सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

तीन पत्तियों की कहानी

भारतीय थाली में तीन पत्तियों की कहानी:   रसा का  झोल

​भारतीय भोजन केवल जिह्वा के जायके की कला ही नहीं है , बल्कि भूगोल, वनस्पति शास्त्र, आयुर्वेद और इतिहास की एक अत्यंत सूक्ष्म व समृद्ध विज्ञान भी है। हमारे व्यंजनों को रूप, रस, गंध और रंग प्रदान करने वाली अनगिनत सामग्रियों में तीन पत्तियों का कब्जा है तेजपत्ता (तमालपत्र), करी पत्ता (कढ़ी पत्ता/मीठा नीम) और कसूरी मेथी।

​हालांकि ये तीनों पत्तियाँ रसोइयों में प्रायः 'तड़के' और छौंक' के लिए प्रयुक्त होती हैं, परंतु इनका इतिहास, इनकी वानस्पतिक पहचान, क्षेत्रीय विभाजन और पकाने की शैलियाँ भारतीय उपमहाद्वीप की विविधता को अद्भुत ढंग से रेखांकित करती हैं।

 भूगोल का जायका

​भारतीय उपमहाद्वीप के प्राकृतिक भूगोल ने अलग-अलग अंचलों को अलग-अलग वनस्पतियों से समृद्ध किया है। इन तीनों पत्तियों का वानस्पतिक चरित्र और इनका उद्गम क्षेत्र इनके प्रयोग को निर्धारित करता है:

  • ​तेजपत्ता (तमालपत्र - Cinnamomum tamala): यह मुख्यतः हिमालय के तराई क्षेत्रों, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर भारत (विशेष रूप से मेघालय और असम) के पहाड़ी ढलानों का वृक्ष है। यह दालचीनी के कुल का वृक्ष है, जिसकी पत्तियों पर लंबाई में तीन स्पष्ट समानांतर नसें (3 parallel veins) होती हैं।
  • ​करी पत्ता (मीठा नीम - Murraya koenigii): यह भारत का मूल (indigenous) झाड़ीदार पौधा है, जो मध्य, दक्षिण और प्रायद्वीपीय भारत के उपोष्णकटिबंधीय इलाकों में प्राकृतिक रूप से बहुतायत में उगता है। इसकी ताज़ा पत्तियों में एक तीखी, हर्बल और खट्टी-सोंधी सुगंध होती है।
  • ​कसूरी मेथी (Trigonella corniculata): यह सामान्य हरी मेथी से भिन्न, विशेष सोंधी सुगंध वाली मेथी की प्रजाति है, जिसकी खेती मुख्य रूप से राजस्थान के नागौर जिले में होती है। शुष्क और रेतीली जलवायु में उगने के बाद इसे सुखाकर पूरे देश में भेजा जाता है।

​उत्तर से दक्षिण का तड़का: तेजपत्ता बनाम करी पत्ता

  • ​उत्तर भारत और तेजपत्ता: उत्तर भारतीय, अवधी और मुग़लई शैलियों में गाढ़ी, गरम-मसाला प्रधान और समृद्ध ग्रेवी (सालन, कोरमा, राजमा, छोले) का वर्चस्व है। यहाँ तेजपत्ते को गरम तेल या घी में शुरुआत में ही खड़े मसाले के रूप में डाला जाता है। इसका काम पकाने की प्रक्रिया के दौरान अपनी काष्ठ-जैसी (woody), हल्की दालचीनी और लौंग-सदृश सुगंध को पूरे व्यंजन में घोलना है।
  • ​दक्षिण भारत और करी पत्ता: दक्षिण भारतीय, मराठी और तटीय व्यंजनों (सांभर, रसम, अवियल, पोहा, चेट्टिनाड करी) का आधार ताज़ा, सुपाच्य और खट्टा-नमकीन स्वाद है। यहाँ करी पत्ते को राई (सरसों) और हींग के साथ छौंक के रूप में अंत में या शुरुआत में डाला जाता है। यह नारियल, इमली और छाछ के साथ मिलकर व्यंजन को एक जीवंत (vibrant) ताज़गी देता है।

 प्राचीन तेजपत्ता बनाम नया भूमध्यसागरीय लाउरेल

​वैश्विक व्यापार और अनुवाद के कारण प्रायः 'Bay Leaf' शब्द को लेकर भ्रम उत्पन्न होता है। हालाँकि, वानस्पतिक और रसात्मक दृष्टि से भारतीय तेजपत्ता और भूमध्यसागरीय तेजपत्ता बिल्कुल अलग हैं:

