मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

जोशी जी

भृगु परबत की बर्फीली अंसुआती चोटियों के नीचे, बालगंगा की धार उस दिन अचानक अकट-सकट होकर बहने लगी थी।

​पहाड़ का मिज़ाज ही कुछ ऐसा ठहरा—कब धूप छितरा जाए और कब बादलों की मटमैली चादर पूरा अंचल ढँक ले, कोई न जाने! चौठारा गाँव की उस पथरीली, छीछली पगडंडी पर जब ओम प्रकाश ने बरसों बाद अपने पाँव धरे, तो सीढ़ीदार खेतों के ऊपर फैली बाँज और बुरांश की सोंधी हवा का एक झोंका उसकी देह को छुअत-छुअत निकल गया।

​अहा! वही चौठारा गाँव! भृगुपंथ और खैट परबत की छाँह में सिमटा हुआ, जहाँ किसी ज़माने में डेढ़ सौ परिवारों के ढोल-दमांऊ की थाप गूँजती थी। बूढ़े-पुरनिए कथा कहते कि इसी भृगु तुंग की गुफा में बैठकर महर्षि भृगु ने जग-जहान की जन्म-पत्री 'भृगु संहिता' बाँची थी। और वो खैट की धारी! जहाँ जीतू बगड़वाल की बांसुरी बजते ही परियाँ (आंछरियाँ) आंचल लहराती उतर आती थीं।

​गाँव के चौपाल में जगरिया जब थाली पर काँसे की डंडी मारता, तो ओम प्रकाश के बाल-मन में वो बोल सदा-सदा के लिए रच-बस जाते—

​सुणो सुणो, हे जीतू बगड़वाला!

बांसुरी बजै दे, खैट का धार मा।

​खैट की आंछरी, रूप की रानी,

मुरली की धुन मा, भई दीवानी।

रोपी का दिन ऐगे, शिरोमणि खेत मा,

वचन दीनि जीतू, आंछरी का हाथ मा...


​पहाड़ का वो फागुन भी बड़ा अलबेला होता! खेतों की मुँडेरों पर फागुन से बैशाख तक बुरांश के लाल-सुर्ख फूल ऐसे भभक उठते, मानो पूरे पहाड़ ने अबीर-गुलाल घोर रखा हो। चीड़ की पतली पत्तियों (पीरुल) की सरसराहट के बीच जब जाड़ों में पौष-माघ के दिनों बर्फ जमती, तो रात के सन्नाटे में आकाश गंगा (दुग्ध-मेखला) के नीचे सन्नाटा भी कुछ मीठा-मीठा फुसफुसाने लगता।

​"अरे पापा, मोबाइल में टावर ही नहीं आ रहा!" मैदानी ज़बान में पले-बढ़े बेटे ने अपने स्क्रीन से नज़रें हटाकर झल्लाते हुए कहा।

​ओम प्रकाश ने कोई जवाब न दिया। उसने बस एक ठंडी साँस ली और अपनी आँखें मूँद लीं। उसका मन तो भीतर ही भीतर कौंध उठा—'अरे, इस घाटी के वो चटक लाल बुरांश के फूल कहाँ बिला गए? वो कलीज, कोकलास, मोनाल और कस्तूरी हिरण कहाँ चले गए? क्या पहाड़ की ये सुंदरियाँ और चंचल जीव भी इंसानों से मुँह मोड़कर इस घाटी को वीरान छोड़ गए?'

​उसकी आँखों के आगे तो पचास साल पुराना चौठारा गाँव सजीव हो उठा था।

​अहा रे! वो भटगाँव के प्राइमरी स्कूल का रास्ता! रास्ते में कुखली धार की सघन झाड़ियों के पीछे कभी काले भालू की घुरघुराहट गूँजती, तो कभी पगडंडी के ऐन मोड़ पर विशालकाय गुलदार (तेंदुआ) आ बैठता। सुनहरी छल्लीदार देह पर ढलती धूप की किरणें चमचमातीं और पीली बेधती आँखें सीधे ओम और उसके संगियों पर गड़ जातीं। पर पहाड़ के छौने (बच्चे) भी किस मिट्टी के बने थे! न कोई चीख, न पाँव पीछे खींचना। बिना पलक झपकाए, अपनी छाती तानकर उस गुलदार के ऐन सामने डटे रहना! वही तो पहाड़ी जिगर था, जिसे देखकर जंगल का राजा भी चुपचाप घने बांज के जंगल की ओर मुड़ जाता।

​मास्टर जी की छड़ी से बचकर दबे पाँव भागना, मकई के भुट्टे चुराकर बालगंगा की रेती पर आग में भूनना, और ठंडे पारदर्शी पानी में तैरती 'असोला' (स्नो ट्रौट) और सुनहरी महाशीर मछलियों के पीछे नंगे पाँव दौड़ना... काफल और हिसार की झाड़ियों से खट्टे-मीठे दाने तोड़कर खाना, वैद्य दादाजी से जड़ी-बूटियों की पहचान सीखना और उनके साथ बूढ़ाकेदार के दर्शनों की कथाएँ सुनना... और जिगरी यार कृपालु और मांगू के साथ की गई बदमाशियाँ।

