शनिवार, 8 अगस्त 2026

सेल्युलेज पचता नहीं है
पचा देता है
आखिर मुक्त हो लेता है

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

चिड़ियाघर का किराया

चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी  ,,,आखिर बारिश का मौसम था,, खपरैल से कई मोरियां एक साथ चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी मां तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू सब्जी पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,पूरा क्लास महक जाता,,गुरुजी जान जाते,,कौन है रे
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया ,,,, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,सफेद धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी पीपल की छोटी सी कलम भी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
 
           
                       
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,क्यों आगे बताता हु,,,छत पर घांस भी उग आई थी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,विशाल वृक्ष,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता था उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले पूरा माहौल फिर जाग जाता,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखा बोला था न मिम्मी खुश हो जाता मै सोच में,,,अजीब सी बास उस आंगन में फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली बनती थी पर वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे
                       
यहाँ पूरा लेख प्रस्तुत है:

​मिम्मी मेरा प्राचीन मित्र
इसके आठ
​मित्रता या दोस्ती की एक अजीबो-गरीब दास्तान है। यह हमेशा से ही मौजूद रही। रक्त संबंधों से परे  ये पहले चुनाव पर आधारित है,,,
 खासतौर पर बचपन में हम ऐसे लोगों को चुनते हैं, जिनके साथ हमारे जस्बात और रुझान मिलता-जुलता हो।

​यह बात रही उसी दौर की ,,, 80 के दशक में मैं मिम्मी से मिला। मिम्मी मेरे छुटपन  का यार,  पहली और दूसरी में मेरा सहपाठी,फिर शायद दूसरी के बाद उसने स्कूल को अलविदा कह दिया,,खैर

मुलाकात ऐसे रही , उसके खपरैली घर के आंगन ,, एक वयोवृद्ध नीम पेड़ हुआ करता था। विशाल ,, गठिया  से ग्रस्त टेढा मेढ़ा,उस नीम की कनगियों  में  अजीबो गरीब घोंसले सजे होते रहे,,,कोलाहल से सजे,  भारतीय सफेद  गर्दन वाला गिद्ध जो रात गए जाने कैसी भाषा बोलता या फिर,फिर मौजूद रहे किस्म किस्म के कोकड़े, जिसमें काली पंख वाला हेरोन और फिर भूरी पंख वाला कैटल हेरोन, , अजीबोगरीब आदिम गीत,,जिससे कर्ण गीत झुंझला जाये

​इस घर में मानसून थक जाता रहा ऐसी बारिश  जो विचित्र सुगंध से भरी होती थी। यह सुगंध थी,, लाहौल बिलकुबत ,खासतौर पर जलीय जीवों के कैल्शियम और उनके प्रभाव से।

​जब हम उसके घर जाते थे, मैं और मिम्मी इस बात पर गौर करते थे कि एक अजीब किस्म की आदिम सुगंध उसके घर में भरी पड़ी है। इसके अलावा हम दोनों का रिश्ता अजीबोगरीब था, क्योंकि उसकी मां ढेलाबाई मेरे घर में नौकरानी का काम करती थी, और अपनी नौकरानी के बच्चे के साथ मैं उन दिनों नगर निगम के एक स्कूल में पढ़ता था।

​मेरा और मिम्मी का संबंध यह था कि उसके पास कुछ बुनियादी सुविधाएं थीं। वह धरती के कुछ ऐसे खूबसूरत संबंधों को समझता था, जो मेरे लिए समझ पाना बड़ा कठिन होता था। भौंरे को रिवर्स स्विंग देने की कला मैंने उसमें पहली बार देखी। जब भौंरे एक दिशा में फेंके जाते थे, लेकिन वह मुड़कर दूसरी दिशा में घूमने लगते थे, तो अब मुझको ऐसा लगता है कि सरफराज नवाज या वसीम अकरम की जो लाल गेंद टेस्ट मैच में रिवर्स स्विंग के रूप में घूमती थी, उस कला का असली आविष्कार हमारे यहां भौरों की इस दिशा और दशा से हुआ था। उन दिनों भौंरे बिना कील के मिलते थे, उन्हें बढ़ई से खरीदना पड़ता था, और बढ़ई से खरीदकर हम उन्हें लोहार के पास ले जाकर उस पर कील ठुकवाते थे।