  • ​भारतीय तेजपत्ता (Cinnamomum tamala): संस्कृत में 'तमालपत्र' कहलाने वाले इस पत्ते में मीठी, दालचीनी और लौंग जैसी सुगंध होती है। इसकी पहचान इसकी लंबाई में दौड़ने वाली तीन नसें हैं। जिसे तोड़ा जाता है हिमालय में होने वाली दाल चीनी के पेड़ से
  • ​भूमध्यसागरीय तेजपत्ता (Laurus nobilis): यह यूरोपीय, इटैलियन और पास्ता सॉस या स्ट्यू में इस्तेमाल होने वाला 'लाउरेल' पत्ता है। इसमें बीच में केवल एक मुख्य नस (single midrib) होती है और इसका स्वाद थोड़ा कड़वा, पाइन (चीड़) और नीलगिरी (eucalyptus) जैसा तीखा होता है।इसकी खेती बाद के समय में दक्षिण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में शुरू हुई

​ कसूरी मेथी का कसूर

​पारंपरिक दक्षिण भारतीय रसोई (जैसे उडुपी, तमिल या केरल साद्या) में कसूरी मेथी का प्रयोग लगभग शून्य रहा है। इसका कारण नागौरी मेथी की उपलब्धता का उत्तर भारतीय क्षेत्रों तक सीमित होना और दक्षिण में ताज़े करी पत्ते व धनिया की प्रचुरता थी।

​हालाँकि, आधुनिक खान-पान और रेस्तरां संस्कृति (Fine Dining) के आगमन से यह सीमाएँ धुँधली हुई हैं। आज हैदराबाद, बेंगलुरु या चेन्नई के रेस्तराओं में बनने वाले इंडो-मुग़लई व्यंजनों, बटर चिकन, पनीर कड़ाही या मखमली करी में कसूरी मेथी का भरपूर प्रयोग अंतिम 'गार्निश' और सोंधेपन (aromatic finish) के लिए किया जाता है।

​रस और खसखस 

​इन पत्तियों का प्रयोग विभिन्न प्रकार के 'रसों' (Liquid Bases/Gravies) की प्रकृति के अनुसार तय होता है। भारतीय व वैश्विक भोजन में रसों का अपना एक समृद्ध वर्गीकरण है:

  • ​सालन: उर्दू/फ़ारसी परंपरा से निकला पूरा रसेदार व्यंजन (जैसे मिर्ची का सालन)।
  • ​तरी: किसी भी मसालेदार व्यंजन का ऊपरी, बहने वाला और तेल/मसाले से युक्त रस (Gravy)जिसमें तरावट हो,,
  • ​झोर / झोल: छत्तीसगढ़, बिहार, बंगाल और ओडिशा में प्रचलित बहुत ही पतला, सुपाच्य और पानीदार रस (जैसे माछेर झोल), जिसमें अक्सर करी पत्ते या पंचफोड़न का हल्का तड़का होता है।
  • ​करी: तमिल के 'कड़ि' (Kari) से निकला वैश्विक शब्द, जो मध्यम गाढ़ी मसालेदार ग्रेवी को दर्शाता है।इसमें नारियल और तिल का प्रयोग इसे विशिष्ट बनाता है अंग्रेजों ने यही शब्द सभी भारतीय तरियों के लिए अपना लिया
  • ​शोरबा: फ़ारसी 'शुरबा' से आया पतला, साफ़ और पीने योग्य सूप-नुमा रस, जो गरम मसालों और तेजपत्ते के अर्क से बनता है।
  • ​कोरमा: धीमी आंच पर दही, भुने प्याज, काजू/बादाम और घी के साथ पकाया गया अत्यंत गाढ़ा, शाही और मखमली व्यंजन ,,,इसमें खसखस का उपयोग खास है
  • कढ़ी: राजस्थान ,पंजाब ,गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़ तक जब दही या महि के साथ जब व्यंजन पकता है तो दक्षिण का करी पत्ता ,,कढ़ी पत्ता हो लेता है,,,अंतर इतना है उत्तर की कढ़ी ,,,गाढ़ी दही से और नीचे उतरते हुए छत्तीसगढ़ तक वह पतली मही में तब्दील हो जाती है

​प्राचीन साहित्य और आयुर्वेद 

​इन रसों और पत्तियों का इतिहास केवल आधुनिक रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रमाण प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं:

  • ​तमिल संगम साहित्य (1st-3rd Century CE): पट्टिनप्पालाई और अकनानूरु में 'कड़ि' (काली मिर्च से बने रस) और 'पुळिच्चाऋ' (आधुनिक रसम का पूर्वज) का उल्लेख मिलता है, जहाँ स्थानीय करी पत्ते और काली मिर्च का प्रयोग बहुतायत में था।
  • ​संस्कृत साहित्य व आयुर्वेद: चरक व सुश्रुत संहिता में पतले पाचक रसों को 'यूष' (दाल/सब्जी का काढ़ा) और 'रस' कहा गया। अमरकोश में तेजपत्ते को 'तमालपत्र' के रूप में सुगंधित औषधि माना गया। 12वीं सदी के चालुक्य नरेश सोमेश्वर रचित 'मानसोल्लास' में छाछ व बेसन से बने 'तक्र-साधित' व्यंजनों (कढ़ी) का वर्णन है।

