बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

बूढ़ा होता गांव

बूढ़ा होता गांव,,,

टिहरी गढ़वाल की हिम चोटियों में एक रहा ,,भृगु पर्वत,,,बूढ़े वैद्य राम बिचारा जोशी,,,  पौराणिक कथा बाँचते,,,नौना,, ऋषि भृगु ने भगवान बिष्णु के छाती में लात दे धरी ,,,भृगु ज्योतिष संहिता यंहा लिखी ,,,नौना ,,सरकती रात के तारों में उलझते हिम शिखरों को घूरता ,,, जाड़े की हवा घाटियों के देवदार चीड़ के जंगलों से गुजरती हुई ऐसे चिचियाती जानो महादेव की भूत प्रेतों की बारात गुजर रही हो,,,जंगली गीदड़ दूर हुवा हुवा कर चेतावनी जारी कर रहे होते ,,धीमे धीमे खटिया में बचपन की आँखों में नीद उतर आती,,,
                       ओम की मां तो कब की गुजर गई ,,रहे पिता जो सन्यासी होकर हरिद्वार जा बसे,,,बूढ़े वैद्य दादा के साथ ही बचपना गुजारा,,,, मेढ़े चराने झुंड लेकर बकरवालों के साथ हरियाते बुग्याल में पहाड़ी बचपना,,,, बालगंगा नदी माफिक चंचल साफ ,,,तेजी से बहता ,,,नदी सुनहरी महाशीर और ट्राउट मछलियों से भरी,,,, जाल में उछलती मछली,,,, सूखी लकड़ियों के ढेर पर पुडिय़ा से निकले मसालों से चुपड़ी भुनी जाती ,, जादुई स्वाद और महक एक ही होते है,,
        चौतारा गांव में स्कूल नहीं रहा,,,नीचे घाटी में जाना होता ,,आखिर 150 घरों के गांव में कोई सुविधा होगी ,,, तो बच्चों की टोलियां कतार बना कर पतली पगडंडियों से उतरती ,,जीतू बगड़वाल के गीत गाते,​
सुणो सुणो, हे जीतू बगड़वाला!

