बूढ़ा होता गांव,,,
टिहरी गढ़वाल की हिम चोटियों में एक रहा ,,भृगु पर्वत,,,बूढ़े वैद्य राम बिचारा जोशी,,, पौराणिक कथा बाँचते,,,नौना,, ऋषि भृगु ने भगवान बिष्णु के छाती में लात दे धरी ,,,भृगु ज्योतिष संहिता यंहा लिखी ,,,नौना ,,सरकती रात के तारों में उलझते हिम शिखरों को घूरता ,,, जाड़े की हवा घाटियों के देवदार चीड़ के जंगलों से गुजरती हुई ऐसे चिचियाती जानो महादेव की भूत प्रेतों की बारात गुजर रही हो,,,जंगली गीदड़ दूर हुवा हुवा कर चेतावनी जारी कर रहे होते ,,धीमे धीमे खटिया में बचपन की आँखों में नीद उतर आती,,,
ओम की मां तो कब की गुजर गई ,,रहे पिता जो सन्यासी होकर हरिद्वार जा बसे,,,बूढ़े वैद्य दादा के साथ ही बचपना गुजारा,,,, मेढ़े चराने झुंड लेकर बकरवालों के साथ हरियाते बुग्याल में पहाड़ी बचपना,,,, बालगंगा नदी माफिक चंचल साफ ,,,तेजी से बहता ,,,नदी सुनहरी महाशीर और ट्राउट मछलियों से भरी,,,, जाल में उछलती मछली,,,, सूखी लकड़ियों के ढेर पर पुडिय़ा से निकले मसालों से चुपड़ी भुनी जाती ,, जादुई स्वाद और महक एक ही होते है,,
चौतारा गांव में स्कूल नहीं रहा,,,नीचे घाटी में जाना होता ,,आखिर 150 घरों के गांव में कोई सुविधा होगी ,,, तो बच्चों की टोलियां कतार बना कर पतली पगडंडियों से उतरती ,,जीतू बगड़वाल के गीत गाते,
सुणो सुणो, हे जीतू बगड़वाला!
बांसुरी बजै दे, खैट का धार मा।
, घाटियों के मुहानों से फिर जंगल लग लेते ,,,कितने घने ऊंचे ,,,गंभीर वृक्षों की कतारे,,,जिन से लग कर कस्तूरी वाला हिरण भी चरता,,, और उनकी तलाश में भटकता गुलदार ,,कई बार भेंट हुई ,,इसी लिए हर हाथ झाड़ियों से ठंडियां तोड़ लेते,,,पर मायने रखता पहाड़ी हौसला जो कन्हीं डिगेगा ,,, स्कूल की पढ़ाई तो ओम को जेल सी लगती वह खिड़की से भी दूर तक फैले पर्वतों को घूरता,,,जिनके ऊपर से श्वेत हंसों के झुंड गुजरते ,, चहकते,,,,वो बुरांश का मौसम था,,, अहा ,,,स्वर्ग के फूल,, सुर्ख लाल गुलाबी ,,,,पूरी घाटी लाल ,,,,
जंगली काले तीतर और चित्तीदार छोटे बटेर के फांदें ,,इन्हीं झाड़ियों पे बांधे जाते,,,,लजीज मीठा मांस पकता ,,,सब दोस्त बांट लेते,,, वहीं खाओ ,,,
पत्थर के छत वाली अब की भाषा में तो झोपड़ी कहा जाएगा ,,कुछ एक मकान थे,,,बिखरे हुए,,पतली गलियों में बच्चों का झुंड दौड़ता था,,,दादा चाहते ओम जड़ी बूटी पहचाने और कथा बांचे,,पर वो तो शहर से आने वाली बस की ओर हसरत से देखता,,,आखिर मैट्रिक पूरी हुई और शुरू हुआ पलायन,,,