​ वैश्विक रसों का  संसार

​जब हम भारतीय रसों की तुलना वैश्विक व्यंजनों से करते हैं, तो रसों का विकासवादी क्रम और स्पष्ट होता है:

  • ​सूप की उत्पत्ति और फ्रेंच/रशियन कोर्स सिस्टम: 18वीं सदी तक फ्रांस में सारा खाना एक साथ मेज पर सजाया जाता था (Service à la française)। 19वीं सदी में रशियन शैली (Service à la russe) के आने से भोजन को क्रमबद्ध (Sequence) परोसना शुरू हुआ—फर्स्ट कोर्स (सूप/स्टार्टर) → मेन कोर्स (सालन/करी) → डेजर्ट (मीठा)। भारतीय रसों में 'शोरबा' और 'रसम' सीधे तौर पर फर्स्ट कोर्स/सूप की श्रेणी में आते हैं।
    • ​पश्चिम (Gravy, Broth, Consommé, Bisque): पश्चिमी रसोई में रसों का आधार भुने मीट का अर्क (Pan drippings), हड्डियों का स्टॉक और मक्खन-आटे का घोल (Roux) होता है।
    • ​पूर्वी एशिया (Ramen Broth, Dashi, Pho): चीन, जापान और वियतनाम में रसों का आधार बिना अत्यधिक तेल के—सोयाबीन (मिसो), समुद्री शैवाल (Dashi/Kombu) या हड्डियों को 12-18 घंटे उबालकर निकाला गया उमामी अर्क होता है।

 'सॉस' भी कभी कढ़ी थी????

​पश्चिमी व्यंजनों का सास कभी कढ़ी नहीं थी,,इन सभी रसेदार व्यंजनों के मूल में तरल पदार्थों को निकालने और सुरक्षित रखने का इतिहास छुपा है:

  • ​जूस (Juice): लैटिन के iūs (रस/सूप) से निकला शब्द है, जो फ्रेंच jus से होता हुआ अंग्रेजी में आया। दिलचस्प बात यह है कि लैटिन का iūs और संस्कृत का 'यूष' (काढ़ा/सूप) दोनों एक ही भारोपीय (Indo-European) भाषा परिवार से जुड़े हैं।
  • ​अर्क बनाम जूस: जूस जहाँ यांत्रिक रूप से निचोड़ा गया ताज़ा गूदेदार रस है, वहीं अर्क (Distillate) भाप को ठंडा करके एकत्र की गई वाष्पशील औषधीय बूंदें (जैसे गुलाब अर्क) हैं।
  • ​सॉस की उत्पत्ति: दुनिया का पहला दर्ज सॉस ईसा पूर्व पहली शताब्दी में रोमन साम्राज्य का 'गरम' (Garum) था, जो मछली को नमक में फर्मेंट करके बनाया जाता था। लगभग उसी कालखंड में चीन में स्वतंत्र रूप से 'जियांग' और आगे चलकर कम खर्चीला 'सोया सॉस' का विकास हुआ, जो बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से जापान (शॉयु) और पूरे पूर्व एशिया में फैला।

​भारतीय भोजन में तेजपत्ता, करी पत्ता और कसूरी मेथी केवल तीन पत्ते नहीं हैं; वे भारत की जलवायु, वानस्पतिक विविधता और पाक-कला के दर्शन का प्रतीक हैं। तेजपत्ता जहाँ हिमालय की वादियों और उत्तर की शाही रसोइयों की गरिमा है, करी पत्ता प्रायद्वीपीय भारत की ताज़गी और आरोग्य का संवाहक है, वहीं कसूरी मेथी थार के मरुस्थल से निकली वह सुगंध है जो पूरे देश के व्यंजनों को एक मखमली मिजाज देती है। तेज पत्ता और कसूरी मेथी सूखी उपयोग में आती है वही करी पत्ता बिलकुल ताजी,,,धनिया पत्ते का जिक्र इसमें नहीं आने का कारण यह है कि यह पूरे भारत में समान रूप से फैला है इस पूरी यात्रा में छत्तीसगढ़ के रसा और झोर से लेकर मुगलई सालन शोरबा संस्कृति की अमर परंपरा मौजूद है माखन लाल चतुर्वेदी ने करी पत्ते पर कहा है

