ट बर्ड्स जाग जाते है,, जब  नानी का जादुई नुख्सा आकार लेता है,, पानपुरवा अंगाकर रोटी
                     भाई साहब ये छत्तीसगढी जिह्वा का सबसे उम्दा इम्तिहान होता है  ,, गुजरी रात बचे भात के जसबात का समागम,, नवा चावुर आटा और पुरातन आचार का सरसों तेल एक साथ,,सादगी भरे जीरा ,, कटी हरी मिर्च  और धनिया के साथ जिन्हें संग गूथ कर फदकाया  जाता है हथेलियों की थपक,,, इसी चपटी किसम की रोटियों वास्ते शब्द आया चपाती  या विलायती भाषा में कन्हे तो फ्लैट ब्रेड,,पर हमारी अंगाकर यहीं नहीं रुकती ,,उसकी सलवटों में ममता की उंगलियां छपी होती है,,मानो स्नेह की पंक्तियां हो,,अब बारी धुले हुए परसा या अंडा पत्ता की परतों की जो रोटी पर करीने से बिछा दी जाती है,,,, इटेलियन पिज़्ज़ा के माफिक अब इस कशीदाकारी को,,चूल्हे के अंगारों के हवाले सौंप दिया जाता है,,,और कुछ अंगार ऊपर कुछ नीचे,,ताकि फलसफा अधपका या अधूरा न रहे,, धीमी आंच में परसा का पसीना और अंगार का धुंगयाईं अंदाज जर्रे जर्रे में रच बस जाता है,, प्रतीक्षा भी एक परीक्षा होती है,,, खैर जब सुबह का खाली उदर गीतों में बात करे तब पहली खेप प्रकट होती है,,अंगार को हटा कर,,,,
              वहीं किनारे जो पाताल मिर्चा भी भुने गए होते है वो चिमटे से निकलते है और सील बट्टे में हरी धनिया संग कुचरे जाते है,,ये डिप है या सालसा या फिर हमारी खालिस चटनी जो मानिये,, मां पत्तों और राख को झड़ा कर,,,रोटी को बीच से जब तोड़ती है,,तो धुंए के संग सभी स्वाद इंद्रिया सजग हो लेती है कांसे की थाली में एक ओर यह रोटी जिसकी ऊपरी परत जहींन कुरकुरी,, और भीतर गहराइयों में उतनी ही गुतूर,,साथ देने वास्ते फिर से वो आचारी तेल और चटनी,, मुग्ध होकर खाइये ,,और मंत्रमुग्ध हो जाइए,,,यह जलवा है पानपुरवा अंगाकर का,,,,वैसे इसे तवे में भी सेका जाता है पर वो अंगाकार क्या जो अंगार से न गुजरे

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

बूढ़ा होता गांव

बूढ़ा होता गांव,,,

टिहरी गढ़वाल की हिम चोटियों में एक रहा ,,भृगु पर्वत,,,बूढ़े वैद्य राम बिचारा जोशी,,,  पौराणिक कथा बाँचते,,,नौना,, ऋषि भृगु ने भगवान बिष्णु के छाती में लात दे धरी ,,,भृगु ज्योतिष संहिता यंहा लिखी ,,,नौना ,,सरकती रात के तारों में उलझते हिम शिखरों को घूरता ,,, जाड़े की हवा घाटियों के देवदार चीड़ के जंगलों से गुजरती हुई ऐसे चिचियाती जानो महादेव की भूत प्रेतों की बारात गुजर रही हो,,,जंगली गीदड़ दूर हुवा हुवा कर चेतावनी जारी कर रहे होते ,,धीमे धीमे खटिया में बचपन की आँखों में नीद उतर आती,,,
                       ओम की मां तो कब की गुजर गई ,,रहे पिता जो सन्यासी होकर हरिद्वार जा बसे,,,बूढ़े वैद्य दादा के साथ ही बचपना गुजारा,,,, मेढ़े चराने झुंड लेकर बकरवालों के साथ हरियाते बुग्याल में पहाड़ी बचपना,,,, बालगंगा नदी माफिक चंचल साफ ,,,तेजी से बहता ,,,नदी सुनहरी महाशीर और ट्राउट मछलियों से भरी,,,, जाल में उछलती मछली,,,, सूखी लकड़ियों के ढेर पर पुडिय़ा से निकले मसालों से चुपड़ी भुनी जाती ,, जादुई स्वाद और महक एक ही होते है,,
        चौतारा गांव में स्कूल नहीं रहा,,,नीचे घाटी में जाना होता ,,आखिर 150 घरों के गांव में कोई सुविधा होगी ,,, तो बच्चों की टोलियां कतार बना कर पतली पगडंडियों से उतरती ,,जीतू बगड़वाल के गीत गाते,​
सुणो सुणो, हे जीतू बगड़वाला!

बांसुरी बजै दे, खैट का धार मा।

, घाटियों के मुहानों से फिर जंगल लग लेते ,,,कितने घने ऊंचे ,,,गंभीर वृक्षों की कतारे,,,जिन से लग कर कस्तूरी वाला हिरण भी चरता,,, और उनकी तलाश में भटकता गुलदार ,,कई बार भेंट  हुई ,,इसी लिए हर हाथ झाड़ियों  से ठंडियां तोड़ लेते,,,पर मायने रखता पहाड़ी हौसला जो कन्हीं डिगेगा ,,, स्कूल की पढ़ाई तो ओम को जेल सी लगती वह खिड़की से भी दूर तक फैले पर्वतों को घूरता,,,जिनके ऊपर से श्वेत हंसों के झुंड गुजरते ,, चहकते,,,,वो बुरांश का मौसम था,,, अहा ,,,स्वर्ग के फूल,, सुर्ख लाल गुलाबी ,,,,पूरी घाटी  लाल ,,,, 
           जंगली काले तीतर और चित्तीदार  छोटे बटेर के फांदें ,,इन्हीं झाड़ियों पे बांधे जाते,,,,लजीज मीठा मांस पकता  ,,,सब दोस्त बांट लेते,,, वहीं खाओ ,,, 
पत्थर के छत वाली अब की भाषा में तो झोपड़ी कहा जाएगा ,,कुछ एक मकान थे,,,बिखरे हुए,,पतली गलियों में बच्चों का झुंड दौड़ता था,,,दादा चाहते ओम जड़ी बूटी पहचाने और कथा बांचे,,पर वो तो शहर से आने वाली बस की ओर हसरत से देखता,,,आखिर मैट्रिक पूरी हुई और शुरू हुआ पलायन,,,
              बॉम्बे में गढ़वाली बावर्ची कला सीखने का मौका हुआ,,,बचपन की शरारती मसालों से सीखे गए खुरदुरे अभ्यास ने अब सैफ कला की फनकारी का पारंगत रूप ले लिया,,कई प्रसिद्ध रेस्तरां समूहों में हुनर निखरा,,विदेश जाने की बारी भी लगी,,पर आखिर छत्तीसगढ़ के राजभवन के मुख्य बावर्ची की सरकारी जिम्मेदारी हासिल हुई ,,गांव और पहाड़िया तो कितनी दूर रह गई  ,,क्या वाकई ,,,बच्चे और महराजिन रोज कहानियां सुनते ,,,जो उन्हें भी अब कण्ठस्थ हो चली थी,,,क्या पापा कम से कम सौ बार सुना है,, ओम मुस्कराता पर कहानी पूरी जरूर करता,
,,शहर की भरी हुई सड़कों और मरी हुई हवा में उन घाटियों के ख्वाब उसे आते जिसके खिले हुए बुरांश में बैठी खूबसूरत तितलियों के पीछे उसका बचपन दौड़ा था,,,रुई जैसी बरसती बर्फ की याद में उसने इन मैदानों की जाड़े  कही जाने वाली ऋतु में शायद ही कभी ऊनी स्वेटर पहना हो,,,, रेस्तरां के ट्रेंड सैफ जिसे स्पेशल खुद का मसाला बताते,, ओम झट उसे पहचान लेता ,,पुरानी पहाड़ी बूटियां,,,राज्यपाल महोदय को उसके परोसे जायके से ज्यादा अचरज उसके वानस्पतिक ज्ञान पर होता,,, सर यह टिमरू है हमारे हिमालय से,,इसकी चटनी भी बनती है और छौंक भी लगता है,, कमाल है ओम
              पहाड़ों पर कुलदेवी की पूजा कई बरस पहले से छुटी थी,,, एक रोज ख्वाब में देवी सक्छात प्रकट हुई,,,और जोशी परिवार का समान जुड़ गया,,, बच्चों का पहला मौका उन कहानियों के मूल स्रोत से दो चार होने का,,, बस जब हरिद्वार छोड़कर पहाड़ी सड़क चढ़ने लगी तो ओम ने कार की खिड़कियों को खोल कर अपने परिवार से परिचय करवाया ,,उसी आदिम हवा से जो ठंडक के खोल में पहाड़ों की सुगंध बांधे घूमती रहती घाटियों में,,,बेटे के कान नाक दोनों भर गए,,, माँ ने ऊनी कनचप्पिया पहना दी,,,अभी यंहा जाड़ा पहुंचा भी नहीं ओम मुस्कुरा रहा था,,, सड़क के साथ स्मृतियां घूम रही थी महराजिन और बिटिया दो बार उल्टियां कर पस्त हुए सो गए थे,,लेकिन ओम ,,वह तो मानो उन यादों की पतंग को जो अब तक बहुत दूर उड़ रही थी तेजी से धागे खींच रहा था,,, 10 किलोमीटर
                   चौतारा गांव ,,,क्या ,,अब यह गांव रहा ,,,पक्की सड़के थी पक्के मकान थे,,, जूनी पत्थर की छत वाली कुछ एक छोपड़िया  अब क्या खाली पड़ी थी,,नहीं खुले  दरवाजों से मवेशी झांक रहे थे,,, मिट्टी की दीवारें जिनपर कभी बैठक होती घांस से पट गई थी,,,और अपना मकान भी चाचा जी ने लेंटर उठा कर पक्का कर लिया था,,,दादा जी तो हरिद्वार के अस्पताल में गुजरे रहे,,,अब एक दूर के चाचा के हवाले ही सब कुछ था,,, भृगु पर्वत ने पहली बार ओम के परिवार को देखा था,, वो उन मैदानों की ओर बढ़ा जिन पर अब बुरांश की झाड़ियां जाने कैसे गायब हो गई थी,,,,भेड़ें और कस्तूरी मृग भी,,,गुलदार खाक होगा,,,क्योंकि उसने जिस जंगल की कहानियां अपने बच्चों को सुनाई थी,, वो भी कब के कट लिए ,,,बच गई थी पथरीले ढलान,,जिस पर बिखरी चट्टानें बता रही थी कि बड़ा भूस्खलन हुआ हो गए दिनों,,,, ओम के भी कंही भीतर पत्थर लुढ़क रहे थे,,,वो हैरान था ,,अपनी यादों को खुरच कर इस परिवेश को पहचानने की कोशिश की ,,,लेकिन ये उसकी वो दुनिया नहीं थी,,,इसमें वो अपनापन नहीं था,,, खैरइयत नीचे घाटी में बाल गंगा अब भी बह रही थी,,वैसे ही कल कल करती ,,,माछिलयों से तो मुलाकात नहीं हुई,,,पर कुछ देर ओम उसी चट्टान पर पैर लटका कर उस नदी के जुड़ जुड़ाते पानी को महसूस कर रहा था,,,नीला पानी आज भृगु पर्वत के आंखों से लुढ़कते आंसुओं सा ,,,पैर सुन्न पड़ गए,, ओम की आंखों तक ये पानी उतर आया,,, उसने चोटियों को देखा वंहा हिमालयन गिफ़न  चक्कर काट रहे थे,,,ओम नदी से घाटियों से और उन स्मृतियों से विदाई लेकर घर लौट गया,,,
पूजा सुबह शुरू हुई,,,गांव के सभी बुजुर्ग शामिल हुए,,,कोई जवान बचा ही नहीं रह गया,,,सब देश परदेस में अपने व्यवसायों में जुटे थे,,,बच गई थी तो उनके मां पिता की बताई उनकी कहानियां,,,तोषण के दो होटल है लंदन में वह पांच बरस पहले आया भी था दीपावली पर ,,,देखो अब कब लौटेगा ,,शायद मेरे मरने के बाद ही,,,अग्नि देने तो आएगा ही न,, उसकी माँ की आंखों में भी बाल गंगा का जल उतर आया,
अब बच्चे हलकान हो रहे,,, जाड़ा उन्हें चुभ रहा है,,,घर छोटा है,वे अपने कमरों के आदि है फिर वेस्टर्न टॉयलेट भी मौजूद नहीं , सबसे बढ़ कर मोबाईल के डेटा में कुछ परेशानी है,, 
ओम रात आसमान के नीचे खुले में आग तापते बैठा ,,महराजिन देखो लगता है ये तारे तो कम से कम मुझे चिह्निते से लगते है,,,ऊपर आसमान की ऊंचाइयों से वही श्वेत हंसों का झुंड जाड़े का प्रवास कर रहा है,,,उनकी चहकने की आवाज घाटियों में गूंज गई,,,लेकिन अब गीदड़ नहीं रोते ,,, ट्रेन का रिजर्वेशन आन लाइन नहीं हो पा रहा ,,,नीचे बस्ती में जाना होगा,,, ओम देख रहा है महराजिन  को ठंड लग रही है,, उसने फिर भृगु पर्वत शिखर के ऊपर उड़ती बर्फ की ओर देखा,,, धुँआ देख कर लगा पर्वत हांफ रहा है ,,, ज्योतिष के महान ग्रंथ के लेखक ने क्या चौतारा का भविष्य भी बांचा होगा कभी,,,गांव तो बूढ़ा हो चला है,, सारा यौवन तो दूर शहरों में परदेश में बस गया,,, बुरांश कंही कन्ही महकते है,,,,चुन लिए गए सारे के सारे,,, बस बच गया  है बुढ़ापा झुर्री दार ,,,दर्द और दुखों से भरा,,, ओम ने अपनी स्मृतियाँ समेटी ,,,आखिर बार भृगु शिखर को देख कर घर के भीतर लौट आया ,,, पर्वत और बाल गंगा की मजबूरी है नहीं तो वो भी इस बूढ़े परिवेश को छोड़ जाते,,,कब से