बॉम्बे में गढ़वाली बावर्ची कला सीखने का मौका हुआ,,,बचपन की शरारती मसालों से सीखे गए खुरदुरे अभ्यास ने अब सैफ कला की फनकारी का पारंगत रूप ले लिया,,कई प्रसिद्ध रेस्तरां समूहों में हुनर निखरा,,विदेश जाने की बारी भी लगी,,पर आखिर छत्तीसगढ़ के राजभवन के मुख्य बावर्ची की सरकारी जिम्मेदारी हासिल हुई ,,गांव और पहाड़िया तो कितनी दूर रह गई ,,क्या वाकई ,,,बच्चे और महराजिन रोज कहानियां सुनते ,,,जो उन्हें भी अब कण्ठस्थ हो चली थी,,,क्या पापा कम से कम सौ बार सुना है,, ओम मुस्कराता पर कहानी पूरी जरूर करता,
,,शहर की भरी हुई सड़कों और मरी हुई हवा में उन घाटियों के ख्वाब उसे आते जिसके खिले हुए बुरांश में बैठी खूबसूरत तितलियों के पीछे उसका बचपन दौड़ा था,,,रुई जैसी बरसती बर्फ की याद में उसने इन मैदानों की जाड़े कही जाने वाली ऋतु में शायद ही कभी ऊनी स्वेटर पहना हो,,,, रेस्तरां के ट्रेंड सैफ जिसे स्पेशल खुद का मसाला बताते,, ओम झट उसे पहचान लेता ,,पुरानी पहाड़ी बूटियां,,,राज्यपाल महोदय को उसके परोसे जायके से ज्यादा अचरज उसके वानस्पतिक ज्ञान पर होता,,, सर यह टिमरू है हमारे हिमालय से,,इसकी चटनी भी बनती है और छौंक भी लगता है,, कमाल है ओम
पहाड़ों पर कुलदेवी की पूजा कई बरस पहले से छुटी थी,,, एक रोज ख्वाब में देवी सक्छात प्रकट हुई,,,और जोशी परिवार का समान जुड़ गया,,, बच्चों का पहला मौका उन कहानियों के मूल स्रोत से दो चार होने का,,, बस जब हरिद्वार छोड़कर पहाड़ी सड़क चढ़ने लगी तो ओम ने कार की खिड़कियों को खोल कर अपने परिवार से परिचय करवाया ,,उसी आदिम हवा से जो ठंडक के खोल में पहाड़ों की सुगंध बांधे घूमती रहती घाटियों में,,,बेटे के कान नाक दोनों भर गए,,, माँ ने ऊनी कनचप्पिया पहना दी,,,अभी यंहा जाड़ा पहुंचा भी नहीं ओम मुस्कुरा रहा था,,, सड़क के साथ स्मृतियां घूम रही थी महराजिन और बिटिया दो बार उल्टियां कर पस्त हुए सो गए थे,,लेकिन ओम ,,वह तो मानो उन यादों की पतंग को जो अब तक बहुत दूर उड़ रही थी तेजी से धागे खींच रहा था,,, 10 किलोमीटर
चौतारा गांव ,,,क्या ,,अब यह गांव रहा ,,,पक्की सड़के थी पक्के मकान थे,,, जूनी पत्थर की छत वाली कुछ एक छोपड़िया अब क्या खाली पड़ी थी,,नहीं खुले दरवाजों से मवेशी झांक रहे थे,,, मिट्टी की दीवारें जिनपर कभी बैठक होती घांस से पट गई थी,,,और अपना मकान भी चाचा जी ने लेंटर उठा कर पक्का कर लिया था,,,दादा जी तो हरिद्वार के अस्पताल में गुजरे रहे,,,अब एक दूर के चाचा के हवाले ही सब कुछ था,,, भृगु पर्वत ने पहली बार ओम के परिवार को देखा था,, वो उन मैदानों की ओर बढ़ा जिन पर अब बुरांश की झाड़ियां जाने कैसे गायब हो गई थी,,,,भेड़ें और कस्तूरी मृग भी,,,गुलदार खाक होगा,,,क्योंकि उसने जिस जंगल की