इन दिनों
कई सोच है, कई बोझ है,
अब तो सड़क पे कॉकरोच है।
जेन जन्मते ही, जी हुआ,
जो AI ने कहा, वही हुआ!
ट्रम्प हार गए सीनेट में, ईरान में फूटे बम,
यूक्रेन में आतिशबाज़ी देखो, पुतिन नहीं किसी से कम!
क्यूँ मनाऊँ दीपावली ऐसे मिसाली साल में?
जब बम फूटते रहे दुनिया के हर अख़बार में!
3. संवेदनशीलता और ज़मीनी दर्द (भावुक हिस्सा)
(यहाँ आवाज़ को थोड़ा धीमा, गंभीर और संवेदना से भरा रखें)
"पर सिर्फ़ दुनिया की राजनीति ही नहीं साहब, हमारे आसपास की तस्वीरें भी दिल दुखाती हैं..."
कई घरों में आज भी अम्मा बैठी आस लगाए,
सात समुंदर पार है बेटा, इस दिवाली घर आए।
कई घरों के बच्चे कचरों में खोज रहे फ़टाके,
पिता नहीं हैं, बुझी हुई हैं उनकी माँ की आँखें!
4. लोक-रंग और समाधान (सकारात्मक समापन)
(आवाज़ में वापस एक दृढ़ता, मिठास और उम्मीद की किरण लाते हुए)
वक्त की मंज़िलों को कोई अहसास दे दे,
लोक भवन में लोक तत्व को आज आग़ाज़ दे दे।
हमें क्या इन बन्दूकों से, हमें क्या इस तकरार से,
ज़रूरत है कि कोई समारू और बुधारु को आवाज़ दे दे!
दीपावली तो वो जगमग हो, जब स्नेह का दीप जलाएँ,
खोजें ऐसा आँगन, जिसके अरमान आप भर पाएँ!
जब समारू-बुधारु के छप्पर पे भी इक दीप चमकेगा,
तब इस पूरी दुनिया में सच्चे अर्थों में अमन महकेगा!
शुभ दीपावली! जय हिंद, जय छत्तीसग