अनुभव
             

       

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

जोशी जी

भृगु परबत की बर्फीली अंसुआती चोटियों के नीचे, बालगंगा की धार उस दिन अचानक अकट-सकट होकर बहने लगी थी।

​पहाड़ का मिज़ाज ही कुछ ऐसा ठहरा—कब धूप छितरा जाए और कब बादलों की मटमैली चादर पूरा अंचल ढँक ले, कोई न जाने! चौठारा गाँव की उस पथरीली, छीछली पगडंडी पर जब ओम प्रकाश ने बरसों बाद अपने पाँव धरे, तो सीढ़ीदार खेतों के ऊपर फैली बाँज और बुरांश की सोंधी हवा का एक झोंका उसकी देह को छुअत-छुअत निकल गया।

​अहा! वही चौठारा गाँव! भृगुपंथ और खैट परबत की छाँह में सिमटा हुआ, जहाँ किसी ज़माने में डेढ़ सौ परिवारों के ढोल-दमांऊ की थाप गूँजती थी। बूढ़े-पुरनिए कथा कहते कि इसी भृगु तुंग की गुफा में बैठकर महर्षि भृगु ने जग-जहान की जन्म-पत्री 'भृगु संहिता' बाँची थी। और वो खैट की धारी! जहाँ जीतू बगड़वाल की बांसुरी बजते ही परियाँ (आंछरियाँ) आंचल लहराती उतर आती थीं।

​गाँव के चौपाल में जगरिया जब थाली पर काँसे की डंडी मारता, तो ओम प्रकाश के बाल-मन में वो बोल सदा-सदा के लिए रच-बस जाते—

​सुणो सुणो, हे जीतू बगड़वाला!

बांसुरी बजै दे, खैट का धार मा।

​खैट की आंछरी, रूप की रानी,

मुरली की धुन मा, भई दीवानी।

रोपी का दिन ऐगे, शिरोमणि खेत मा,

वचन दीनि जीतू, आंछरी का हाथ मा...


​पहाड़ का वो फागुन भी बड़ा अलबेला होता! खेतों की मुँडेरों पर फागुन से बैशाख तक बुरांश के लाल-सुर्ख फूल ऐसे भभक उठते, मानो पूरे पहाड़ ने अबीर-गुलाल घोर रखा हो। चीड़ की पतली पत्तियों (पीरुल) की सरसराहट के बीच जब जाड़ों में पौष-माघ के दिनों बर्फ जमती, तो रात के सन्नाटे में आकाश गंगा (दुग्ध-मेखला) के नीचे सन्नाटा भी कुछ मीठा-मीठा फुसफुसाने लगता।

​"अरे पापा, मोबाइल में टावर ही नहीं आ रहा!" मैदानी ज़बान में पले-बढ़े बेटे ने अपने स्क्रीन से नज़रें हटाकर झल्लाते हुए कहा।

​ओम प्रकाश ने कोई जवाब न दिया। उसने बस एक ठंडी साँस ली और अपनी आँखें मूँद लीं। उसका मन तो भीतर ही भीतर कौंध उठा—'अरे, इस घाटी के वो चटक लाल बुरांश के फूल कहाँ बिला गए? वो कलीज, कोकलास, मोनाल और कस्तूरी हिरण कहाँ चले गए? क्या पहाड़ की ये सुंदरियाँ और चंचल जीव भी इंसानों से मुँह मोड़कर इस घाटी को वीरान छोड़ गए?'

​उसकी आँखों के आगे तो पचास साल पुराना चौठारा गाँव सजीव हो उठा था।

​अहा रे! वो भटगाँव के प्राइमरी स्कूल का रास्ता! रास्ते में कुखली धार की सघन झाड़ियों के पीछे कभी काले भालू की घुरघुराहट गूँजती, तो कभी पगडंडी के ऐन मोड़ पर विशालकाय गुलदार (तेंदुआ) आ बैठता। सुनहरी छल्लीदार देह पर ढलती धूप की किरणें चमचमातीं और पीली बेधती आँखें सीधे ओम और उसके संगियों पर गड़ जातीं। पर पहाड़ के छौने (बच्चे) भी किस मिट्टी के बने थे! न कोई चीख, न पाँव पीछे खींचना। बिना पलक झपकाए, अपनी छाती तानकर उस गुलदार के ऐन सामने डटे रहना! वही तो पहाड़ी जिगर था, जिसे देखकर जंगल का राजा भी चुपचाप घने बांज के जंगल की ओर मुड़ जाता।

​मास्टर जी की छड़ी से बचकर दबे पाँव भागना, मकई के भुट्टे चुराकर बालगंगा की रेती पर आग में भूनना, और ठंडे पारदर्शी पानी में तैरती 'असोला' (स्नो ट्रौट) और सुनहरी महाशीर मछलियों के पीछे नंगे पाँव दौड़ना... काफल और हिसार की झाड़ियों से खट्टे-मीठे दाने तोड़कर खाना, वैद्य दादाजी से जड़ी-बूटियों की पहचान सीखना और उनके साथ बूढ़ाकेदार के दर्शनों की कथाएँ सुनना... और जिगरी यार कृपालु और मांगू के साथ की गई बदमाशियाँ।