बांसुरी बजै दे, खैट का धार मा।

, घाटियों के मुहानों से फिर जंगल लग लेते ,,,कितने घने ऊंचे ,,,गंभीर वृक्षों की कतारे,,,जिन से लग कर कस्तूरी वाला हिरण भी चरता,,, और उनकी तलाश में भटकता गुलदार ,,कई बार भेंट  हुई ,,इसी लिए हर हाथ झाड़ियों  से ठंडियां तोड़ लेते,,,पर मायने रखता पहाड़ी हौसला जो कन्हीं डिगेगा ,,, स्कूल की पढ़ाई तो ओम को जेल सी लगती वह खिड़की से भी दूर तक फैले पर्वतों को घूरता,,,जिनके ऊपर से श्वेत हंसों के झुंड गुजरते ,, चहकते,,,,वो बुरांश का मौसम था,,, अहा ,,,स्वर्ग के फूल,, सुर्ख लाल गुलाबी ,,,,पूरी घाटी  लाल ,,,, 
           जंगली काले तीतर और चित्तीदार  छोटे बटेर के फांदें ,,इन्हीं झाड़ियों पे बांधे जाते,,,,लजीज मीठा मांस पकता  ,,,सब दोस्त बांट लेते,,, वहीं खाओ ,,, 
पत्थर के छत वाली अब की भाषा में तो झोपड़ी कहा जाएगा ,,कुछ एक मकान थे,,,बिखरे हुए,,पतली गलियों में बच्चों का झुंड दौड़ता था,,,दादा चाहते ओम जड़ी बूटी पहचाने और कथा बांचे,,पर वो तो शहर से आने वाली बस की ओर हसरत से देखता,,,आखिर मैट्रिक पूरी हुई और शुरू हुआ पलायन,,,
              बॉम्बे में गढ़वाली बावर्ची कला सीखने का मौका हुआ,,,बचपन की शरारती मसालों से सीखे गए खुरदुरे अभ्यास ने अब सैफ कला की फनकारी का पारंगत रूप ले लिया,,कई प्रसिद्ध रेस्तरां समूहों में हुनर निखरा,,विदेश जाने की बारी भी लगी,,पर आखिर छत्तीसगढ़ के राजभवन के मुख्य बावर्ची की सरकारी जिम्मेदारी हासिल हुई ,,गांव और पहाड़िया तो कितनी दूर रह गई  ,,क्या वाकई ,,,बच्चे और महराजिन रोज कहानियां सुनते ,,,जो उन्हें भी अब कण्ठस्थ हो चली थी,,,क्या पापा कम से कम सौ बार सुना है,, ओम मुस्कराता पर कहानी पूरी जरूर करता,
,,शहर की भरी हुई सड़कों और मरी हुई हवा में उन घाटियों के ख्वाब उसे आते जिसके खिले हुए बुरांश में बैठी खूबसूरत तितलियों के पीछे उसका बचपन दौड़ा था,,,रुई जैसी बरसती बर्फ की याद में उसने इन मैदानों की जाड़े  कही जाने वाली ऋतु में शायद ही कभी ऊनी स्वेटर पहना हो,,,, रेस्तरां के ट्रेंड सैफ जिसे स्पेशल खुद का मसाला बताते,, ओम झट उसे पहचान लेता ,,पुरानी पहाड़ी बूटियां,,,राज्यपाल महोदय को उसके परोसे जायके से ज्यादा अचरज उसके वानस्पतिक ज्ञान पर होता,,, सर यह टिमरू है हमारे हिमालय से,,इसकी चटनी भी बनती है और छौंक भी लगता है,, कमाल है ओम
              पहाड़ों पर कुलदेवी की पूजा कई बरस पहले से छुटी थी,,, एक रोज ख्वाब में देवी सक्छात प्रकट हुई,,,और जोशी परिवार का समान जुड़ गया,,, बच्चों का पहला मौका उन कहानियों के मूल स्रोत से दो चार होने का,,, बस जब हरिद्वार छोड़कर पहाड़ी सड़क चढ़ने लगी तो ओम ने कार की खिड़कियों को खोल कर अपने परिवार से परिचय करवाया ,,उसी आदिम हवा से जो ठंडक के खोल में पहाड़ों की सुगंध बांधे घूमती रहती घाटियों में,,,बेटे के कान नाक दोनों भर गए,,, माँ ने ऊनी कनचप्पिया पहना दी,,,अभी यंहा जाड़ा पहुंचा भी नहीं ओम मुस्कुरा रहा था,,, सड़क के साथ स्मृतियां घूम रही थी महराजिन और बिटिया दो बार उल्टियां कर पस्त हुए सो गए थे,,लेकिन ओम ,,वह तो मानो उन यादों की पतंग को जो अब तक बहुत दूर उड़ रही थी तेजी से धागे खींच रहा था,,, 10 किलोमीटर
                   चौतारा गांव ,,,क्या ,,अब यह गांव रहा ,,,पक्की सड़के थी पक्के मकान थे,,, जूनी पत्थर की छत वाली कुछ एक छोपड़िया  अब क्या खाली पड़ी थी,,नहीं खुले  दरवाजों से मवेशी झांक रहे थे,,, मिट्टी की दीवारें जिनपर कभी बैठक होती घांस से पट गई थी,,,और अपना मकान भी चाचा जी ने लेंटर उठा कर पक्का कर लिया था,,,दादा जी तो हरिद्वार के अस्पताल में गुजरे रहे,,,अब एक दूर के चाचा के हवाले ही सब कुछ था,,, भृगु पर्वत ने पहली बार ओम के परिवार को देखा था,, वो उन मैदानों की ओर बढ़ा जिन पर अब बुरांश की झाड़ियां जाने कैसे गायब हो गई थी,,,,भेड़ें और कस्तूरी मृग भी,,,गुलदार खाक होगा,,,क्योंकि उसने जिस जंगल की कहानियां अपने बच्चों को सुनाई थी,, वो भी कब के कट लिए ,,,बच गई थी पथरीले ढलान,,जिस पर बिखरी चट्टानें बता रही थी कि बड़ा भूस्खलन हुआ हो गए दिनों,,,, ओम के भी कंही भीतर पत्थर लुढ़क रहे थे,,,वो हैरान था ,,अपनी यादों को खुरच कर इस परिवेश को पहचानने की कोशिश की ,,,लेकिन ये उसकी वो दुनिया नहीं थी,,,इसमें वो अपनापन नहीं था,,, खैरइयत नीचे घाटी में बाल गंगा अब भी बह रही थी,,वैसे ही कल कल करती ,,,माछिलयों से तो मुलाकात नहीं हुई,,,पर कुछ देर ओम उसी चट्टान पर पैर लटका कर उस नदी के जुड़ जुड़ाते पानी को महसूस कर रहा था,,,नीला पानी आज भृगु पर्वत के आंखों से लुढ़कते आंसुओं सा ,,,पैर सुन्न पड़ गए,, ओम की आंखों तक ये पानी उतर आया,,, उसने चोटियों को देखा वंहा हिमालयन गिफ़न  चक्कर काट रहे थे,,,ओम नदी से घाटियों से और उन स्मृतियों से विदाई लेकर घर लौट गया,,,
पूजा सुबह शुरू हुई,,,गांव के सभी बुजुर्ग शामिल हुए,,,कोई जवान बचा ही नहीं रह गया,,,सब देश परदेस में अपने व्यवसायों में जुटे थे,,,बच गई थी तो उनके मां पिता की बताई उनकी कहानियां,,,तोषण के दो होटल है लंदन में वह पांच बरस पहले आया भी था दीपावली पर ,,,देखो अब कब लौटेगा ,,शायद मेरे मरने के बाद ही,,,अग्नि देने तो आएगा ही न,, उसकी माँ की आंखों में भी बाल गंगा का जल उतर आया,
अब बच्चे हलकान हो रहे,,, जाड़ा उन्हें चुभ रहा है,,,घर छोटा है,वे अपने कमरों के आदि है फिर वेस्टर्न टॉयलेट भी मौजूद नहीं , सबसे बढ़ कर मोबाईल के डेटा में कुछ परेशानी है,, 
ओम रात आसमान के नीचे खुले में आग तापते बैठा ,,महराजिन देखो लगता है ये तारे तो कम से कम मुझे चिह्निते से लगते है,,,ऊपर आसमान की ऊंचाइयों से वही श्वेत हंसों का झुंड जाड़े का प्रवास कर रहा है,,,उनकी चहकने की आवाज घाटियों में गूंज गई,,,लेकिन अब गीदड़ नहीं रोते ,,, ट्रेन का रिजर्वेशन आन लाइन नहीं हो पा रहा ,,,नीचे बस्ती में जाना होगा,,, ओम देख रहा है महराजिन  को ठंड लग रही है,, उसने फिर भृगु पर्वत शिखर के ऊपर उड़ती बर्फ की ओर देखा,,, धुँआ देख कर लगा पर्वत हांफ रहा है ,,, ज्योतिष के महान ग्रंथ के लेखक ने क्या चौतारा का भविष्य भी बांचा होगा कभी,,,गांव तो बूढ़ा हो चला है,, सारा यौवन तो दूर शहरों में परदेश में बस गया,,, बुरांश कंही कन्ही महकते है,,,,चुन लिए गए सारे के सारे,,, बस बच गया  है बुढ़ापा झुर्री दार ,,,दर्द और दुखों से भरा,,, ओम ने अपनी स्मृतियाँ समेटी ,,,आखिर बार भृगु शिखर को देख कर घर के भीतर लौट आया ,,, पर्वत और बाल गंगा की मजबूरी है नहीं तो वो भी इस बूढ़े परिवेश को छोड़ जाते,,,कब से

अनुभव
             

       

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

जोशी जी

भृगु परबत की बर्फीली अंसुआती चोटियों के नीचे, बालगंगा की धार उस दिन अचानक अकट-सकट होकर बहने लगी थी।

​पहाड़ का मिज़ाज ही कुछ ऐसा ठहरा—कब धूप छितरा जाए और कब बादलों की मटमैली चादर पूरा अंचल ढँक ले, कोई न जाने! चौठारा गाँव की उस पथरीली, छीछली पगडंडी पर जब ओम प्रकाश ने बरसों बाद अपने पाँव धरे, तो सीढ़ीदार खेतों के ऊपर फैली बाँज और बुरांश की सोंधी हवा का एक झोंका उसकी देह को छुअत-छुअत निकल गया।

​अहा! वही चौठारा गाँव! भृगुपंथ और खैट परबत की छाँह में सिमटा हुआ, जहाँ किसी ज़माने में डेढ़ सौ परिवारों के ढोल-दमांऊ की थाप गूँजती थी। बूढ़े-पुरनिए कथा कहते कि इसी भृगु तुंग की गुफा में बैठकर महर्षि भृगु ने जग-जहान की जन्म-पत्री 'भृगु संहिता' बाँची थी। और वो खैट की धारी! जहाँ जीतू बगड़वाल की बांसुरी बजते ही परियाँ (आंछरियाँ) आंचल लहराती उतर आती थीं।

​गाँव के चौपाल में जगरिया जब थाली पर काँसे की डंडी मारता, तो ओम प्रकाश के बाल-मन में वो बोल सदा-सदा के लिए रच-बस जाते—

​सुणो सुणो, हे जीतू बगड़वाला!

बांसुरी बजै दे, खैट का धार मा।

​खैट की आंछरी, रूप की रानी,

मुरली की धुन मा, भई दीवानी।

रोपी का दिन ऐगे, शिरोमणि खेत मा,

वचन दीनि जीतू, आंछरी का हाथ मा...


​पहाड़ का वो फागुन भी बड़ा अलबेला होता! खेतों की मुँडेरों पर फागुन से बैशाख तक बुरांश के लाल-सुर्ख फूल ऐसे भभक उठते, मानो पूरे पहाड़ ने अबीर-गुलाल घोर रखा हो। चीड़ की पतली पत्तियों (पीरुल) की सरसराहट के बीच जब जाड़ों में पौष-माघ के दिनों बर्फ जमती, तो रात के सन्नाटे में आकाश गंगा (दुग्ध-मेखला) के नीचे सन्नाटा भी कुछ मीठा-मीठा फुसफुसाने लगता।

​"अरे पापा, मोबाइल में टावर ही नहीं आ रहा!" मैदानी ज़बान में पले-बढ़े बेटे ने अपने स्क्रीन से नज़रें हटाकर झल्लाते हुए कहा।

​ओम प्रकाश ने कोई जवाब न दिया। उसने बस एक ठंडी साँस ली और अपनी आँखें मूँद लीं। उसका मन तो भीतर ही भीतर कौंध उठा—'अरे, इस घाटी के वो चटक लाल बुरांश के फूल कहाँ बिला गए? वो कलीज, कोकलास, मोनाल और कस्तूरी हिरण कहाँ चले गए? क्या पहाड़ की ये सुंदरियाँ और चंचल जीव भी इंसानों से मुँह मोड़कर इस घाटी को वीरान छोड़ गए?'

​उसकी आँखों के आगे तो पचास साल पुराना चौठारा गाँव सजीव हो उठा था।

​अहा रे! वो भटगाँव के प्राइमरी स्कूल का रास्ता! रास्ते में कुखली धार की सघन झाड़ियों के पीछे कभी काले भालू की घुरघुराहट गूँजती, तो कभी पगडंडी के ऐन मोड़ पर विशालकाय गुलदार (तेंदुआ) आ बैठता। सुनहरी छल्लीदार देह पर ढलती धूप की किरणें चमचमातीं और पीली बेधती आँखें सीधे ओम और उसके संगियों पर गड़ जातीं। पर पहाड़ के छौने (बच्चे) भी किस मिट्टी के बने थे! न कोई चीख, न पाँव पीछे खींचना। बिना पलक झपकाए, अपनी छाती तानकर उस गुलदार के ऐन सामने डटे रहना! वही तो पहाड़ी जिगर था, जिसे देखकर जंगल का राजा भी चुपचाप घने बांज के जंगल की ओर मुड़ जाता।

​मास्टर जी की छड़ी से बचकर दबे पाँव भागना, मकई के भुट्टे चुराकर बालगंगा की रेती पर आग में भूनना, और ठंडे पारदर्शी पानी में तैरती 'असोला' (स्नो ट्रौट) और सुनहरी महाशीर मछलियों के पीछे नंगे पाँव दौड़ना... काफल और हिसार की झाड़ियों से खट्टे-मीठे दाने तोड़कर खाना, वैद्य दादाजी से जड़ी-बूटियों की पहचान सीखना और उनके साथ बूढ़ाकेदार के दर्शनों की कथाएँ सुनना... और जिगरी यार कृपालु और मांगू के साथ की गई बदमाशियाँ।

​हाँ, फिर ज़माने का पहिया घूमा। पढ़ाई के लिए दिल्ली जाना पड़ा, फिर बंबई के ताज होटल में शेफ का काम और फिर छत्तीसगढ़ के गवर्नर हाउस के कैटरिंग मैनेजर की कुर्सी... जीवन शहर की आपाधापी में बीतता गया। पर ओम प्रकाश का मन तो हमेशा उसी पगडंडी पर अटका रहा।

​और आज? जब कुलदेवी की पूजा का संचित पुण्य लेकर वह गाँव लौटा, तो लगा जैसे उसकी जन्मभूमि का रूप ही किसी जादूगर ने बदल दिया हो।

​गाँव के पथरीले पटालों वाले आँगन गायब थे; उनकी जगह सीमेंट और लिंटर की रूखी गारा-मिट्टी खड़ी थी। न बकरियों की में-में थी, न कलीज और कोकलास की कूक। बालगंगा की जो धार कभी कल-कल छलका करती थी, वह अब पतले मैले नाले-सी सिमटकर सिसक रही थी। गाँव के बचे-खुचे चार-छह बुजुर्ग भी हाथ में चमकती काँच की स्क्रीन थामे चुपचाप बैठे थे—जैसी काठ की पुतलियाँ हों।

​पुराने यार कृपालु का घर सूना पड़ा था—वह सिंगापुर चला गया था, और मांगू बंबई के किसी बड़े होटल का मालिक बन बैठा था।

​दो दिन की पूजा क्या बीती, घर वाले छटपटाने लगे। "पापा, मोबाइल में टावर ही नहीं आ रहा!" बेटे की वही मैदानी उतावली आवाज़ बार-बार गूँज उठती।

​शाम ढलने को थी। खैट परबत और भृगु तुंग की चोटियों पर सिंदूरी धूप बुझ रही थी। ओम प्रकाश के कानों में अचानक जीतू बगड़वाल के उस आखरी पवाड़े के बोल कौंध गए—

​हाथ मा रोपी का पौधा छिन,

मुरली की तान गूंजी धार मा।

आकाश से उतरीं खैट की आंछरी,

जीतू ते ली गईं, उड़ै के सार मा...

​मातृ रोणी घर मा, बहिन सोबनी खोजणी,

जीतू बगड़वाल गै, परियों का लोक मा।


​ओम प्रकाश ने आगे बढ़कर गाँव की देहरी की थोड़ी सी पंकिल-सोंधी माटी चुटकी में उठाई और काँपते हाथों से अपने माथे से लगा ली।

​उसे लगा कि अब इस चौठारा गाँव के किसी जीतू को बांसुरी बजाने की ज़रूरत ही कहाँ पड़ी? खैट परबत की आंछरियाँ (परियाँ) इस बार नए रूप में आई थीं—शहर की चकाचौंध, नौकरियों के मोह और सपनों के जाल का रूप धरकर! और वे गाँव के एक-एक जीतू को उँगली पकड़कर अपने साथ उड़ा ले गईं। गाँव के सारे जीतू अब सिंगापुर, बंबई और दिल्ली के धुएँ में विलीन हो चुके थे, और पीछे छोड़ गए थे बस यह बेजान, खाली और ठंडा ढाँचा।

