शनिवार, 7 नवंबर 2026

इस दीवाली

इन दिनों

कई सोच है, कई बोझ है,

अब तो सड़क पे कॉकरोच है।

जेन जन्मते ही,  जी हुआ,

जो AI ने कहा, वही हुआ!

​ट्रम्प हार गए सीनेट में, ईरान में फूटे बम,

यूक्रेन में आतिशबाज़ी देखो, पुतिन नहीं किसी से कम!

​क्यूँ मनाऊँ दीपावली ऐसे मिसाली साल में?

जब बम फूटते रहे दुनिया के हर अख़बार में!

​3. संवेदनशीलता और ज़मीनी दर्द (भावुक हिस्सा)

​(यहाँ आवाज़ को थोड़ा धीमा, गंभीर और संवेदना से भरा रखें)

​"पर सिर्फ़ दुनिया की राजनीति ही नहीं साहब, हमारे आसपास की तस्वीरें भी दिल दुखाती हैं..."

​कई घरों में आज भी अम्मा बैठी आस लगाए,

सात समुंदर पार है बेटा,  इस दिवाली घर आए।

​कई घरों के बच्चे कचरों में खोज रहे फ़टाके,

पिता नहीं हैं, बुझी हुई हैं उनकी माँ की आँखें!

​4. लोक-रंग और समाधान (सकारात्मक समापन)

​(आवाज़ में वापस एक दृढ़ता, मिठास और उम्मीद की किरण लाते हुए)

​वक्त की मंज़िलों को कोई अहसास दे दे,

लोक भवन में लोक तत्व को आज आग़ाज़ दे दे।

​हमें क्या इन बन्दूकों से, हमें क्या इस तकरार से,

ज़रूरत है कि कोई समारू और बुधारु को आवाज़ दे दे!

​दीपावली तो वो जगमग हो, जब स्नेह का दीप जलाएँ,

खोजें ऐसा आँगन, जिसके अरमान आप भर पाएँ!

​जब समारू-बुधारु के छप्पर पे भी इक दीप चमकेगा,

तब इस पूरी दुनिया में सच्चे अर्थों में अमन महकेगा!

​शुभ दीपावली! जय हिंद, जय छत्तीसग