​हाँ, फिर ज़माने का पहिया घूमा। पढ़ाई के लिए दिल्ली जाना पड़ा, फिर बंबई के ताज होटल में शेफ का काम और फिर छत्तीसगढ़ के गवर्नर हाउस के कैटरिंग मैनेजर की कुर्सी... जीवन शहर की आपाधापी में बीतता गया। पर ओम प्रकाश का मन तो हमेशा उसी पगडंडी पर अटका रहा।

​और आज? जब कुलदेवी की पूजा का संचित पुण्य लेकर वह गाँव लौटा, तो लगा जैसे उसकी जन्मभूमि का रूप ही किसी जादूगर ने बदल दिया हो।

​गाँव के पथरीले पटालों वाले आँगन गायब थे; उनकी जगह सीमेंट और लिंटर की रूखी गारा-मिट्टी खड़ी थी। न बकरियों की में-में थी, न कलीज और कोकलास की कूक। बालगंगा की जो धार कभी कल-कल छलका करती थी, वह अब पतले मैले नाले-सी सिमटकर सिसक रही थी। गाँव के बचे-खुचे चार-छह बुजुर्ग भी हाथ में चमकती काँच की स्क्रीन थामे चुपचाप बैठे थे—जैसी काठ की पुतलियाँ हों।

​पुराने यार कृपालु का घर सूना पड़ा था—वह सिंगापुर चला गया था, और मांगू बंबई के किसी बड़े होटल का मालिक बन बैठा था।

​दो दिन की पूजा क्या बीती, घर वाले छटपटाने लगे। "पापा, मोबाइल में टावर ही नहीं आ रहा!" बेटे की वही मैदानी उतावली आवाज़ बार-बार गूँज उठती।

​शाम ढलने को थी। खैट परबत और भृगु तुंग की चोटियों पर सिंदूरी धूप बुझ रही थी। ओम प्रकाश के कानों में अचानक जीतू बगड़वाल के उस आखरी पवाड़े के बोल कौंध गए—

​हाथ मा रोपी का पौधा छिन,

मुरली की तान गूंजी धार मा।

आकाश से उतरीं खैट की आंछरी,

जीतू ते ली गईं, उड़ै के सार मा...

​मातृ रोणी घर मा, बहिन सोबनी खोजणी,

जीतू बगड़वाल गै, परियों का लोक मा।


​ओम प्रकाश ने आगे बढ़कर गाँव की देहरी की थोड़ी सी पंकिल-सोंधी माटी चुटकी में उठाई और काँपते हाथों से अपने माथे से लगा ली।

​उसे लगा कि अब इस चौठारा गाँव के किसी जीतू को बांसुरी बजाने की ज़रूरत ही कहाँ पड़ी? खैट परबत की आंछरियाँ (परियाँ) इस बार नए रूप में आई थीं—शहर की चकाचौंध, नौकरियों के मोह और सपनों के जाल का रूप धरकर! और वे गाँव के एक-एक जीतू को उँगली पकड़कर अपने साथ उड़ा ले गईं। गाँव के सारे जीतू अब सिंगापुर, बंबई और दिल्ली के धुएँ में विलीन हो चुके थे, और पीछे छोड़ गए थे बस यह बेजान, खाली और ठंडा ढाँचा।

​पगडंडी की पहली सीढ़ी पर पहला कदम बढ़ाते ही ओम प्रकाश की आँखें डबडबा आई थीं। गालों पर ढुलक आए दो गर्म अंसुवा माटी के उस अंचल को आखिरी अर्घ्य दे रहे थे।

​तभी पीछे मुड़कर देखा तो भृगु परबत पर बर्फ का एक कातर टुकड़ा शाम के सन्नाटे में पिघल रहा था। ओम प्रकाश का मन एक अनसुलझे प्रश्न के सामने ठिठककर खड़ा हो गया—क्या शहर की आंछरियों के मोह में अपनी जड़ों को छोड़ चुके ये तमाम जीतू बगड़वाल कभी लौटकर अपनी बालगंगा की धार को फिर से ज़िंदा कर पाएँगे, या यह चौठारा गाँव ऐसे ही हमेशा के लिए पत्थरों का एक वीरान खाका बनकर रह जाएगा?

​इसी आकुल प्रश्न और भीनी सी गंध को अपनी छाती में भींचकर, ओम प्रकाश अपने उजड़े बचपन के अवशेषों को पीछे छोड़ता हुआ, भारी कदमों से मटमैली शहर की धुंध की ओर बढ़ गया।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

तीन पत्तियों की कहानी

भारतीय थाली में तीन पत्तियों की कहानी:   रसा का  झोल

​भारतीय भोजन केवल जिह्वा के जायके की कला ही नहीं है , बल्कि भूगोल, वनस्पति शास्त्र, आयुर्वेद और इतिहास की एक अत्यंत सूक्ष्म व समृद्ध विज्ञान भी है। हमारे व्यंजनों को रूप, रस, गंध और रंग प्रदान करने वाली अनगिनत सामग्रियों में तीन पत्तियों का कब्जा है तेजपत्ता (तमालपत्र), करी पत्ता (कढ़ी पत्ता/मीठा नीम) और कसूरी मेथी।

​हालांकि ये तीनों पत्तियाँ रसोइयों में प्रायः 'तड़के' और छौंक' के लिए प्रयुक्त होती हैं, परंतु इनका इतिहास, इनकी वानस्पतिक पहचान, क्षेत्रीय विभाजन और पकाने की शैलियाँ भारतीय उपमहाद्वीप की विविधता को अद्भुत ढंग से रेखांकित करती हैं।

 भूगोल का जायका

​भारतीय उपमहाद्वीप के प्राकृतिक भूगोल ने अलग-अलग अंचलों को अलग-अलग वनस्पतियों से समृद्ध किया है। इन तीनों पत्तियों का वानस्पतिक चरित्र और इनका उद्गम क्षेत्र इनके प्रयोग को निर्धारित करता है:

  • ​तेजपत्ता (तमालपत्र - Cinnamomum tamala): यह मुख्यतः हिमालय के तराई क्षेत्रों, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर भारत (विशेष रूप से मेघालय और असम) के पहाड़ी ढलानों का वृक्ष है। यह दालचीनी के कुल का वृक्ष है, जिसकी पत्तियों पर लंबाई में तीन स्पष्ट समानांतर नसें (3 parallel veins) होती हैं।
  • ​करी पत्ता (मीठा नीम - Murraya koenigii): यह भारत का मूल (indigenous) झाड़ीदार पौधा है, जो मध्य, दक्षिण और प्रायद्वीपीय भारत के उपोष्णकटिबंधीय इलाकों में प्राकृतिक रूप से बहुतायत में उगता है। इसकी ताज़ा पत्तियों में एक तीखी, हर्बल और खट्टी-सोंधी सुगंध होती है।
  • ​कसूरी मेथी (Trigonella corniculata): यह सामान्य हरी मेथी से भिन्न, विशेष सोंधी सुगंध वाली मेथी की प्रजाति है, जिसकी खेती मुख्य रूप से राजस्थान के नागौर जिले में होती है। शुष्क और रेतीली जलवायु में उगने के बाद इसे सुखाकर पूरे देश में भेजा जाता है।

​उत्तर से दक्षिण का तड़का: तेजपत्ता बनाम करी पत्ता

  • ​उत्तर भारत और तेजपत्ता: उत्तर भारतीय, अवधी और मुग़लई शैलियों में गाढ़ी, गरम-मसाला प्रधान और समृद्ध ग्रेवी (सालन, कोरमा, राजमा, छोले) का वर्चस्व है। यहाँ तेजपत्ते को गरम तेल या घी में शुरुआत में ही खड़े मसाले के रूप में डाला जाता है। इसका काम पकाने की प्रक्रिया के दौरान अपनी काष्ठ-जैसी (woody), हल्की दालचीनी और लौंग-सदृश सुगंध को पूरे व्यंजन में घोलना है।
  • ​दक्षिण भारत और करी पत्ता: दक्षिण भारतीय, मराठी और तटीय व्यंजनों (सांभर, रसम, अवियल, पोहा, चेट्टिनाड करी) का आधार ताज़ा, सुपाच्य और खट्टा-नमकीन स्वाद है। यहाँ करी पत्ते को राई (सरसों) और हींग के साथ छौंक के रूप में अंत में या शुरुआत में डाला जाता है। यह नारियल, इमली और छाछ के साथ मिलकर व्यंजन को एक जीवंत (vibrant) ताज़गी देता है।

 प्राचीन तेजपत्ता बनाम नया भूमध्यसागरीय लाउरेल

​वैश्विक व्यापार और अनुवाद के कारण प्रायः 'Bay Leaf' शब्द को लेकर भ्रम उत्पन्न होता है। हालाँकि, वानस्पतिक और रसात्मक दृष्टि से भारतीय तेजपत्ता और भूमध्यसागरीय तेजपत्ता बिल्कुल अलग हैं:

  • ​भारतीय तेजपत्ता (Cinnamomum tamala): संस्कृत में 'तमालपत्र' कहलाने वाले इस पत्ते में मीठी, दालचीनी और लौंग जैसी सुगंध होती है। इसकी पहचान इसकी लंबाई में दौड़ने वाली तीन नसें हैं। जिसे तोड़ा जाता है हिमालय में होने वाली दाल चीनी के पेड़ से
  • ​भूमध्यसागरीय तेजपत्ता (Laurus nobilis): यह यूरोपीय, इटैलियन और पास्ता सॉस या स्ट्यू में इस्तेमाल होने वाला 'लाउरेल' पत्ता है। इसमें बीच में केवल एक मुख्य नस (single midrib) होती है और इसका स्वाद थोड़ा कड़वा, पाइन (चीड़) और नीलगिरी (eucalyptus) जैसा तीखा होता है।इसकी खेती बाद के समय में दक्षिण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में शुरू हुई

​ कसूरी मेथी का कसूर

​पारंपरिक दक्षिण भारतीय रसोई (जैसे उडुपी, तमिल या केरल साद्या) में कसूरी मेथी का प्रयोग लगभग शून्य रहा है। इसका कारण नागौरी मेथी की उपलब्धता का उत्तर भारतीय क्षेत्रों तक सीमित होना और दक्षिण में ताज़े करी पत्ते व धनिया की प्रचुरता थी।

​हालाँकि, आधुनिक खान-पान और रेस्तरां संस्कृति (Fine Dining) के आगमन से यह सीमाएँ धुँधली हुई हैं। आज हैदराबाद, बेंगलुरु या चेन्नई के रेस्तराओं में बनने वाले इंडो-मुग़लई व्यंजनों, बटर चिकन, पनीर कड़ाही या मखमली करी में कसूरी मेथी का भरपूर प्रयोग अंतिम 'गार्निश' और सोंधेपन (aromatic finish) के लिए किया जाता है।

​रस और खसखस 

​इन पत्तियों का प्रयोग विभिन्न प्रकार के 'रसों' (Liquid Bases/Gravies) की प्रकृति के अनुसार तय होता है। भारतीय व वैश्विक भोजन में रसों का अपना एक समृद्ध वर्गीकरण है:

  • ​सालन: उर्दू/फ़ारसी परंपरा से निकला पूरा रसेदार व्यंजन (जैसे मिर्ची का सालन)।
  • ​तरी: किसी भी मसालेदार व्यंजन का ऊपरी, बहने वाला और तेल/मसाले से युक्त रस (Gravy)जिसमें तरावट हो,,
  • ​झोर / झोल: छत्तीसगढ़, बिहार, बंगाल और ओडिशा में प्रचलित बहुत ही पतला, सुपाच्य और पानीदार रस (जैसे माछेर झोल), जिसमें अक्सर करी पत्ते या पंचफोड़न का हल्का तड़का होता है।
  • ​करी: तमिल के 'कड़ि' (Kari) से निकला वैश्विक शब्द, जो मध्यम गाढ़ी मसालेदार ग्रेवी को दर्शाता है।इसमें नारियल और तिल का प्रयोग इसे विशिष्ट बनाता है अंग्रेजों ने यही शब्द सभी भारतीय तरियों के लिए अपना लिया
  • ​शोरबा: फ़ारसी 'शुरबा' से आया पतला, साफ़ और पीने योग्य सूप-नुमा रस, जो गरम मसालों और तेजपत्ते के अर्क से बनता है।
  • ​कोरमा: धीमी आंच पर दही, भुने प्याज, काजू/बादाम और घी के साथ पकाया गया अत्यंत गाढ़ा, शाही और मखमली व्यंजन ,,,इसमें खसखस का उपयोग खास है
  • कढ़ी: राजस्थान ,पंजाब ,गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़ तक जब दही या महि के साथ जब व्यंजन पकता है तो दक्षिण का करी पत्ता ,,कढ़ी पत्ता हो लेता है,,,अंतर इतना है उत्तर की कढ़ी ,,,गाढ़ी दही से और नीचे उतरते हुए छत्तीसगढ़ तक वह पतली मही में तब्दील हो जाती है

​प्राचीन साहित्य और आयुर्वेद 

​इन रसों और पत्तियों का इतिहास केवल आधुनिक रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रमाण प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं:

  • ​तमिल संगम साहित्य (1st-3rd Century CE): पट्टिनप्पालाई और अकनानूरु में 'कड़ि' (काली मिर्च से बने रस) और 'पुळिच्चाऋ' (आधुनिक रसम का पूर्वज) का उल्लेख मिलता है, जहाँ स्थानीय करी पत्ते और काली मिर्च का प्रयोग बहुतायत में था।
  • ​संस्कृत साहित्य व आयुर्वेद: चरक व सुश्रुत संहिता में पतले पाचक रसों को 'यूष' (दाल/सब्जी का काढ़ा) और 'रस' कहा गया। अमरकोश में तेजपत्ते को 'तमालपत्र' के रूप में सुगंधित औषधि माना गया। 12वीं सदी के चालुक्य नरेश सोमेश्वर रचित 'मानसोल्लास' में छाछ व बेसन से बने 'तक्र-साधित' व्यंजनों (कढ़ी) का वर्णन है।

​ वैश्विक रसों का  संसार

​जब हम भारतीय रसों की तुलना वैश्विक व्यंजनों से करते हैं, तो रसों का विकासवादी क्रम और स्पष्ट होता है:

  • ​सूप की उत्पत्ति और फ्रेंच/रशियन कोर्स सिस्टम: 18वीं सदी तक फ्रांस में सारा खाना एक साथ मेज पर सजाया जाता था (Service à la française)। 19वीं सदी में रशियन शैली (Service à la russe) के आने से भोजन को क्रमबद्ध (Sequence) परोसना शुरू हुआ—फर्स्ट कोर्स (सूप/स्टार्टर) → मेन कोर्स (सालन/करी) → डेजर्ट (मीठा)। भारतीय रसों में 'शोरबा' और 'रसम' सीधे तौर पर फर्स्ट कोर्स/सूप की श्रेणी में आते हैं।
    • ​पश्चिम (Gravy, Broth, Consommé, Bisque): पश्चिमी रसोई में रसों का आधार भुने मीट का अर्क (Pan drippings), हड्डियों का स्टॉक और मक्खन-आटे का घोल (Roux) होता है।
    • ​पूर्वी एशिया (Ramen Broth, Dashi, Pho): चीन, जापान और वियतनाम में रसों का आधार बिना अत्यधिक तेल के—सोयाबीन (मिसो), समुद्री शैवाल (Dashi/Kombu) या हड्डियों को 12-18 घंटे उबालकर निकाला गया उमामी अर्क होता है।

 'सॉस' भी कभी कढ़ी थी????

​पश्चिमी व्यंजनों का सास कभी कढ़ी नहीं थी,,इन सभी रसेदार व्यंजनों के मूल में तरल पदार्थों को निकालने और सुरक्षित रखने का इतिहास छुपा है:

  • ​जूस (Juice): लैटिन के iūs (रस/सूप) से निकला शब्द है, जो फ्रेंच jus से होता हुआ अंग्रेजी में आया। दिलचस्प बात यह है कि लैटिन का iūs और संस्कृत का 'यूष' (काढ़ा/सूप) दोनों एक ही भारोपीय (Indo-European) भाषा परिवार से जुड़े हैं।
  • ​अर्क बनाम जूस: जूस जहाँ यांत्रिक रूप से निचोड़ा गया ताज़ा गूदेदार रस है, वहीं अर्क (Distillate) भाप को ठंडा करके एकत्र की गई वाष्पशील औषधीय बूंदें (जैसे गुलाब अर्क) हैं।
  • ​सॉस की उत्पत्ति: दुनिया का पहला दर्ज सॉस ईसा पूर्व पहली शताब्दी में रोमन साम्राज्य का 'गरम' (Garum) था, जो मछली को नमक में फर्मेंट करके बनाया जाता था। लगभग उसी कालखंड में चीन में स्वतंत्र रूप से 'जियांग' और आगे चलकर कम खर्चीला 'सोया सॉस' का विकास हुआ, जो बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से जापान (शॉयु) और पूरे पूर्व एशिया में फैला।

​भारतीय भोजन में तेजपत्ता, करी पत्ता और कसूरी मेथी केवल तीन पत्ते नहीं हैं; वे भारत की जलवायु, वानस्पतिक विविधता और पाक-कला के दर्शन का प्रतीक हैं। तेजपत्ता जहाँ हिमालय की वादियों और उत्तर की शाही रसोइयों की गरिमा है, करी पत्ता प्रायद्वीपीय भारत की ताज़गी और आरोग्य का संवाहक है, वहीं कसूरी मेथी थार के मरुस्थल से निकली वह सुगंध है जो पूरे देश के व्यंजनों को एक मखमली मिजाज देती है। तेज पत्ता और कसूरी मेथी सूखी उपयोग में आती है वही करी पत्ता बिलकुल ताजी,,,धनिया पत्ते का जिक्र इसमें नहीं आने का कारण यह है कि यह पूरे भारत में समान रूप से फैला है इस पूरी यात्रा में छत्तीसगढ़ के रसा और झोर से लेकर मुगलई सालन शोरबा संस्कृति की अमर परंपरा मौजूद है माखन लाल चतुर्वेदी ने करी पत्ते पर कहा है

हरा-भरा करी-पत्ता, छौंक का श्रृंगार है,

सादे से खाने में भी, भरता अनोखा प्यार है

वही कसूरी मेथी पे फ़िराक़ गोरखपुरी कहते है 

​ज़रा सी कसूरी मेथी जो हाथों से मली उसने,

पुरानी रसमों की ख़ुशबू से घर महक उठा,,,

शनिवार, 26 सितंबर 2026

छोले और कुलचे

घर पे Petits pois à la française' 

इतवार की सुहानी सुबह, जब आसमान से बदली ने अपनी चादर हटाई, तो घर की रसोई का मिजाज भी एक नए रंग में रंग गया। बात जब चटखारे की हो, तो भला मन कैसे माने! धर्मपत्नी जी ने भी रसोई संभाली और पंजाबी कुलचे और मटर के छोलों के उस रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री) में एक नया जादुई समीकरण जमा दिया

​थाली महज़ एक नाश्ता नहीं, कही बढ़कर एक शाहकार थी। जिसका जायका सीधे अमृतसर की उन तंग गलियों के स्वाद की तहजीब समेटे हुए था, हर निवाले में इतिहास और ज़ायके का मेल । षड-रसों से लबरेज उन मज़ेदार छोलों के साथ इमली की खटाई, तीखी हरी चटनी, और कच्चे प्याज-टमाटर का साथ मानो सोने पर सुहागा । कभी मुगल बावर्चीखाने में बादशाह शाहजहां के पसंदीदे कुलचे परोसे जाते थे,,,ये स्वाद लाहौर और पेशावर से होता हुआ फिर लौटा जब पार्टिशन के बाद 1947 में पूर्वी पंजाब से आए शरणार्थी परिवारों ने अमृतसर की गलियों में सुबह नाश्ते के लिए अपने छोटे छोटे ठेले सजाए,,,इस तरह यह हुनर अपनी रियायती विरासत के साथ आज इस अंजाम तक पहुंचा है

 मक्खन में लिपटे हुए हर इक कौर में मसालों की जुंबिश, वैसे तो मटर के ऐसे ही व्यंजन का फ्रांसीसी तर्जुमा 'Petits pois à la française' कहा जाता है,  सच तो यह है कि इस नाश्ते की प्लेट में इन मटर (पीज) का मज़ा चखने के बाद जो सुकून मिला कि मानों ज़िंदगी का सारा 'पीस' (Peace) यहीं मिल गया हो!