हरा-भरा करी-पत्ता, छौंक का श्रृंगार है,

सादे से खाने में भी, भरता अनोखा प्यार है

वही कसूरी मेथी पे फ़िराक़ गोरखपुरी कहते है 

​ज़रा सी कसूरी मेथी जो हाथों से मली उसने,

पुरानी रसमों की ख़ुशबू से घर महक उठा,,,

शनिवार, 26 सितंबर 2026

छोले और कुलचे

घर पे Petits pois à la française' 

इतवार की सुहानी सुबह, जब आसमान से बदली ने अपनी चादर हटाई, तो घर की रसोई का मिजाज भी एक नए रंग में रंग गया। बात जब चटखारे की हो, तो भला मन कैसे माने! धर्मपत्नी जी ने भी रसोई संभाली और पंजाबी कुलचे और मटर के छोलों के उस रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री) में एक नया जादुई समीकरण जमा दिया

​थाली महज़ एक नाश्ता नहीं, कही बढ़कर एक शाहकार थी। जिसका जायका सीधे अमृतसर की उन तंग गलियों के स्वाद की तहजीब समेटे हुए था, हर निवाले में इतिहास और ज़ायके का मेल । षड-रसों से लबरेज उन मज़ेदार छोलों के साथ इमली की खटाई, तीखी हरी चटनी, और कच्चे प्याज-टमाटर का साथ मानो सोने पर सुहागा । कभी मुगल बावर्चीखाने में बादशाह शाहजहां के पसंदीदे कुलचे परोसे जाते थे,,,ये स्वाद लाहौर और पेशावर से होता हुआ फिर लौटा जब पार्टिशन के बाद 1947 में पूर्वी पंजाब से आए शरणार्थी परिवारों ने अमृतसर की गलियों में सुबह नाश्ते के लिए अपने छोटे छोटे ठेले सजाए,,,इस तरह यह हुनर अपनी रियायती विरासत के साथ आज इस अंजाम तक पहुंचा है

 मक्खन में लिपटे हुए हर इक कौर में मसालों की जुंबिश, वैसे तो मटर के ऐसे ही व्यंजन का फ्रांसीसी तर्जुमा 'Petits pois à la française' कहा जाता है,  सच तो यह है कि इस नाश्ते की प्लेट में इन मटर (पीज) का मज़ा चखने के बाद जो सुकून मिला कि मानों ज़िंदगी का सारा 'पीस' (Peace) यहीं मिल गया हो!

शनिवार, 15 अगस्त 2026

चोरी

 

​अरसे से जंगली भैंसों ने,

मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,

ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,

कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।

​चींटियों की वो मौन समझदारी,

सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,

बदले में मिले मिठास के रस से,

अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।

​दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,

बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,

इंसान ने देखा, समझा और सीखा,

उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।

​प्रकृति के इस खुले द्वार से,

मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,

पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,

अहंकार का दायरा और बड़ा।

​फिर हुनर के संग-संग उसने,

मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,

बाँटने की जो रीत थी जग की,

उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।

​आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,

पर विडंबना का दायरा देखिए—

जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,

अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!

रविवार, 9 अगस्त 2026

वक्त धरती के चक्कर के साथ चलता है,,,हाथ में बंधी घड़ी भी,,,फिर कलेंडर के पत्ते पलटे जाते है आखिरकार पूरा कलेंडर बदल जाता है,,,वक्त के जैसे,,पर कई घरों में भूख नहीं बदलती,,,वो कायम रहती है वैसे ही
                कारखाने की छत से गिरधर गिर गया ,,,तुरंत साँसे रुक गई
सर की चोट थी ,,,मुर्दा शरीर एम्बुलेंस में रखते हुए ही सब जान गए कि उसमें जान नहीं रही,,, भीड़ और नारे लोकतंत्र की पहली सीख है ,,,सारे मजदूर एक स्वर में फैक्ट्री की ईंट से ईंट बजा रहे थे,,,करेंट लगने से मरा ,,, मुवाजा देना होगा,,,प्रबंधन और प्रशासन पहले समझाइश देता है ,,,मुवावजे पर विचार करता है ,, पुलिस भीड़ को संभालती है कभी भीड़ भी पुलिस को संभालती है,,,लोकतंत्र आगे बढ़ता है जब राजनेता आते है,, मरे गिरधर के बचे परिवार से मिलने,,,चाय भी पड़ोस की झोपड़ी से आती है,, क्यूँ की रसोई खाली है,,,गिरधर भी खाली पेट फैक्ट्री गया था,,,नई नौकरी 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

सेल्युलेज पचता नहीं है
पचा देता है
आखिर मुक्त हो लेता है

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

चिड़ियाघर का किराया

चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी  ,,,आखिर बारिश का मौसम था,, खपरैल से कई मोरियां एक साथ चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी मां तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू सब्जी पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,पूरा क्लास महक जाता,,गुरुजी जान जाते,,कौन है रे
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया ,,,, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,सफेद धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी पीपल की छोटी सी कलम भी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव