गुरुवार, 30 जुलाई 2026

बांस की करिल कब उगेगी

शीर्षक: बांस की करिल कब उगेगी

धरती को बुनियादी तौर पर एक रास्ते ने बाँट दिया—
फिर सरहदों ने…
और उनके बीच कहीं
जैव विविधता भी बिखरती चली गई।

अधूरे से बंटे हुए जंगल—
जिन्हें एक राजमार्ग ने चीर दिया;
दुनिया की तरह अक्षांश-देशांतर में बँटे हुए—
एक ओर बार नवापारा का अभ्यारण्य,
दूसरी ओर दूर तक फैली कोमाखान तहसील।

धरती अब बँट चुकी है
और उसके साथ
उसकी विविधता भी।

जब हवा बहती है
तो बांस कस-मसाते हैं—
फिर मानसूनी मेघ फूट पड़ते हैं…
और उन्हीं के बीच
बांसों का बच्चा—करील
चुपचाप जन्म लेता है।

कोमल, पतला…
जैसे हरियाली की जिद।

अंदर तहसील में एक तख़्त रहा—
जिसे टोडर मल ने एक पदवी दी थी…
तहसीलदार।

यही तख़्त
जमीनी मामलों में फैसले लेता आया है—
करीब पाँच सौ बरस की एक न्याय प्रणाली,
जिसे न मुग़ल बदल पाए…
न अंग्रेज।

लोहे की ज़रीबों की जुगलबंदी में
नापी जाती रही ज़मीन—
और उसी के साथ
कई चीज़ें पहले से तय होती रहीं…

कोमाखान तहसील का बरामदा भीड़ से भरा था।

एक बुज़ुर्ग आदमी दीवार के सहारे खड़ा था—
हाथ में विचित्र चित्तीदार दरख़्वास्त
जैसे बांस की नई उगती कलम—
करील की तरह कोमल…

कुछ फैसले आदमी नहीं चुनता—
वे कहीं दर्ज होते हैं पहले से…
कभी खसरे में…
कभी रकबे में…
और कभी… बस हालात में।

भीतर कमरे में तहसीलदार बैठे थे।

फाइल खुली—
“अभिलेख अपूर्ण।”
“पुनः परीक्षण आवश्यक।”

और दूसरी तरफ—
उसी जमीन पर एक और दावा।

बाहर से आवाज़ गूंजी—
“उल्लन पटेल… हाज़िर हो!”

भीड़ सरकी।

पीछे खड़े लोग बुदबुदाए—
“मामला में पेच है…”
“इस डोकरे को दुनियादारी समझाना मुश्किल है…”

एक हंसी—
“ये उस मुक़द्दर से भिड़ गया है
जिसे पटवारी लिखता है…”ब्रह्मा नहीं

कमरे में
कलम कुछ पल रुकी रही।

फाइल पर दर्ज हुआ—
“प्रस्तुत अभिलेख अपर्याप्त, प्रकरण अवलोकनार्थ।”

बस इतना।

बाहर फिर आवाज़ आई—
“महंगू केवट… हाज़िर हो!”

भीड़ आगे बढ़ी।

वो बुज़ुर्ग कुछ पल दरवाज़े पर खड़ा रहा—
फिर अपनी चित्तीदार दरख़्वास्त सीने से लगाकर
चुपचाप बाहर निकल गया।

खिड़की के बाहर
बांस हिल रहे थे…
और उनके नीचे
कुछ करील अब भी उग रहे थे।

करील के उगने की तारीख़ तय नहीं होती,
न मौसम उसकी इजाज़त मांगता है—
पर मुकदमे…
उफ़्फ़…
न उनकी तारीख़ तय होती है,
न उनका मौसम।

शनिवार, 14 मार्च 2026

मृत्यु आने न देना

हे देव,,अब मृत्यु आने न देना
जीवन रहे सदा निरंतर
कभी मृदा होकर सो जाऊ
कभी लहर उफन बह जाऊ
कभी फूल कभी तितली सा बिखरू 
कभी पतझड़ बन कर बिछ जाऊं
मुझे अहसास सा अमृत देकर
मिटा भी देना बना भी देना
मेधा देकर मानुष जना 
पर अपना अस्तित्व गंवाया मैने
अब जब फिर रच जाऊंगा
विभग,,, वृक्ष सा स्मृति लेकर
तब सबके साथ चलूंगा
निर्भीक होकर निश्चिंत होकर


सोमवार, 2 मार्च 2026

पाटा टू पाटा

इस पाटे से उस पाटे तक,,
किस्सा वही पुराना था
कहीं मेरा खंजर लाल हुआ
कही तेरा चूतड जाना था

उम्मीदों की तकरीरें थी
मै भी दादा बन जाऊंगा
संघर्षों की इस तपोभूमि में
थाने का डंडा खाना था

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026


वो पहली मुहब्बत थी याकि पहली बियर
जरा कहिए कैसे भूल जाए
गहरे कुएं सी प्यास थी जन्मों जनम की
और तेरी भूरी बोतल ,
,पसीने से लथपथ
लंगड़ी स्टूल पर तली फल्लियों के संग पेश हुई
वो कमबख्त खट्ट का शोर 
ढक्कन उछल कर अरमानों को झकझोर गया 
मग भी छुक सदका कर बैठा,,
सुनहरी धार जैसे सोने का लहू
बुलबुले ख्वाब के माफिक क्या कन्हू 
फिर पहली चुस्की तबस्सुम सी,, होठों पे जा लगी
आय हाय,,,,,
जरा खट्टी जरा कड़वी 
हलक को खुरदुराते गुजर ली जिस तमीज से
हर जर्रा हिल गया बवाल हुआ
कभी जो मदहोशी 
हमने तो तेरी आंखों में कभी झांकी थी
आज फिर वही अहसास वही कमाल हुआ
दो मग हलाक हुए  जन्नत जमी उतर आया
तेरे जस्बातो से शख्सियत का सवाल हुआ
या तू हकीकत है ,,या वो 
खैर रहने दे ,,,तेरे जाने का गम 



शनिवार, 24 जनवरी 2026

घर लौट कर आना,,तुम्हारे करीब

मै कोलाहल और शोर छोड़ कर आया हु
दुनियावी हर मोह छोड़ कर आया हु
हर उलझन उपापोह छोड़ कर आया हु
तुम बस थोड़ा सा भात पसा लेना
कांसे की थाली पे भाजी चौलाई की
हम कौर बना बना कर खा लेंगे
यूं साथ रहा तो 


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्रकाशित

मै प्रकाशित होने खातिर नहीं लिखता
मै प्रकाशित होने को लिखता हु ,,खुद से