शनिवार, 15 अगस्त 2026

चोरी

 

​अरसे से जंगली भैंसों ने,

मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,

ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,

कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।

​चींटियों की वो मौन समझदारी,

सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,

बदले में मिले मिठास के रस से,

अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।

​दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,

बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,

इंसान ने देखा, समझा और सीखा,

उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।

​प्रकृति के इस खुले द्वार से,

मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,

पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,

अहंकार का दायरा और बड़ा।

​फिर हुनर के संग-संग उसने,

मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,

बाँटने की जो रीत थी जग की,

उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।

​आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,

पर विडंबना का दायरा देखिए—

जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,

अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!

रविवार, 9 अगस्त 2026

वक्त धरती के चक्कर के साथ चलता है,,,हाथ में बंधी घड़ी भी,,,फिर कलेंडर के पत्ते पलटे जाते है आखिरकार पूरा कलेंडर बदल जाता है,,,वक्त के जैसे,,पर कई घरों में भूख नहीं बदलती,,,वो कायम रहती है वैसे ही
                कारखाने की छत से गिरधर गिर गया ,,,तुरंत साँसे रुक गई
सर की चोट थी ,,,मुर्दा शरीर एम्बुलेंस में रखते हुए ही सब जान गए कि उसमें जान नहीं रही,,, भीड़ और नारे लोकतंत्र की पहली सीख है ,,,सारे मजदूर एक स्वर में फैक्ट्री की ईंट से ईंट बजा रहे थे,,,करेंट लगने से मरा ,,, मुवाजा देना होगा,,,प्रबंधन और प्रशासन पहले समझाइश देता है ,,,मुवावजे पर विचार करता है ,, पुलिस भीड़ को संभालती है कभी भीड़ भी पुलिस को संभालती है,,,लोकतंत्र आगे बढ़ता है जब राजनेता आते है,, मरे गिरधर के बचे परिवार से मिलने,,,चाय भी पड़ोस की झोपड़ी से आती है,, क्यूँ की रसोई खाली है,,,गिरधर भी खाली पेट फैक्ट्री गया था,,,नई नौकरी 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

सेल्युलेज पचता नहीं है
पचा देता है
आखिर मुक्त हो लेता है

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

चिड़ियाघर का किराया

चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी  ,,,आखिर बारिश का मौसम था,, खपरैल से कई मोरियां एक साथ चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी मां तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू सब्जी पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,पूरा क्लास महक जाता,,गुरुजी जान जाते,,कौन है रे
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया ,,,, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,सफेद धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी पीपल की छोटी सी कलम भी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
 
           
                       
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,क्यों आगे बताता हु,,,छत पर घांस भी उग आई थी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,विशाल वृक्ष,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता था उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले पूरा माहौल फिर जाग जाता,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखा बोला था न मिम्मी खुश हो जाता मै सोच में,,,अजीब सी बास उस आंगन में फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली बनती थी पर वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे
                       
यहाँ पूरा लेख प्रस्तुत है:

​मिम्मी मेरा प्राचीन मित्र
इसके आठ
​मित्रता या दोस्ती की एक अजीबो-गरीब दास्तान है। यह हमेशा से ही मौजूद रही। रक्त संबंधों से परे  ये पहले चुनाव पर आधारित है,,,
 खासतौर पर बचपन में हम ऐसे लोगों को चुनते हैं, जिनके साथ हमारे जस्बात और रुझान मिलता-जुलता हो।

​यह बात रही उसी दौर की ,,, 80 के दशक में मैं मिम्मी से मिला। मिम्मी मेरे छुटपन  का यार,  पहली और दूसरी में मेरा सहपाठी,फिर शायद दूसरी के बाद उसने स्कूल को अलविदा कह दिया,,खैर

मुलाकात ऐसे रही , उसके खपरैली घर के आंगन ,, एक वयोवृद्ध नीम पेड़ हुआ करता था। विशाल ,, गठिया  से ग्रस्त टेढा मेढ़ा,उस नीम की कनगियों  में  अजीबो गरीब घोंसले सजे होते रहे,,,कोलाहल से सजे,  भारतीय सफेद  गर्दन वाला गिद्ध जो रात गए जाने कैसी भाषा बोलता या फिर,फिर मौजूद रहे किस्म किस्म के कोकड़े, जिसमें काली पंख वाला हेरोन और फिर भूरी पंख वाला कैटल हेरोन, , अजीबोगरीब आदिम गीत,,जिससे कर्ण गीत झुंझला जाये

​इस घर में मानसून थक जाता रहा ऐसी बारिश  जो विचित्र सुगंध से भरी होती थी। यह सुगंध थी,, लाहौल बिलकुबत ,खासतौर पर जलीय जीवों के कैल्शियम और उनके प्रभाव से।

​जब हम उसके घर जाते थे, मैं और मिम्मी इस बात पर गौर करते थे कि एक अजीब किस्म की आदिम सुगंध उसके घर में भरी पड़ी है। इसके अलावा हम दोनों का रिश्ता अजीबोगरीब था, क्योंकि उसकी मां ढेलाबाई मेरे घर में नौकरानी का काम करती थी, और अपनी नौकरानी के बच्चे के साथ मैं उन दिनों नगर निगम के एक स्कूल में पढ़ता था।

​मेरा और मिम्मी का संबंध यह था कि उसके पास कुछ बुनियादी सुविधाएं थीं। वह धरती के कुछ ऐसे खूबसूरत संबंधों को समझता था, जो मेरे लिए समझ पाना बड़ा कठिन होता था। भौंरे को रिवर्स स्विंग देने की कला मैंने उसमें पहली बार देखी। जब भौंरे एक दिशा में फेंके जाते थे, लेकिन वह मुड़कर दूसरी दिशा में घूमने लगते थे, तो अब मुझको ऐसा लगता है कि सरफराज नवाज या वसीम अकरम की जो लाल गेंद टेस्ट मैच में रिवर्स स्विंग के रूप में घूमती थी, उस कला का असली आविष्कार हमारे यहां भौरों की इस दिशा और दशा से हुआ था। उन दिनों भौंरे बिना कील के मिलते थे, उन्हें बढ़ई से खरीदना पड़ता था, और बढ़ई से खरीदकर हम उन्हें लोहार के पास ले जाकर उस पर कील ठुकवाते थे।

​और उसके बाद शुरू होता था, उसके और मेरे घर के बीच मौजूद एक बरगद के पेड़ के नीचे जो पाटा बना था, जिसमें पता नहीं किस-किस किस्म के देवता, जिसमें आराध्य शिव से लेकर कई किस्म के पत्थर रखे होते थे।

​उनके बीच और उनके सामने बच्चों का एक खेलों का ओलंपिक होता था, जहाँ कई किस्म के खेल खेले जाते थे। भौंरे वहाँ घूमते थे, और उन दिनों कंचे वहाँ फेंके जाते थे, और कंचों के ऊपर भी ऐसे बड़े चीनी मिट्टी के कंचे होते थे जो एक दूसरे को निशाने लगाते थे।

​इस पूरी परिधि के आसपास जो व्यंजन हम लोग अपने सुपीरियरिटी काम्प्लेक्स में खाते थे कि शायद 25 पैसा मुझे मिल जाता था जो मिम्मी को पाँच पैसे के रूप में मिलता था, मैं नड्डा खा सकता था और खस्ता खा सकता था, और मिम्मी उस चैलेंज को स्वीकार करता था कि शाम को जब चाट का ठेला लगेगा तब आना। चाट के उस ठेले में जो आलू की टिकिया बनती थी और भटूरा उबलता था, और आलू टिक्कियों के बीच जब वो सामंजस्य स्थापित होता था, जिसमें उन दिनों लाल मिर्च, साथ में कटी हुई हरी मिर्च, प्याज, टमाटर, और साथ में इमली की खटाई होती थी। इमली की खटाई से बना हुआ यह पूरा व्यंजन चाट नहीं 'चाट' होता था। इसी चाट को हम खाते थे और इस गरमागरम चाट के साथ इसी गरमागरम मसाले को उन दिनों आधे पके गुपचुपों में ठूंसकर, जब इमली पानी के साथ अपने उदर को समृद्ध करते थे, तो ऐसा लगता था कि इससे बड़ा व्यंजन और कोई नहीं होता था। यह वो दौर था जब पिज़्ज़ा, बर्गर, या फिर और कोई भी विदेशी डिश इस भूभाग के संपर्क में नहीं आ पाई थी, लेकिन वो स्वाद आज भी जीभ में हाजिर है।