​हाँ, फिर ज़माने का पहिया घूमा। पढ़ाई के लिए दिल्ली जाना पड़ा, फिर बंबई के ताज होटल में शेफ का काम और फिर छत्तीसगढ़ के गवर्नर हाउस के कैटरिंग मैनेजर की कुर्सी... जीवन शहर की आपाधापी में बीतता गया। पर ओम प्रकाश का मन तो हमेशा उसी पगडंडी पर अटका रहा।

​और आज? जब कुलदेवी की पूजा का संचित पुण्य लेकर वह गाँव लौटा, तो लगा जैसे उसकी जन्मभूमि का रूप ही किसी जादूगर ने बदल दिया हो।

​गाँव के पथरीले पटालों वाले आँगन गायब थे; उनकी जगह सीमेंट और लिंटर की रूखी गारा-मिट्टी खड़ी थी। न बकरियों की में-में थी, न कलीज और कोकलास की कूक। बालगंगा की जो धार कभी कल-कल छलका करती थी, वह अब पतले मैले नाले-सी सिमटकर सिसक रही थी। गाँव के बचे-खुचे चार-छह बुजुर्ग भी हाथ में चमकती काँच की स्क्रीन थामे चुपचाप बैठे थे—जैसी काठ की पुतलियाँ हों।

​पुराने यार कृपालु का घर सूना पड़ा था—वह सिंगापुर चला गया था, और मांगू बंबई के किसी बड़े होटल का मालिक बन बैठा था।

​दो दिन की पूजा क्या बीती, घर वाले छटपटाने लगे। "पापा, मोबाइल में टावर ही नहीं आ रहा!" बेटे की वही मैदानी उतावली आवाज़ बार-बार गूँज उठती।

​शाम ढलने को थी। खैट परबत और भृगु तुंग की चोटियों पर सिंदूरी धूप बुझ रही थी। ओम प्रकाश के कानों में अचानक जीतू बगड़वाल के उस आखरी पवाड़े के बोल कौंध गए—

​हाथ मा रोपी का पौधा छिन,

मुरली की तान गूंजी धार मा।

आकाश से उतरीं खैट की आंछरी,

जीतू ते ली गईं, उड़ै के सार मा...

​मातृ रोणी घर मा, बहिन सोबनी खोजणी,

जीतू बगड़वाल गै, परियों का लोक मा।


​ओम प्रकाश ने आगे बढ़कर गाँव की देहरी की थोड़ी सी पंकिल-सोंधी माटी चुटकी में उठाई और काँपते हाथों से अपने माथे से लगा ली।

​उसे लगा कि अब इस चौठारा गाँव के किसी जीतू को बांसुरी बजाने की ज़रूरत ही कहाँ पड़ी? खैट परबत की आंछरियाँ (परियाँ) इस बार नए रूप में आई थीं—शहर की चकाचौंध, नौकरियों के मोह और सपनों के जाल का रूप धरकर! और वे गाँव के एक-एक जीतू को उँगली पकड़कर अपने साथ उड़ा ले गईं। गाँव के सारे जीतू अब सिंगापुर, बंबई और दिल्ली के धुएँ में विलीन हो चुके थे, और पीछे छोड़ गए थे बस यह बेजान, खाली और ठंडा ढाँचा।

​पगडंडी की पहली सीढ़ी पर पहला कदम बढ़ाते ही ओम प्रकाश की आँखें डबडबा आई थीं। गालों पर ढुलक आए दो गर्म अंसुवा माटी के उस अंचल को आखिरी अर्घ्य दे रहे थे।

​तभी पीछे मुड़कर देखा तो भृगु परबत पर बर्फ का एक कातर टुकड़ा शाम के सन्नाटे में पिघल रहा था। ओम प्रकाश का मन एक अनसुलझे प्रश्न के सामने ठिठककर खड़ा हो गया—क्या शहर की आंछरियों के मोह में अपनी जड़ों को छोड़ चुके ये तमाम जीतू बगड़वाल कभी लौटकर अपनी बालगंगा की धार को फिर से ज़िंदा कर पाएँगे, या यह चौठारा गाँव ऐसे ही हमेशा के लिए पत्थरों का एक वीरान खाका बनकर रह जाएगा?

​इसी आकुल प्रश्न और भीनी सी गंध को अपनी छाती में भींचकर, ओम प्रकाश अपने उजड़े बचपन के अवशेषों को पीछे छोड़ता हुआ, भारी कदमों से मटमैली शहर की धुंध की ओर बढ़ गया।

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