शनिवार, 15 अगस्त 2026

चोरी

 

​अरसे से जंगली भैंसों ने,

मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,

ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,

कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।

​चींटियों की वो मौन समझदारी,

सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,

बदले में मिले मिठास के रस से,

अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।

​दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,

बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,

इंसान ने देखा, समझा और सीखा,

उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।

​प्रकृति के इस खुले द्वार से,

मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,

पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,

अहंकार का दायरा और बड़ा।

​फिर हुनर के संग-संग उसने,

मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,

बाँटने की जो रीत थी जग की,

उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।

​आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,

पर विडंबना का दायरा देखिए—

जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,

अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!

रविवार, 9 अगस्त 2026

वक्त धरती के चक्कर के साथ चलता है,,,हाथ में बंधी घड़ी भी,,,फिर कलेंडर के पत्ते पलटे जाते है आखिरकार पूरा कलेंडर बदल जाता है,,,वक्त के जैसे,,पर कई घरों में भूख नहीं बदलती,,,वो कायम रहती है वैसे ही
                कारखाने की छत से गिरधर गिर गया ,,,तुरंत साँसे रुक गई
सर की चोट थी ,,,मुर्दा शरीर एम्बुलेंस में रखते हुए ही सब जान गए कि उसमें जान नहीं रही,,, भीड़ और नारे लोकतंत्र की पहली सीख है ,,,सारे मजदूर एक स्वर में फैक्ट्री की ईंट से ईंट बजा रहे थे,,,करेंट लगने से मरा ,,, मुवाजा देना होगा,,,प्रबंधन और प्रशासन पहले समझाइश देता है ,,,मुवावजे पर विचार करता है ,, पुलिस भीड़ को संभालती है कभी भीड़ भी पुलिस को संभालती है,,,लोकतंत्र आगे बढ़ता है जब राजनेता आते है,, मरे गिरधर के बचे परिवार से मिलने,,,चाय भी पड़ोस की झोपड़ी से आती है,, क्यूँ की रसोई खाली है,,,गिरधर भी खाली पेट फैक्ट्री गया था,,,नई नौकरी 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

सेल्युलेज पचता नहीं है
पचा देता है
आखिर मुक्त हो लेता है

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

चिड़ियाघर का किराया

चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी  ,,,आखिर बारिश का मौसम था,, खपरैल से कई मोरियां एक साथ चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी मां तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू सब्जी पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,पूरा क्लास महक जाता,,गुरुजी जान जाते,,कौन है रे
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया ,,,, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,सफेद धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी पीपल की छोटी सी कलम भी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
 
           
                       
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,क्यों आगे बताता हु,,,छत पर घांस भी उग आई थी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,विशाल वृक्ष,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता था उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले पूरा माहौल फिर जाग जाता,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखा बोला था न मिम्मी खुश हो जाता मै सोच में,,,अजीब सी बास उस आंगन में फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली बनती थी पर वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे
                       
यहाँ पूरा लेख प्रस्तुत है:

​मिम्मी मेरा प्राचीन मित्र
इसके आठ
​मित्रता या दोस्ती की एक अजीबो-गरीब दास्तान है। यह हमेशा से ही मौजूद रही। रक्त संबंधों से परे  ये पहले चुनाव पर आधारित है,,,
 खासतौर पर बचपन में हम ऐसे लोगों को चुनते हैं, जिनके साथ हमारे जस्बात और रुझान मिलता-जुलता हो।

​यह बात रही उसी दौर की ,,, 80 के दशक में मैं मिम्मी से मिला। मिम्मी मेरे छुटपन  का यार,  पहली और दूसरी में मेरा सहपाठी,फिर शायद दूसरी के बाद उसने स्कूल को अलविदा कह दिया,,खैर

मुलाकात ऐसे रही , उसके खपरैली घर के आंगन ,, एक वयोवृद्ध नीम पेड़ हुआ करता था। विशाल ,, गठिया  से ग्रस्त टेढा मेढ़ा,उस नीम की कनगियों  में  अजीबो गरीब घोंसले सजे होते रहे,,,कोलाहल से सजे,  भारतीय सफेद  गर्दन वाला गिद्ध जो रात गए जाने कैसी भाषा बोलता या फिर,फिर मौजूद रहे किस्म किस्म के कोकड़े, जिसमें काली पंख वाला हेरोन और फिर भूरी पंख वाला कैटल हेरोन, , अजीबोगरीब आदिम गीत,,जिससे कर्ण गीत झुंझला जाये

​इस घर में मानसून थक जाता रहा ऐसी बारिश  जो विचित्र सुगंध से भरी होती थी। यह सुगंध थी,, लाहौल बिलकुबत ,खासतौर पर जलीय जीवों के कैल्शियम और उनके प्रभाव से।

​जब हम उसके घर जाते थे, मैं और मिम्मी इस बात पर गौर करते थे कि एक अजीब किस्म की आदिम सुगंध उसके घर में भरी पड़ी है। इसके अलावा हम दोनों का रिश्ता अजीबोगरीब था, क्योंकि उसकी मां ढेलाबाई मेरे घर में नौकरानी का काम करती थी, और अपनी नौकरानी के बच्चे के साथ मैं उन दिनों नगर निगम के एक स्कूल में पढ़ता था।