​स्कूल के बाहर एक कसेर महिला छोटा सा बाँसों की टोकरी लेकर बैठती थी, जिसमें एक जर्मन की गंजी होती थी। उसके अंदर से निकलता था एक बड़ा, और उस बड़े के ऊपर चना और साथ में भटूरा उसकी तरी डलती थी, और हल्की सी इमली की चटनी, और उस इमली चटनी के साथ पता नहीं किस किस्म के अजीबोगरीब मसाले उसमें छिड़के जाते थे, और 25 पैसे में वो व्यंजन हमको उपलब्ध होता था। ठीक उसके किनारे एक नाली होती थी जिसमें काई जमी होती थी, लेकिन ये गौरतलब है कि उन दिनों हाइजीन को लेकर ऐसी आशंकाएं हमारे मन में नहीं होती थी।

​फिर दौर आता था गर्मियों का, जब महानदी की रेत के अंदर पहले पहल बड़े-बड़े काले कलंदर - जो शायद आज के चितकबरे कलंदरों से भिन्न हैं - उनकी फांकी 10 पैसे में बिकती थी। साथ ही बिकती थी बोईर की गुड़ से डली हुई एक खास किस्म की डेजर्ट की चटनी। नाग पंचमी आती थी तो बड़े-बड़े खीरे उभर आते थे, और रेत में उगे इन खीरों को जब काटकर उसमें नमक-मिर्ची लगाया जाता था, तो वो स्वाद आज भी जीभ के डीएनए में दर्ज है। वैसा स्वाद आज भी नहीं मिल पाता, क्योंकि उन दिनों खीरों के ऊपर एक खास किस्म के रोए हुआ करते थे।

​इन सारे व्यंजनों और उनकी स्मृतियों के साथ एक बार मैं अपने परिवार के साथ राजिम से गुजर रहा था। गंज रोड के पास अचानक एक ठेले पर मेरी नजर पड़ी, और मुझे अपने बचपन का वही मित्र मिम्मी मिल गया, जिसने मुझे कोकड़ों और गिद्धों के बीच का अंतर समझाया था।

बुधवार, 5 अगस्त 2026

धतूरा

महाशिव का प्रिय,,विदेशी धतूरा

धतूरैः पूजनं शंभोः सर्वकामफलप्रदम्।
विषनाशकरं चैव सर्वसौभाग्यवर्धनम्॥
(अर्थात: भगवान शिव का धतूरे के फूलों या फलों से पूजन करना सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला, विष—यानी नकारात्मकता और कष्टों—का नाश करने वाला तथा समस्त सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।)
​भगवान शिव को धतूरा अर्पित करने का महात्म्य दर्शाने वाला यह प्राचीन श्लोक  है। परंतु यह आश्चर्यजनक है कि महादेव का प्रिय धतूरा मूलतः भारतीय ही नहीं है, बल्कि यह प्रशांत महासागर के उस पार स्थित अमेरिका महाद्वीप के मैक्सिको की मूल प्रजाति है, जिसका वैज्ञानिक नाम डातुरा स्ट्रामोनियम (Datura stramonium) है। पशुपति नाथ की सेंधव मुहरों से लेकर ऋग्वेद के रुद्र शिव तक भारत में शैव पूजा का हजारों वर्ष प्राचीन इतिहास है इसी कारण शिव आदिदेव भी कहे जाते है परन्तु धतूरे को वनस्पति शास्त्री मूलतः मेक्सिको का पौधा बताते है जो बाद में भारत पहुंचा,,परन्तु प्रश्न है कब और कैसे
​लगभग दो हज़ार वर्षों पहले इसका उल्लेख चरक संहिता में 'उन्मत्त' या 'धत्तूर' के रूप में मिलता है, जो इसे भ्रम पैदा करने वाली औषधि बताते हैं। वहीं, महर्षि सुश्रुत इसे कुत्तों के काटने से होने वाले रोग 'रेबीज' के उपचार में उपयोगी मानते हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र के अनुसार, नागरक या शहरी लोग धतूरे को तांबूल (पान) के साथ मिलाकर एक सुगंधित लेप तैयार करते थे। महाकवि बाणभट्ट अपनी रचना 'हर्षचरित' में विंध्यांचल के वनों की आटविक (जंगली) जातियों द्वारा तंत्र में प्रयुक्त औषधि के रूप में इसका उल्लेख इस प्रकार करते हैं:
​उद्गत-धत्तूर-प्ररोह-संकुलैः, प्रगुणीकृत-शबर-पल्लव-कुटीरैः...
(भावार्थ: वह विंध्य के जंगल का क्षेत्र था, जो बाहर निकले हुए धतूरे के पौधों के अंकुरों से घिरे हुए थे और जहाँ शबरों—जंगली जातियों—की पत्तों से बनी कुटियाएँ थीं...)
​चोल काल के प्रसिद्ध ऐरावतेश्वर मंदिर में भगवान शिव की कंकाल मूर्ति की जटाओं और आभूषणों में धतूरे के फूल का अंकन मिलता है। इन साक्ष्यों से यह ज़ाहिर है कि धतूरा ईस्वी सन के आस-पास ही भारत भूमि में आ चुका था, जबकि इसके पहले वेदों, उपनिषदों या फिर सैन्धव सभ्यता में यह पूर्णतः अनुपस्थित मिलता है। प्रश्न यह है कि फिर यह आदिदेव शिव का प्रिय फूल कैसे हुआ?
​कोलम्बस की अमेरिका की खोज (1492 ईस्वी सन) के बाद ही 'नई दुनिया' की वनस्पतियां एशिया और यूरोप के संपर्क में आईं, जिसमें आलू, टमाटर, मिर्च, कद्दू से लेकर तंबाकू जैसी आज की प्रचलित किस्में शामिल हैं। फिर धतूरा ईस्वी सन की शुरुआत में भारत तक कैसे पहुंचा? क्या प्री-कोलम्बस काल में भी अमेरिकी महाद्वीप से भारतीय संपर्क हुआ था? यह इतिहास की एक अबूझ पहेली है। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के नवीन अनुसंधानों में यह साबित हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया के मूल नेटिव आदिवासियों में लगभग चार हजार साल पहले भारतीय डीएनए पाए गए हैं, जो द्रविड़ एवं तटीय भारतीय व्यापारिक संबंधों की पुष्टि करते हैं, परंतु मैक्सिको के संदर्भ में ऐसे किसी भी आदान-प्रदान के साक्ष्य कोलम्बस से पहले नहीं मिलते।
​हालांकि, ऐसी विकास अवधारणाओं को 'अभिसारी विकास' (Convergent Evolution) के रूप में भी देखा जाता है। जब अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले जीवों या पौधों को पर्यावरण, जलवायु या जीवनशैली की लगभग एक जैसी चुनौतियाँ मिलती हैं, तो प्रकृति उन्हें जीवित रहने के लिए समान शारीरिक या जैविक रूप ढालने पर मजबूर कर देती है। भारत एवं मैक्सिको दोनों देश उत्तरी गोलार्ध में लगभग एक ही अक्षांश बैंड के आसपास आते हैं, जिसके कारण दोनों जगहों पर उष्णकटिबंधीय (Tropical) और उपोष्णकटिबंधीय (Subtropical) प्रकार की जलवायु का प्रभाव देखने को मिलता है। इसके प्रभाव से दोनों जगहों पर अगेवे (Agave), कैक्टस (जिससे वहाँ की शराब 'टकीला' बनती है), और कपास जैसी प्रजातियाँ अपनी विशेषताओं के साथ पनपीं।
​जैसे हमारे धार्मिक प्रयोजनों में धतूरा भगवान शिव को समर्पित होता है, ठीक वैसे ही विशेषकर एज़्टेक और वहाँ की अन्य स्थानीय संस्कृतियों में धतूरे (जिसे स्थानीय भाषा में 'तोलुआत्ज़िन' / Toloatzin या 'तलोअचे' / Toloache कहा जाता है) का उपयोग एक पवित्र और मादक पौधे के रूप में किया जाता था। हिंदू धर्म में जैसे धतूरे को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता है और अनुष्ठानों व पूजन में इसका विशेष स्थान है, उसी प्रकार मैक्सिको की प्राचीन मान्यताओं में यह पौधा मुख्य रूप से मौत, अंडरवर्ल्ड (पाताल लोक), और अंधकार या रात की शक्तियों से जुड़े देवताओं से जुड़ा हुआ था।
​इससे जुड़े प्रमुख देवता निम्नलिखित हैं:
​ओमेटेकुटली (Omeyocan): शक्तियों से जुड़े देवी-देवता। एज़्टेक पौराणिक कथाओं में धतूरे जैसे शक्तिशाली मतिभ्रम पैदा करने वाले पौधों को पाताल लोक और रहस्यों के देवताओं के अधीन माना जाता था।
​ यद्यपि धतूरा सीधे तौर पर किसी एक एकल मदेवता का 'प्रिय फूल' नहीं था, लेकिन इसके अनुष्ठानिक उपयोग मुख्य रूप से मृत्यु के देवता (मिक्ट्लांतेकुत्ली) और वर्षा एवं सृजन के देवता (टलालोक) से जुड़े कर्मकांडों में भविष्य देखने (Divination), आत्माओं से संपर्क करने और चेतना को शून्य में ले जाने के लिए किए जाते थे।
​सांस्कृतिक समानता की बात करें तो जैसे भारत में शिव को अघोर, योग, वैराग्य और चेतना की ऐसी अवस्था का प्रतीक माना जाता है जहाँ सामान्य नियम लागू नहीं होते, वैसे ही मैक्सिको के आदिवासी और तांत्रिक अनुष्ठानों में धतूरे का उपयोग करने वाले पुरोहित (शामन) इसे पारलौकिक दुनिया (Spirit World) के द्वार खोलने वाली जड़ी-बूटी मानते थे। एज़्टेक संस्कृति में इसे एक पावन लेकिन अत्यंत खतरनाक देवता की देन माना जाता था, जिसके गलत इस्तेमाल पर भारी प्रकोप का डर होता था। माया सभ्यता में प्रजनन और सृजन के देवता 'चाक' के मंदिर इस तरह स्थापित किए जाते थे कि उन पर लगातार बारिश का जल गिर सके। धतूरा इन सभ्यताओं में अनुष्ठानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
​तो क्या ये सांस्कृतिक समानताएं किसी ऐसे 'घोस्ट डीएनए' (Ghost DNA) से जुड़ी हैं जिसकी पहचान अब तक नहीं हो पाई है? नौवीं-दसवीं शताब्दी में स्कैंडिनेविया के वाइकिंग्स ने ज़रूर अमेरिका में अपनी बस्ती बसाई थी, पर हमारा धतूरा उससे बहुत पहले ही भारत भूमि पहुंच चुका था। पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन से निकले विष पान के कारण भगवान शिव को 'नीलकंठ' कहा गया है। कालकूट विष की उष्णता इतनी अधिक थी कि देवताओं और ऋषियों ने शिवजी की इस महापीड़ा को शांत करने के लिए उन्हें ठंडी प्रकृति वाली और विष का प्रभाव काटने वाली औषतियाँ अर्पित कीं। कालकूट विष के प्रचंड ताप से पीड़ित शिवजी की पीड़ा को शांत करने में धतूरे ने अपनी मुख्य भूमिका निभाई, इसलिए भगवान शिव को धतूरा अतिप्रिय माना गया है।
​हैरत की बात यह है कि धतूरे की तरह ही पीला कनेर का फूल भी मैक्सिको से पुर्तगालियों द्वारा पंद्रहवीं सदी में ही आया था (हालांकि सफेद कनेर भारत में पहले से होता था) और यह पीला कनेर भी शिव पूजन में अत्यधिक लोकप्रिय है। आखिरकार 'द विंची कोड' की तरह के इस रहस्य, भगवान शिव की मैक्सिकन संस्कृति से साम्यता और धतूरे की इस अलौकिक-अज्ञेय यात्रा के कई प्रश्न अभी सुलझने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।किसी जीव द्वारा या समुद्र में बह कर आने के विषय पर शोध आवश्यक है इसलिए  मध्य काल के कवि बिहारीदास के शब्दों में—
​कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय,
वा खाए बौराय जग, इहि पाए बौराय।
​इसी 'कनक' (धतूरे) की मादकता का भारत में विशेष धार्मिक व सांस्कृतिक प्रभाव आज भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