कहानियां अपने बच्चों को सुनाई थी,, वो भी कब के कट लिए ,,,बच गई थी पथरीले ढलान,,जिस पर बिखरी चट्टानें बता रही थी कि बड़ा भूस्खलन हुआ हो गए दिनों,,,, ओम के भी कंही भीतर पत्थर लुढ़क रहे थे,,,वो हैरान था ,,अपनी यादों को खुरच कर इस परिवेश को पहचानने की कोशिश की ,,,लेकिन ये उसकी वो दुनिया नहीं थी,,,इसमें वो अपनापन नहीं था,,, खैरइयत नीचे घाटी में बाल गंगा अब भी बह रही थी,,वैसे ही कल कल करती ,,,माछिलयों से तो मुलाकात नहीं हुई,,,पर कुछ देर ओम उसी चट्टान पर पैर लटका कर उस नदी के जुड़ जुड़ाते पानी को महसूस कर रहा था,,,नीला पानी आज भृगु पर्वत के आंखों से लुढ़कते आंसुओं सा ,,,पैर सुन्न पड़ गए,, ओम की आंखों तक ये पानी उतर आया,,, उसने चोटियों को देखा वंहा हिमालयन गिफ़न चक्कर काट रहे थे,,,ओम नदी से घाटियों से और उन स्मृतियों से विदाई लेकर घर लौट गया,,,
पूजा सुबह शुरू हुई,,,गांव के सभी बुजुर्ग शामिल हुए,,,कोई जवान बचा ही नहीं रह गया,,,सब देश परदेस में अपने व्यवसायों में जुटे थे,,,बच गई थी तो उनके मां पिता की बताई उनकी कहानियां,,,तोषण के दो होटल है लंदन में वह पांच बरस पहले आया भी था दीपावली पर ,,,देखो अब कब लौटेगा ,,शायद मेरे मरने के बाद ही,,,अग्नि देने तो आएगा ही न,, उसकी माँ की आंखों में भी बाल गंगा का जल उतर आया,
अब बच्चे हलकान हो रहे,,, जाड़ा उन्हें चुभ रहा है,,,घर छोटा है,वे अपने कमरों के आदि है फिर वेस्टर्न टॉयलेट भी मौजूद नहीं , सबसे बढ़ कर मोबाईल के डेटा में कुछ परेशानी है,,
ओम रात आसमान के नीचे खुले में आग तापते बैठा ,,महराजिन देखो लगता है ये तारे तो कम से कम मुझे चिह्निते से लगते है,,,ऊपर आसमान की ऊंचाइयों से वही श्वेत हंसों का झुंड जाड़े का प्रवास कर रहा है,,,उनकी चहकने की आवाज घाटियों में गूंज गई,,,लेकिन अब गीदड़ नहीं रोते ,,, ट्रेन का रिजर्वेशन आन लाइन नहीं हो पा रहा ,,,नीचे बस्ती में जाना होगा,,, ओम देख रहा है महराजिन को ठंड लग रही है,, उसने फिर भृगु पर्वत शिखर के ऊपर उड़ती बर्फ की ओर देखा,,, धुँआ देख कर लगा पर्वत हांफ रहा है ,,, ज्योतिष के महान ग्रंथ के लेखक ने क्या चौतारा का भविष्य भी बांचा होगा कभी,,,गांव तो बूढ़ा हो चला है,, सारा यौवन तो दूर शहरों में परदेश में बस गया,,, बुरांश कंही कन्ही महकते है,,,,चुन लिए गए सारे के सारे,,, बस बच गया है बुढ़ापा झुर्री दार ,,,दर्द और दुखों से भरा,,, ओम ने अपनी स्मृतियाँ समेटी ,,,आखिर बार भृगु शिखर को देख कर घर के भीतर लौट आया ,,, पर्वत और बाल गंगा की मजबूरी है नहीं तो वो भी इस बूढ़े परिवेश को छोड़ जाते,,,कब से
अनुभव