​पगडंडी की पहली सीढ़ी पर पहला कदम बढ़ाते ही ओम प्रकाश की आँखें डबडबा आई थीं। गालों पर ढुलक आए दो गर्म अंसुवा माटी के उस अंचल को आखिरी अर्घ्य दे रहे थे।

​तभी पीछे मुड़कर देखा तो भृगु परबत पर बर्फ का एक कातर टुकड़ा शाम के सन्नाटे में पिघल रहा था। ओम प्रकाश का मन एक अनसुलझे प्रश्न के सामने ठिठककर खड़ा हो गया—क्या शहर की आंछरियों के मोह में अपनी जड़ों को छोड़ चुके ये तमाम जीतू बगड़वाल कभी लौटकर अपनी बालगंगा की धार को फिर से ज़िंदा कर पाएँगे, या यह चौठारा गाँव ऐसे ही हमेशा के लिए पत्थरों का एक वीरान खाका बनकर रह जाएगा?

​इसी आकुल प्रश्न और भीनी सी गंध को अपनी छाती में भींचकर, ओम प्रकाश अपने उजड़े बचपन के अवशेषों को पीछे छोड़ता हुआ, भारी कदमों से मटमैली शहर की धुंध की ओर बढ़ गया।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

तीन पत्तियों की कहानी

भारतीय थाली में तीन पत्तियों की कहानी:   रसा का  झोल

​भारतीय भोजन केवल जिह्वा के जायके की कला ही नहीं है , बल्कि भूगोल, वनस्पति शास्त्र, आयुर्वेद और इतिहास की एक अत्यंत सूक्ष्म व समृद्ध विज्ञान भी है। हमारे व्यंजनों को रूप, रस, गंध और रंग प्रदान करने वाली अनगिनत सामग्रियों में तीन पत्तियों का कब्जा है तेजपत्ता (तमालपत्र), करी पत्ता (कढ़ी पत्ता/मीठा नीम) और कसूरी मेथी।

​हालांकि ये तीनों पत्तियाँ रसोइयों में प्रायः 'तड़के' और छौंक' के लिए प्रयुक्त होती हैं, परंतु इनका इतिहास, इनकी वानस्पतिक पहचान, क्षेत्रीय विभाजन और पकाने की शैलियाँ भारतीय उपमहाद्वीप की विविधता को अद्भुत ढंग से रेखांकित करती हैं।

 भूगोल का जायका

​भारतीय उपमहाद्वीप के प्राकृतिक भूगोल ने अलग-अलग अंचलों को अलग-अलग वनस्पतियों से समृद्ध किया है। इन तीनों पत्तियों का वानस्पतिक चरित्र और इनका उद्गम क्षेत्र इनके प्रयोग को निर्धारित करता है:

  • ​तेजपत्ता (तमालपत्र - Cinnamomum tamala): यह मुख्यतः हिमालय के तराई क्षेत्रों, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर भारत (विशेष रूप से मेघालय और असम) के पहाड़ी ढलानों का वृक्ष है। यह दालचीनी के कुल का वृक्ष है, जिसकी पत्तियों पर लंबाई में तीन स्पष्ट समानांतर नसें (3 parallel veins) होती हैं।
  • ​करी पत्ता (मीठा नीम - Murraya koenigii): यह भारत का मूल (indigenous) झाड़ीदार पौधा है, जो मध्य, दक्षिण और प्रायद्वीपीय भारत के उपोष्णकटिबंधीय इलाकों में प्राकृतिक रूप से बहुतायत में उगता है। इसकी ताज़ा पत्तियों में एक तीखी, हर्बल और खट्टी-सोंधी सुगंध होती है।
  • ​कसूरी मेथी (Trigonella corniculata): यह सामान्य हरी मेथी से भिन्न, विशेष सोंधी सुगंध वाली मेथी की प्रजाति है, जिसकी खेती मुख्य रूप से राजस्थान के नागौर जिले में होती है। शुष्क और रेतीली जलवायु में उगने के बाद इसे सुखाकर पूरे देश में भेजा जाता है।

​उत्तर से दक्षिण का तड़का: तेजपत्ता बनाम करी पत्ता

  • ​उत्तर भारत और तेजपत्ता: उत्तर भारतीय, अवधी और मुग़लई शैलियों में गाढ़ी, गरम-मसाला प्रधान और समृद्ध ग्रेवी (सालन, कोरमा, राजमा, छोले) का वर्चस्व है। यहाँ तेजपत्ते को गरम तेल या घी में शुरुआत में ही खड़े मसाले के रूप में डाला जाता है। इसका काम पकाने की प्रक्रिया के दौरान अपनी काष्ठ-जैसी (woody), हल्की दालचीनी और लौंग-सदृश सुगंध को पूरे व्यंजन में घोलना है।
  • ​दक्षिण भारत और करी पत्ता: दक्षिण भारतीय, मराठी और तटीय व्यंजनों (सांभर, रसम, अवियल, पोहा, चेट्टिनाड करी) का आधार ताज़ा, सुपाच्य और खट्टा-नमकीन स्वाद है। यहाँ करी पत्ते को राई (सरसों) और हींग के साथ छौंक के रूप में अंत में या शुरुआत में डाला जाता है। यह नारियल, इमली और छाछ के साथ मिलकर व्यंजन को एक जीवंत (vibrant) ताज़गी देता है।