​और उसके बाद शुरू होता था, उसके और मेरे घर के बीच मौजूद एक बरगद के पेड़ के नीचे जो पाटा बना था, जिसमें पता नहीं किस-किस किस्म के देवता, जिसमें आराध्य शिव से लेकर कई किस्म के पत्थर रखे होते थे।

​उनके बीच और उनके सामने बच्चों का एक खेलों का ओलंपिक होता था, जहाँ कई किस्म के खेल खेले जाते थे। भौंरे वहाँ घूमते थे, और उन दिनों कंचे वहाँ फेंके जाते थे, और कंचों के ऊपर भी ऐसे बड़े चीनी मिट्टी के कंचे होते थे जो एक दूसरे को निशाने लगाते थे।

​इस पूरी परिधि के आसपास जो व्यंजन हम लोग अपने सुपीरियरिटी काम्प्लेक्स में खाते थे कि शायद 25 पैसा मुझे मिल जाता था जो मिम्मी को पाँच पैसे के रूप में मिलता था, मैं नड्डा खा सकता था और खस्ता खा सकता था, और मिम्मी उस चैलेंज को स्वीकार करता था कि शाम को जब चाट का ठेला लगेगा तब आना। चाट के उस ठेले में जो आलू की टिकिया बनती थी और भटूरा उबलता था, और आलू टिक्कियों के बीच जब वो सामंजस्य स्थापित होता था, जिसमें उन दिनों लाल मिर्च, साथ में कटी हुई हरी मिर्च, प्याज, टमाटर, और साथ में इमली की खटाई होती थी। इमली की खटाई से बना हुआ यह पूरा व्यंजन चाट नहीं 'चाट' होता था। इसी चाट को हम खाते थे और इस गरमागरम चाट के साथ इसी गरमागरम मसाले को उन दिनों आधे पके गुपचुपों में ठूंसकर, जब इमली पानी के साथ अपने उदर को समृद्ध करते थे, तो ऐसा लगता था कि इससे बड़ा व्यंजन और कोई नहीं होता था। यह वो दौर था जब पिज़्ज़ा, बर्गर, या फिर और कोई भी विदेशी डिश इस भूभाग के संपर्क में नहीं आ पाई थी, लेकिन वो स्वाद आज भी जीभ में हाजिर है।

​स्कूल के बाहर एक कसेर महिला छोटा सा बाँसों की टोकरी लेकर बैठती थी, जिसमें एक जर्मन की गंजी होती थी। उसके अंदर से निकलता था एक बड़ा, और उस बड़े के ऊपर चना और साथ में भटूरा उसकी तरी डलती थी, और हल्की सी इमली की चटनी, और उस इमली चटनी के साथ पता नहीं किस किस्म के अजीबोगरीब मसाले उसमें छिड़के जाते थे, और 25 पैसे में वो व्यंजन हमको उपलब्ध होता था। ठीक उसके किनारे एक नाली होती थी जिसमें काई जमी होती थी, लेकिन ये गौरतलब है कि उन दिनों हाइजीन को लेकर ऐसी आशंकाएं हमारे मन में नहीं होती थी।

​फिर दौर आता था गर्मियों का, जब महानदी की रेत के अंदर पहले पहल बड़े-बड़े काले कलंदर - जो शायद आज के चितकबरे कलंदरों से भिन्न हैं - उनकी फांकी 10 पैसे में बिकती थी। साथ ही बिकती थी बोईर की गुड़ से डली हुई एक खास किस्म की डेजर्ट की चटनी। नाग पंचमी आती थी तो बड़े-बड़े खीरे उभर आते थे, और रेत में उगे इन खीरों को जब काटकर उसमें नमक-मिर्ची लगाया जाता था, तो वो स्वाद आज भी जीभ के डीएनए में दर्ज है। वैसा स्वाद आज भी नहीं मिल पाता, क्योंकि उन दिनों खीरों के ऊपर एक खास किस्म के रोए हुआ करते थे।

​इन सारे व्यंजनों और उनकी स्मृतियों के साथ एक बार मैं अपने परिवार के साथ राजिम से गुजर रहा था। गंज रोड के पास अचानक एक ठेले पर मेरी नजर पड़ी, और मुझे अपने बचपन का वही मित्र मिम्मी मिल गया, जिसने मुझे कोकड़ों और गिद्धों के बीच का अंतर समझाया था।