धतूरा

धतूरैः पूजनं शंभोः सर्वकामफलप्रदम्।

विषनाशकरं चैव सर्वसौभाग्यवर्धनम्॥


​(अर्थात: भगवान शिव का धतूरे के फूलों या फलों से पूजन करना सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला, विष (नकारात्मकता और कष्टों) का नाश करने वाला तथा समस्त सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।) भगवान शिव को धतूरा अर्पित करने का महात्म्य दर्शाने वाला यह श्लोक शिव पुराण से है ,,पर यह आश्चर्यजनक है कि महादेव का प्रिय धतूरा ,,,मूलतः भारतीय ही नहीं है यह तो प्रशांत महासागर के उस पार स्थित अमेरिका महाद्वीप के मेक्सिको की मूल प्रजाति है ,,,जिसका वैज्ञानिक नाम है डातुरा स्ट्रामोनियम (Datura stramonium) ,,,लगभग दो हज़ार वर्षों पहले इसका उल्लेख चरक संहिता में उन्मत्त या धत्तूर के रूप में मिलता है जो इसे भ्रम पैदा करने वाली ओषधि बताते है वहीं महर्षि सुश्रुत इसे कुत्तों के काटने से होने वाले रोग रेबीज के उपचार में उपयोगी मानते है,,वात्स्यायन के कामसुत्र के अनुसार नागरक या शहरी लोग धतूरे को ताम्बूल पान के साथ मिला कर एक सुगंधित लेप तैयार करते थे,,महाकवि बाणभट्ट अपनी रचना हर्ष चरित्र में विंध्यांचल के वनों के आट विक जनजातियों द्वारा तंत्र में प्रयुक्त ओषधि के रूप में इसका उल्लेख करते है

उद्गत-धत्तूर-प्ररोह-संकुलैः, प्रगुणीकृत-शबर-पल्लव-कुटीरैः...


​(भावार्थ):

(वह विंध्य के जंगल का क्षेत्र था, जो बाहर निकले हुए धतूरे के पौधों के अंकुरों से घिरे हुए थे और जहाँ शबरों (जंगली जातियों) की पत्तों से बनी कुटियाएँ थीं...)

चोल काल के प्रसिद्ध ऐरावतेश्वर मंदिर में भगवान शिव की कंकाल मूर्ति की जटाओं और आभूषण में धतूरे के फूल का अंकन मिलता है इन साक्ष्यों से ये जाहिर है कि धतूरा ईस्वी संवत् के आस पास से भारत भूमि में आ चुका था,,इसके पहले वेदों या उपनिषदों में या फिर सैन्धव सभ्यता में यह पूर्णतः अनुपस्थित मिलता है,,, प्रश्न यह है कि फिर यह आदिदेव शिव का प्रिय फूल कैसे हुआ

कोलम्बस की अमेरिका की खोज 1492 ईस्वी संवत् के बाद ही नई दुनियां की वनस्पतियां एशिया और यूरोप के संपर्क में आई,,जिसमें आलू टमाटर मिर्च ,,कद्दू से लेकर तंबाकू जैसी आज की प्रचलित किस्में शामिल है,,,फिर धतूरा कैसे ईस्वी संवत् की शुरूआत में भारत तक पहुंचा,,,क्या प्री कोलम्बस टाइम में भी अमेरिकन महाद्वीप से भारतीय संपर्क हुआ ,,यह इतिहास की अबूझ पहेली है,,,मेक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के नवीन अनुसंधानों में यह साबित हुआ है कि आस्ट्रेलिया के मूल नेटिव आदिवासियों में लगभग चार हजार साल पहले भारतीय डी एन ए पाए गए है जो द्रविड़ एवं तटीय भारतीय व्यापारिक संबंधों की पुष्टि करते है,,पर मेक्सिको के संदर्भ में ऐसे किसी भी आदान प्रदान के साक्ष कोलम्बस के पहले नहीं  मिलते,,,

हालांकि ऐसी विकास अवधारणाओं  को  "अभिसारी विकास" (Convergent Evolution) के रूप में भी देखा जाता है

​जब अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले जीवों या पौधों को पर्यावरण, जलवायु या जीवनशैली की लगभग एक जैसी चुनौतियाँ मिलती हैं, तो प्रकृति उन्हें जीवित रहने के लिए समान शारीरिक या जैविक रूप ढालने पर मजबूर कर देती है। भारत एवं मेक्सिको दोनों देश उत्तरी गोलार्ध में लगभग एक ही अक्षांश बैंड के आसपास आते हैं, जिसके कारण दोनों जगहों पर उष्णकटिबंधीय (Tropical) और उपोष्णकटिबंधीय (Subtropical) प्रकार की जलवायु का प्रभाव देखने को मिलता है।और इसके प्रभाव से दोनों जगह अगेवे (Agave) या फिर एक कैक्टस जिससे वंहा की शराब टकीला बनती है या फिर कपास जो दोनों ही ओर अपनी विशेषताओं के साथ पनपा ,,,

जैसे हमारे धार्मिक प्रयोजनों में धतूरा भगवान शिव को समर्पित होता है ठीक वैसे ही विशेषकर एज़्टेक और वहाँ की अन्य स्थानीय संस्कृतियों) में धतूरे (जिसे स्थानीय भाषा में 'तोलुआत्ज़िन' / Toloatzin या 'तलोअचे' / Toloache कहा जाता है) का उपयोग एक पवित्र और मादक पौधे के रूप में किया जाता था।

​हिंदू धर्म में जैसे धतूरे को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता है और उनके अनुष्ठानों या पूजन में इसका विशेष स्थान है, उसी प्रकार मेक्सिको की प्राचीन मान्यताओं में यह पौधा मुख्य रूप से मौत, अंडरवर्ल्ड (पाताल लोक), और अंधकार या रात की शक्तियों से जुड़े देवताओं से जुड़ा हुआ था।

​इससे जुड़े प्रमुख देवता

  • ​टिकटेलहोएके (Tloque Nahuaque) या ओमेटेकुटली (Omeyocan शक्तियों से जुड़े देवी-देवता): एज़्टेक पौराणिक कथाओं में धतूरे जैसे शक्तिशाली मतिभ्रम पैदा करने वाले पौधों को पाताल लोक और रहस्यों के देवताओं के अधीन माना जाता था।
  • ​टलालोक (Tlaloc) और मिक्ट्लांतेकुत्ली (Mictlantecuhtli): यद्यपि धतूरा सीधे तौर पर किसी एक एकल देवता का 'प्रिय फूल' नहीं था जैसे शिव का माना जाता है, लेकिन इसके अनुष्ठानिक उपयोग मुख्य रूप से मृत्यु के देवता (मिक्ट्लांतेकुत्ली) और वर्षा एवं सृजन के देवता (टलालोक) से जुड़े कर्मकांडों में भविष्य देखने (Divination), आत्माओं से संपर्क करने और चेतना को शून्य में ले जाने के लिए किए जाते थे।