​मेरा और मिम्मी का संबंध यह था कि उसके पास कुछ बुनियादी सुविधाएं थीं। वह धरती के कुछ ऐसे खूबसूरत संबंधों को समझता था, जो मेरे लिए समझ पाना बड़ा कठिन होता था। भौंरे को रिवर्स स्विंग देने की कला मैंने उसमें पहली बार देखी। जब भौंरे एक दिशा में फेंके जाते थे, लेकिन वह मुड़कर दूसरी दिशा में घूमने लगते थे, तो अब मुझको ऐसा लगता है कि सरफराज नवाज या वसीम अकरम की जो लाल गेंद टेस्ट मैच में रिवर्स स्विंग के रूप में घूमती थी, उस कला का असली आविष्कार हमारे यहां भौरों की इस दिशा और दशा से हुआ था। उन दिनों भौंरे बिना कील के मिलते थे, उन्हें बढ़ई से खरीदना पड़ता था, और बढ़ई से खरीदकर हम उन्हें लोहार के पास ले जाकर उस पर कील ठुकवाते थे।

​और उसके बाद शुरू होता था, उसके और मेरे घर के बीच मौजूद एक बरगद के पेड़ के नीचे जो पाटा बना था, जिसमें पता नहीं किस-किस किस्म के देवता, जिसमें आराध्य शिव से लेकर कई किस्म के पत्थर रखे होते थे।

​उनके बीच और उनके सामने बच्चों का एक खेलों का ओलंपिक होता था, जहाँ कई किस्म के खेल खेले जाते थे। भौंरे वहाँ घूमते थे, और उन दिनों कंचे वहाँ फेंके जाते थे, और कंचों के ऊपर भी ऐसे बड़े चीनी मिट्टी के कंचे होते थे जो एक दूसरे को निशाने लगाते थे।

​इस पूरी परिधि के आसपास जो व्यंजन हम लोग अपने सुपीरियरिटी काम्प्लेक्स में खाते थे कि शायद 25 पैसा मुझे मिल जाता था जो मिम्मी को पाँच पैसे के रूप में मिलता था, मैं नड्डा खा सकता था और खस्ता खा सकता था, और मिम्मी उस चैलेंज को स्वीकार करता था कि शाम को जब चाट का ठेला लगेगा तब आना। चाट के उस ठेले में जो आलू की टिकिया बनती थी और भटूरा उबलता था, और आलू टिक्कियों के बीच जब वो सामंजस्य स्थापित होता था, जिसमें उन दिनों लाल मिर्च, साथ में कटी हुई हरी मिर्च, प्याज, टमाटर, और साथ में इमली की खटाई होती थी। इमली की खटाई से बना हुआ यह पूरा व्यंजन चाट नहीं 'चाट' होता था। इसी चाट को हम खाते थे और इस गरमागरम चाट के साथ इसी गरमागरम मसाले को उन दिनों आधे पके गुपचुपों में ठूंसकर, जब इमली पानी के साथ अपने उदर को समृद्ध करते थे, तो ऐसा लगता था कि इससे बड़ा व्यंजन और कोई नहीं होता था। यह वो दौर था जब पिज़्ज़ा, बर्गर, या फिर और कोई भी विदेशी डिश इस भूभाग के संपर्क में नहीं आ पाई थी, लेकिन वो स्वाद आज भी जीभ में हाजिर है।

​स्कूल के बाहर एक कसेर महिला छोटा सा बाँसों की टोकरी लेकर बैठती थी, जिसमें एक जर्मन की गंजी होती थी। उसके अंदर से निकलता था एक बड़ा, और उस बड़े के ऊपर चना और साथ में भटूरा उसकी तरी डलती थी, और हल्की सी इमली की चटनी, और उस इमली चटनी के साथ पता नहीं किस किस्म के अजीबोगरीब मसाले उसमें छिड़के जाते थे, और 25 पैसे में वो व्यंजन हमको उपलब्ध होता था। ठीक उसके किनारे एक नाली होती थी जिसमें काई जमी होती थी, लेकिन ये गौरतलब है कि उन दिनों हाइजीन को लेकर ऐसी आशंकाएं हमारे मन में नहीं होती थी।

​फिर दौर आता था गर्मियों का, जब महानदी की रेत के अंदर पहले पहल बड़े-बड़े काले कलंदर - जो शायद आज के चितकबरे कलंदरों से भिन्न हैं - उनकी फांकी 10 पैसे में बिकती थी। साथ ही बिकती थी बोईर की गुड़ से डली हुई एक खास किस्म की डेजर्ट की चटनी। नाग पंचमी आती थी तो बड़े-बड़े खीरे उभर आते थे, और रेत में उगे इन खीरों को जब काटकर उसमें नमक-मिर्ची लगाया जाता था, तो वो स्वाद आज भी जीभ के डीएनए में दर्ज है। वैसा स्वाद आज भी नहीं मिल पाता, क्योंकि उन दिनों खीरों के ऊपर एक खास किस्म के रोए हुआ करते थे।

​इन सारे व्यंजनों और उनकी स्मृतियों के साथ एक बार मैं अपने परिवार के साथ राजिम से गुजर रहा था। गंज रोड के पास अचानक एक ठेले पर मेरी नजर पड़ी, और मुझे अपने बचपन का वही मित्र मिम्मी मिल गया, जिसने मुझे कोकड़ों और गिद्धों के बीच का अंतर समझाया था।