बुधवार, 5 अगस्त 2026

धतूरा

महाशिव का प्रिय,,विदेशी धतूरा

धतूरैः पूजनं शंभोः सर्वकामफलप्रदम्।
विषनाशकरं चैव सर्वसौभाग्यवर्धनम्॥
(अर्थात: भगवान शिव का धतूरे के फूलों या फलों से पूजन करना सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला, विष—यानी नकारात्मकता और कष्टों—का नाश करने वाला तथा समस्त सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।)
​भगवान शिव को धतूरा अर्पित करने का महात्म्य दर्शाने वाला यह प्राचीन श्लोक  है। परंतु यह आश्चर्यजनक है कि महादेव का प्रिय धतूरा मूलतः भारतीय ही नहीं है, बल्कि यह प्रशांत महासागर के उस पार स्थित अमेरिका महाद्वीप के मैक्सिको की मूल प्रजाति है, जिसका वैज्ञानिक नाम डातुरा स्ट्रामोनियम (Datura stramonium) है। पशुपति नाथ की सेंधव मुहरों से लेकर ऋग्वेद के रुद्र शिव तक भारत में शैव पूजा का हजारों वर्ष प्राचीन इतिहास है इसी कारण शिव आदिदेव भी कहे जाते है परन्तु धतूरे को वनस्पति शास्त्री मूलतः मेक्सिको का पौधा बताते है जो बाद में भारत पहुंचा,,परन्तु प्रश्न है कब और कैसे
​लगभग दो हज़ार वर्षों पहले इसका उल्लेख चरक संहिता में 'उन्मत्त' या 'धत्तूर' के रूप में मिलता है, जो इसे भ्रम पैदा करने वाली औषधि बताते हैं। वहीं, महर्षि सुश्रुत इसे कुत्तों के काटने से होने वाले रोग 'रेबीज' के उपचार में उपयोगी मानते हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र के अनुसार, नागरक या शहरी लोग धतूरे को तांबूल (पान) के साथ मिलाकर एक सुगंधित लेप तैयार करते थे। महाकवि बाणभट्ट अपनी रचना 'हर्षचरित' में विंध्यांचल के वनों की आटविक (जंगली) जातियों द्वारा तंत्र में प्रयुक्त औषधि के रूप में इसका उल्लेख इस प्रकार करते हैं:
​उद्गत-धत्तूर-प्ररोह-संकुलैः, प्रगुणीकृत-शबर-पल्लव-कुटीरैः...
(भावार्थ: वह विंध्य के जंगल का क्षेत्र था, जो बाहर निकले हुए धतूरे के पौधों के अंकुरों से घिरे हुए थे और जहाँ शबरों—जंगली जातियों—की पत्तों से बनी कुटियाएँ थीं...)
​चोल काल के प्रसिद्ध ऐरावतेश्वर मंदिर में भगवान शिव की कंकाल मूर्ति की जटाओं और आभूषणों में धतूरे के फूल का अंकन मिलता है। इन साक्ष्यों से यह ज़ाहिर है कि धतूरा ईस्वी सन के आस-पास ही भारत भूमि में आ चुका था, जबकि इसके पहले वेदों, उपनिषदों या फिर सैन्धव सभ्यता में यह पूर्णतः अनुपस्थित मिलता है। प्रश्न यह है कि फिर यह आदिदेव शिव का प्रिय फूल कैसे हुआ?
​कोलम्बस की अमेरिका की खोज (1492 ईस्वी सन) के बाद ही 'नई दुनिया' की वनस्पतियां एशिया और यूरोप के संपर्क में आईं, जिसमें आलू, टमाटर, मिर्च, कद्दू से लेकर तंबाकू जैसी आज की प्रचलित किस्में शामिल हैं। फिर धतूरा ईस्वी सन की शुरुआत में भारत तक कैसे पहुंचा? क्या प्री-कोलम्बस काल में भी अमेरिकी महाद्वीप से भारतीय संपर्क हुआ था? यह इतिहास की एक अबूझ पहेली है। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के नवीन अनुसंधानों में यह साबित हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया के मूल नेटिव आदिवासियों में लगभग चार हजार साल पहले भारतीय डीएनए पाए गए हैं, जो द्रविड़ एवं तटीय भारतीय व्यापारिक संबंधों की पुष्टि करते हैं, परंतु मैक्सिको के संदर्भ में ऐसे किसी भी आदान-प्रदान के साक्ष्य कोलम्बस से पहले नहीं मिलते।