 प्राचीन तेजपत्ता बनाम नया भूमध्यसागरीय लाउरेल

​वैश्विक व्यापार और अनुवाद के कारण प्रायः 'Bay Leaf' शब्द को लेकर भ्रम उत्पन्न होता है। हालाँकि, वानस्पतिक और रसात्मक दृष्टि से भारतीय तेजपत्ता और भूमध्यसागरीय तेजपत्ता बिल्कुल अलग हैं:

  • ​भारतीय तेजपत्ता (Cinnamomum tamala): संस्कृत में 'तमालपत्र' कहलाने वाले इस पत्ते में मीठी, दालचीनी और लौंग जैसी सुगंध होती है। इसकी पहचान इसकी लंबाई में दौड़ने वाली तीन नसें हैं। जिसे तोड़ा जाता है हिमालय में होने वाली दाल चीनी के पेड़ से
  • ​भूमध्यसागरीय तेजपत्ता (Laurus nobilis): यह यूरोपीय, इटैलियन और पास्ता सॉस या स्ट्यू में इस्तेमाल होने वाला 'लाउरेल' पत्ता है। इसमें बीच में केवल एक मुख्य नस (single midrib) होती है और इसका स्वाद थोड़ा कड़वा, पाइन (चीड़) और नीलगिरी (eucalyptus) जैसा तीखा होता है।इसकी खेती बाद के समय में दक्षिण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में शुरू हुई

​ कसूरी मेथी का कसूर

​पारंपरिक दक्षिण भारतीय रसोई (जैसे उडुपी, तमिल या केरल साद्या) में कसूरी मेथी का प्रयोग लगभग शून्य रहा है। इसका कारण नागौरी मेथी की उपलब्धता का उत्तर भारतीय क्षेत्रों तक सीमित होना और दक्षिण में ताज़े करी पत्ते व धनिया की प्रचुरता थी।

​हालाँकि, आधुनिक खान-पान और रेस्तरां संस्कृति (Fine Dining) के आगमन से यह सीमाएँ धुँधली हुई हैं। आज हैदराबाद, बेंगलुरु या चेन्नई के रेस्तराओं में बनने वाले इंडो-मुग़लई व्यंजनों, बटर चिकन, पनीर कड़ाही या मखमली करी में कसूरी मेथी का भरपूर प्रयोग अंतिम 'गार्निश' और सोंधेपन (aromatic finish) के लिए किया जाता है।

​रस और खसखस 

​इन पत्तियों का प्रयोग विभिन्न प्रकार के 'रसों' (Liquid Bases/Gravies) की प्रकृति के अनुसार तय होता है। भारतीय व वैश्विक भोजन में रसों का अपना एक समृद्ध वर्गीकरण है:

  • ​सालन: उर्दू/फ़ारसी परंपरा से निकला पूरा रसेदार व्यंजन (जैसे मिर्ची का सालन)।
  • ​तरी: किसी भी मसालेदार व्यंजन का ऊपरी, बहने वाला और तेल/मसाले से युक्त रस (Gravy)जिसमें तरावट हो,,
  • ​झोर / झोल: छत्तीसगढ़, बिहार, बंगाल और ओडिशा में प्रचलित बहुत ही पतला, सुपाच्य और पानीदार रस (जैसे माछेर झोल), जिसमें अक्सर करी पत्ते या पंचफोड़न का हल्का तड़का होता है।
  • ​करी: तमिल के 'कड़ि' (Kari) से निकला वैश्विक शब्द, जो मध्यम गाढ़ी मसालेदार ग्रेवी को दर्शाता है।इसमें नारियल और तिल का प्रयोग इसे विशिष्ट बनाता है अंग्रेजों ने यही शब्द सभी भारतीय तरियों के लिए अपना लिया
  • ​शोरबा: फ़ारसी 'शुरबा' से आया पतला, साफ़ और पीने योग्य सूप-नुमा रस, जो गरम मसालों और तेजपत्ते के अर्क से बनता है।
  • ​कोरमा: धीमी आंच पर दही, भुने प्याज, काजू/बादाम और घी के साथ पकाया गया अत्यंत गाढ़ा, शाही और मखमली व्यंजन ,,,इसमें खसखस का उपयोग खास है
  • कढ़ी: राजस्थान ,पंजाब ,गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़ तक जब दही या महि के साथ जब व्यंजन पकता है तो दक्षिण का करी पत्ता ,,कढ़ी पत्ता हो लेता है,,,अंतर इतना है उत्तर की कढ़ी ,,,गाढ़ी दही से और नीचे उतरते हुए छत्तीसगढ़ तक वह पतली मही में तब्दील हो जाती है

​प्राचीन साहित्य और आयुर्वेद 

​इन रसों और पत्तियों का इतिहास केवल आधुनिक रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रमाण प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं:

  • ​तमिल संगम साहित्य (1st-3rd Century CE): पट्टिनप्पालाई और अकनानूरु में 'कड़ि' (काली मिर्च से बने रस) और 'पुळिच्चाऋ' (आधुनिक रसम का पूर्वज) का उल्लेख मिलता है, जहाँ स्थानीय करी पत्ते और काली मिर्च का प्रयोग बहुतायत में था।
  • ​संस्कृत साहित्य व आयुर्वेद: चरक व सुश्रुत संहिता में पतले पाचक रसों को 'यूष' (दाल/सब्जी का काढ़ा) और 'रस' कहा गया। अमरकोश में तेजपत्ते को 'तमालपत्र' के रूप में सुगंधित औषधि माना गया। 12वीं सदी के चालुक्य नरेश सोमेश्वर रचित 'मानसोल्लास' में छाछ व बेसन से बने 'तक्र-साधित' व्यंजनों (कढ़ी) का वर्णन है।

​ वैश्विक रसों का  संसार

​जब हम भारतीय रसों की तुलना वैश्विक व्यंजनों से करते हैं, तो रसों का विकासवादी क्रम और स्पष्ट होता है:

  • ​सूप की उत्पत्ति और फ्रेंच/रशियन कोर्स सिस्टम: 18वीं सदी तक फ्रांस में सारा खाना एक साथ मेज पर सजाया जाता था (Service à la française)। 19वीं सदी में रशियन शैली (Service à la russe) के आने से भोजन को क्रमबद्ध (Sequence) परोसना शुरू हुआ—फर्स्ट कोर्स (सूप/स्टार्टर) → मेन कोर्स (सालन/करी) → डेजर्ट (मीठा)। भारतीय रसों में 'शोरबा' और 'रसम' सीधे तौर पर फर्स्ट कोर्स/सूप की श्रेणी में आते हैं।
    • ​पश्चिम (Gravy, Broth, Consommé, Bisque): पश्चिमी रसोई में रसों का आधार भुने मीट का अर्क (Pan drippings), हड्डियों का स्टॉक और मक्खन-आटे का घोल (Roux) होता है।
    • ​पूर्वी एशिया (Ramen Broth, Dashi, Pho): चीन, जापान और वियतनाम में रसों का आधार बिना अत्यधिक तेल के—सोयाबीन (मिसो), समुद्री शैवाल (Dashi/Kombu) या हड्डियों को 12-18 घंटे उबालकर निकाला गया उमामी अर्क होता है।

 'सॉस' भी कभी कढ़ी थी????

​पश्चिमी व्यंजनों का सास कभी कढ़ी नहीं थी,,इन सभी रसेदार व्यंजनों के मूल में तरल पदार्थों को निकालने और सुरक्षित रखने का इतिहास छुपा है:

  • ​जूस (Juice): लैटिन के iūs (रस/सूप) से निकला शब्द है, जो फ्रेंच jus से होता हुआ अंग्रेजी में आया। दिलचस्प बात यह है कि लैटिन का iūs और संस्कृत का 'यूष' (काढ़ा/सूप) दोनों एक ही भारोपीय (Indo-European) भाषा परिवार से जुड़े हैं।
  • ​अर्क बनाम जूस: जूस जहाँ यांत्रिक रूप से निचोड़ा गया ताज़ा गूदेदार रस है, वहीं अर्क (Distillate) भाप को ठंडा करके एकत्र की गई वाष्पशील औषधीय बूंदें (जैसे गुलाब अर्क) हैं।
  • ​सॉस की उत्पत्ति: दुनिया का पहला दर्ज सॉस ईसा पूर्व पहली शताब्दी में रोमन साम्राज्य का 'गरम' (Garum) था, जो मछली को नमक में फर्मेंट करके बनाया जाता था। लगभग उसी कालखंड में चीन में स्वतंत्र रूप से 'जियांग' और आगे चलकर कम खर्चीला 'सोया सॉस' का विकास हुआ, जो बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से जापान (शॉयु) और पूरे पूर्व एशिया में फैला।

​भारतीय भोजन में तेजपत्ता, करी पत्ता और कसूरी मेथी केवल तीन पत्ते नहीं हैं; वे भारत की जलवायु, वानस्पतिक विविधता और पाक-कला के दर्शन का प्रतीक हैं। तेजपत्ता जहाँ हिमालय की वादियों और उत्तर की शाही रसोइयों की गरिमा है, करी पत्ता प्रायद्वीपीय भारत की ताज़गी और आरोग्य का संवाहक है, वहीं कसूरी मेथी थार के मरुस्थल से निकली वह सुगंध है जो पूरे देश के व्यंजनों को एक मखमली मिजाज देती है। तेज पत्ता और कसूरी मेथी सूखी उपयोग में आती है वही करी पत्ता बिलकुल ताजी,,,धनिया पत्ते का जिक्र इसमें नहीं आने का कारण यह है कि यह पूरे भारत में समान रूप से फैला है इस पूरी यात्रा में छत्तीसगढ़ के रसा और झोर से लेकर मुगलई सालन शोरबा संस्कृति की अमर परंपरा मौजूद है माखन लाल चतुर्वेदी ने करी पत्ते पर कहा है

हरा-भरा करी-पत्ता, छौंक का श्रृंगार है,

सादे से खाने में भी, भरता अनोखा प्यार है

वही कसूरी मेथी पे फ़िराक़ गोरखपुरी कहते है 

​ज़रा सी कसूरी मेथी जो हाथों से मली उसने,

पुरानी रसमों की ख़ुशबू से घर महक उठा,,,

शनिवार, 26 सितंबर 2026

छोले और कुलचे

घर पे Petits pois à la française' 

इतवार की सुहानी सुबह, जब आसमान से बदली ने अपनी चादर हटाई, तो घर की रसोई का मिजाज भी एक नए रंग में रंग गया। बात जब चटखारे की हो, तो भला मन कैसे माने! धर्मपत्नी जी ने भी रसोई संभाली और पंजाबी कुलचे और मटर के छोलों के उस रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री) में एक नया जादुई समीकरण जमा दिया

​थाली महज़ एक नाश्ता नहीं, कही बढ़कर एक शाहकार थी। जिसका जायका सीधे अमृतसर की उन तंग गलियों के स्वाद की तहजीब समेटे हुए था, हर निवाले में इतिहास और ज़ायके का मेल । षड-रसों से लबरेज उन मज़ेदार छोलों के साथ इमली की खटाई, तीखी हरी चटनी, और कच्चे प्याज-टमाटर का साथ मानो सोने पर सुहागा । कभी मुगल बावर्चीखाने में बादशाह शाहजहां के पसंदीदे कुलचे परोसे जाते थे,,,ये स्वाद लाहौर और पेशावर से होता हुआ फिर लौटा जब पार्टिशन के बाद 1947 में पूर्वी पंजाब से आए शरणार्थी परिवारों ने अमृतसर की गलियों में सुबह नाश्ते के लिए अपने छोटे छोटे ठेले सजाए,,,इस तरह यह हुनर अपनी रियायती विरासत के साथ आज इस अंजाम तक पहुंचा है

 मक्खन में लिपटे हुए हर इक कौर में मसालों की जुंबिश, वैसे तो मटर के ऐसे ही व्यंजन का फ्रांसीसी तर्जुमा 'Petits pois à la française' कहा जाता है,  सच तो यह है कि इस नाश्ते की प्लेट में इन मटर (पीज) का मज़ा चखने के बाद जो सुकून मिला कि मानों ज़िंदगी का सारा 'पीस' (Peace) यहीं मिल गया हो!

शनिवार, 15 अगस्त 2026

चोरी

 

​अरसे से जंगली भैंसों ने,

मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,

ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,

कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।

​चींटियों की वो मौन समझदारी,

सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,

बदले में मिले मिठास के रस से,

अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।

​दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,

बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,

इंसान ने देखा, समझा और सीखा,

उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।

​प्रकृति के इस खुले द्वार से,

मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,

पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,

अहंकार का दायरा और बड़ा।

​फिर हुनर के संग-संग उसने,

मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,

बाँटने की जो रीत थी जग की,

उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।

​आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,

पर विडंबना का दायरा देखिए—

जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,

अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!

रविवार, 9 अगस्त 2026

वक्त धरती के चक्कर के साथ चलता है,,,हाथ में बंधी घड़ी भी,,,फिर कलेंडर के पत्ते पलटे जाते है आखिरकार पूरा कलेंडर बदल जाता है,,,वक्त के जैसे,,पर कई घरों में भूख नहीं बदलती,,,वो कायम रहती है वैसे ही
                कारखाने की छत से गिरधर गिर गया ,,,तुरंत साँसे रुक गई
सर की चोट थी ,,,मुर्दा शरीर एम्बुलेंस में रखते हुए ही सब जान गए कि उसमें जान नहीं रही,,, भीड़ और नारे लोकतंत्र की पहली सीख है ,,,सारे मजदूर एक स्वर में फैक्ट्री की ईंट से ईंट बजा रहे थे,,,करेंट लगने से मरा ,,, मुवाजा देना होगा,,,प्रबंधन और प्रशासन पहले समझाइश देता है ,,,मुवावजे पर विचार करता है ,, पुलिस भीड़ को संभालती है कभी भीड़ भी पुलिस को संभालती है,,,लोकतंत्र आगे बढ़ता है जब राजनेता आते है,, मरे गिरधर के बचे परिवार से मिलने,,,चाय भी पड़ोस की झोपड़ी से आती है,, क्यूँ की रसोई खाली है,,,गिरधर भी खाली पेट फैक्ट्री गया था,,,नई नौकरी 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

सेल्युलेज पचता नहीं है
पचा देता है
आखिर मुक्त हो लेता है