​सांस्कृतिक समानता:

जैसे भारत में शिव को अघोर, योग, वैराग्य और चेतना की ऐसी अवस्था का प्रतीक माना जाता है जहाँ सामान्य नियम लागू नहीं होते, वैसे ही मेक्सिको के आदिवासी और तांत्रिक अनुष्ठानों में धतूरे का उपयोग करने वाले पुरोहित (शामन) इसे पारलौकिक दुनिया (Spirit World) के द्वार खोलने वाली जड़ी-बूटी मानते थे। एज़्टेक संस्कृति में इसे एक पावन लेकिन अत्यंत खतरनाक देवता की देन माना जाता था जिसके गलत इस्तेमाल पर भारी प्रकोप का डर होता था। माया सभ्यता के देवता प्रजनन और सृजन के देवता चाक तो लींग की तरह मंदिरों के छत के नीचे स्थापित किये जाते थे जिस पर बारिश का जल सतत गिरता था,,,धतूरा इन सभ्यताओं में  अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण हिस्सा था,, फिर क्या ये सांस्कृतिक समानताएं किसी ऐसे भूतहा डी एन ए (गोस्ट डी एन ए) से जुड़ी है जिसकी पहचान अब तक नहीं हो पाई है,,,नवी दसवीं शताब्दी में स्कैंडिनेविया के वाइकिंग्स ने जरूर अमेरिका में अपनी बस्ती बसाई थी,,पर हमारा धतूरा उससे बहुत पहले ही भारत भूमि पहुंच चुका था,,पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन से निकले विष पान के कारण भगवान शिव को नील कंठ कहा गया है हलाहल विष की उष्णता इतनी अधिक थी कि देवताओं और ऋषियों ने शिवजी की इस महापीड़ा और शरीर की उष्णता को शांत करने के लिए उन्हें ठंडी प्रकृति वाली और विष का प्रभाव काटने वाली औषतियाँ अर्पित कीं।कालकूट विष के प्रचंड ताप से पीड़ित शिवजी की पीड़ा को शांत करने में धतूरे ने अपनी भूमिका निभाई, इसलिए भगवान शिव को धतूरा अतिप्रिय माना गया है। हैरत यह है कि धतूरे की तरह पीला कनेर का फूल भी मेक्सिको से पुर्तगालियों द्वारा पन्द्रहवीं सदी में ही आया,,हालांकि सफेद कनेर भारत में होता था,,और यह पीला कनेर भी शिव पूजन में लोकप्रिय है आखिरकार इस विंची कोड की तरह के रहस्य ,,भगवान शिव की मेक्सिकन संस्कृति से साम्यता और ,,,धतूरे के इस अलौकिक अज्ञेय यात्रा के कई प्रश्न अभी सुलझने की प्रतीक्षा कर रहे है

मध्य काल के कवि बिहारीदास के शब्दों में ,,कनक कनक के सौ गुणी ,,मादकता अधिकाय

एक खाए बोराय नर ,,एक पाए ब्यौराय की तर्ज में,,,इस कनक की मादकता का भारत में विशेष धार्मिक सांस्कृतिक प्रभाव आज भी देखा जा सकता है

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

बांस की करिल कब उगेगी

शीर्षक: बांस की करिल कब उगेगी

धरती को बुनियादी तौर पर एक रास्ते ने बाँट दिया—
फिर सरहदों ने…
और उनके बीच कहीं
जैव विविधता भी बिखरती चली गई।

अधूरे से बंटे हुए जंगल—
जिन्हें एक राजमार्ग ने चीर दिया;
दुनिया की तरह अक्षांश-देशांतर में बँटे हुए—
एक ओर बार नवापारा का अभ्यारण्य,
दूसरी ओर दूर तक फैली कोमाखान तहसील।

धरती अब बँट चुकी है
और उसके साथ
उसकी विविधता भी।

जब हवा बहती है
तो बांस कस-मसाते हैं—
फिर मानसूनी मेघ फूट पड़ते हैं…
और उन्हीं के बीच
बांसों का बच्चा—करील
चुपचाप जन्म लेता है।

कोमल, पतला…
जैसे हरियाली की जिद।

अंदर तहसील में एक तख़्त रहा—
जिसे टोडर मल ने एक पदवी दी थी…
तहसीलदार।

यही तख़्त
जमीनी मामलों में फैसले लेता आया है—
करीब पाँच सौ बरस की एक न्याय प्रणाली,
जिसे न मुग़ल बदल पाए…
न अंग्रेज।

लोहे की ज़रीबों की जुगलबंदी में
नापी जाती रही ज़मीन—
और उसी के साथ
कई चीज़ें पहले से तय होती रहीं…

कोमाखान तहसील का बरामदा भीड़ से भरा था।

एक बुज़ुर्ग आदमी दीवार के सहारे खड़ा था—
हाथ में विचित्र चित्तीदार दरख़्वास्त…
जैसे बांस की नई उगती कलम—
करील की तरह कोमल…

कुछ फैसले आदमी नहीं चुनता—
वे कहीं दर्ज होते हैं पहले से…
कभी खसरे में…
कभी रकबे में…
और कभी… बस हालात में।

भीतर कमरे में तहसीलदार बैठे थे।

फाइल खुली—
“अभिलेख अपूर्ण।”
“पुनः परीक्षण आवश्यक।”

और दूसरी तरफ—
उसी जमीन पर एक और दावा।

बाहर से आवाज़ गूंजी—
“उल्लन पटेल… हाज़िर हो!”

भीड़ सरकी।

पीछे खड़े लोग बुदबुदाए—
“मामला में पेच है…”
“इस डोकरे को दुनियादारी समझाना मुश्किल है…”

एक हंसी—
“ये उस मुक़द्दर से भिड़ गया है
जिसे पटवारी लिखता है…”ब्रह्मा नहीं

कमरे में
कलम कुछ पल रुकी रही।

फाइल पर दर्ज हुआ—
“प्रस्तुत अभिलेख अपर्याप्त, प्रकरण अवलोकनार्थ।”

बस इतना।

बाहर फिर आवाज़ आई—
“महंगू केवट… हाज़िर हो!”

भीड़ आगे बढ़ी।

वो बुज़ुर्ग कुछ पल दरवाज़े पर खड़ा रहा—
फिर अपनी चित्तीदार दरख़्वास्त सीने से लगाकर
चुपचाप बाहर निकल गया।

खिड़की के बाहर
बांस हिल रहे थे…
और उनके नीचे
कुछ करील अब भी उग रहे थे।

करील के उगने की तारीख़ तय नहीं होती,
न मौसम उसकी इजाज़त मांगता है—
पर मुकदमे…
उफ़्फ़…
न उनकी तारीख़ तय होती है,
न उनका मौसम।

शनिवार, 14 मार्च 2026

मृत्यु आने न देना

हे देव,,अब मृत्यु आने न देना
जीवन रहे सदा निरंतर
कभी मृदा होकर सो जाऊ
कभी लहर उफन बह जाऊ
कभी फूल कभी तितली सा बिखरू 
कभी पतझड़ बन कर बिछ जाऊं
मुझे अहसास सा अमृत देकर
मिटा भी देना बना भी देना
मेधा देकर मानुष जना 
पर अपना अस्तित्व गंवाया मैने
अब जब फिर रच जाऊंगा
विभग,,, वृक्ष सा स्मृति लेकर
तब सबके साथ चलूंगा
निर्भीक होकर निश्चिंत होकर


सोमवार, 2 मार्च 2026

पाटा टू पाटा

इस पाटे से उस पाटे तक,,
किस्सा वही पुराना था
कहीं मेरा खंजर लाल हुआ
कही तेरा चूतड जाना था

उम्मीदों की तकरीरें थी
मै भी दादा बन जाऊंगा
संघर्षों की इस तपोभूमि में
थाने का डंडा खाना था

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026


वो पहली मुहब्बत थी याकि पहली बियर
जरा कहिए कैसे भूल जाए
गहरे कुएं सी प्यास थी जन्मों जनम की
और तेरी भूरी बोतल ,
,पसीने से लथपथ
लंगड़ी स्टूल पर तली फल्लियों के संग पेश हुई
वो कमबख्त खट्ट का शोर 
ढक्कन उछल कर अरमानों को झकझोर गया 
मग भी छुक सदका कर बैठा,,
सुनहरी धार जैसे सोने का लहू
बुलबुले ख्वाब के माफिक क्या कन्हू 
फिर पहली चुस्की तबस्सुम सी,, होठों पे जा लगी
आय हाय,,,,,
जरा खट्टी जरा कड़वी 
हलक को खुरदुराते गुजर ली जिस तमीज से
हर जर्रा हिल गया बवाल हुआ
कभी जो मदहोशी 
हमने तो तेरी आंखों में कभी झांकी थी
आज फिर वही अहसास वही कमाल हुआ
दो मग हलाक हुए  जन्नत जमी उतर आया
तेरे जस्बातो से शख्सियत का सवाल हुआ
या तू हकीकत है ,,या वो 
खैर रहने दे ,,,तेरे जाने का गम 



शनिवार, 24 जनवरी 2026

घर लौट कर आना,,तुम्हारे करीब

मै कोलाहल और शोर छोड़ कर आया हु
दुनियावी हर मोह छोड़ कर आया हु
हर उलझन उपापोह छोड़ कर आया हु
तुम बस थोड़ा सा भात पसा लेना
कांसे की थाली पे भाजी चौलाई की
हम कौर बना बना कर खा लेंगे
यूं साथ रहा तो 


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्रकाशित

मै प्रकाशित होने खातिर नहीं लिखता
मै प्रकाशित होने को लिखता हु ,,खुद से