​हालांकि, ऐसी विकास अवधारणाओं को 'अभिसारी विकास' (Convergent Evolution) के रूप में भी देखा जाता है। जब अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले जीवों या पौधों को पर्यावरण, जलवायु या जीवनशैली की लगभग एक जैसी चुनौतियाँ मिलती हैं, तो प्रकृति उन्हें जीवित रहने के लिए समान शारीरिक या जैविक रूप ढालने पर मजबूर कर देती है। भारत एवं मैक्सिको दोनों देश उत्तरी गोलार्ध में लगभग एक ही अक्षांश बैंड के आसपास आते हैं, जिसके कारण दोनों जगहों पर उष्णकटिबंधीय (Tropical) और उपोष्णकटिबंधीय (Subtropical) प्रकार की जलवायु का प्रभाव देखने को मिलता है। इसके प्रभाव से दोनों जगहों पर अगेवे (Agave), कैक्टस (जिससे वहाँ की शराब 'टकीला' बनती है), और कपास जैसी प्रजातियाँ अपनी विशेषताओं के साथ पनपीं।
​जैसे हमारे धार्मिक प्रयोजनों में धतूरा भगवान शिव को समर्पित होता है, ठीक वैसे ही विशेषकर एज़्टेक और वहाँ की अन्य स्थानीय संस्कृतियों में धतूरे (जिसे स्थानीय भाषा में 'तोलुआत्ज़िन' / Toloatzin या 'तलोअचे' / Toloache कहा जाता है) का उपयोग एक पवित्र और मादक पौधे के रूप में किया जाता था। हिंदू धर्म में जैसे धतूरे को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता है और अनुष्ठानों व पूजन में इसका विशेष स्थान है, उसी प्रकार मैक्सिको की प्राचीन मान्यताओं में यह पौधा मुख्य रूप से मौत, अंडरवर्ल्ड (पाताल लोक), और अंधकार या रात की शक्तियों से जुड़े देवताओं से जुड़ा हुआ था।
​इससे जुड़े प्रमुख देवता निम्नलिखित हैं:
​ओमेटेकुटली (Omeyocan): शक्तियों से जुड़े देवी-देवता। एज़्टेक पौराणिक कथाओं में धतूरे जैसे शक्तिशाली मतिभ्रम पैदा करने वाले पौधों को पाताल लोक और रहस्यों के देवताओं के अधीन माना जाता था।
​ यद्यपि धतूरा सीधे तौर पर किसी एक एकल मदेवता का 'प्रिय फूल' नहीं था, लेकिन इसके अनुष्ठानिक उपयोग मुख्य रूप से मृत्यु के देवता (मिक्ट्लांतेकुत्ली) और वर्षा एवं सृजन के देवता (टलालोक) से जुड़े कर्मकांडों में भविष्य देखने (Divination), आत्माओं से संपर्क करने और चेतना को शून्य में ले जाने के लिए किए जाते थे।
​सांस्कृतिक समानता की बात करें तो जैसे भारत में शिव को अघोर, योग, वैराग्य और चेतना की ऐसी अवस्था का प्रतीक माना जाता है जहाँ सामान्य नियम लागू नहीं होते, वैसे ही मैक्सिको के आदिवासी और तांत्रिक अनुष्ठानों में धतूरे का उपयोग करने वाले पुरोहित (शामन) इसे पारलौकिक दुनिया (Spirit World) के द्वार खोलने वाली जड़ी-बूटी मानते थे। एज़्टेक संस्कृति में इसे एक पावन लेकिन अत्यंत खतरनाक देवता की देन माना जाता था, जिसके गलत इस्तेमाल पर भारी प्रकोप का डर होता था। माया सभ्यता में प्रजनन और सृजन के देवता 'चाक' के मंदिर इस तरह स्थापित किए जाते थे कि उन पर लगातार बारिश का जल गिर सके। धतूरा इन सभ्यताओं में अनुष्ठानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
​तो क्या ये सांस्कृतिक समानताएं किसी ऐसे 'घोस्ट डीएनए' (Ghost DNA) से जुड़ी हैं जिसकी पहचान अब तक नहीं हो पाई है? नौवीं-दसवीं शताब्दी में स्कैंडिनेविया के वाइकिंग्स ने ज़रूर अमेरिका में अपनी बस्ती बसाई थी, पर हमारा धतूरा उससे बहुत पहले ही भारत भूमि पहुंच चुका था। पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन से निकले विष पान के कारण भगवान शिव को 'नीलकंठ' कहा गया है। कालकूट विष की उष्णता इतनी अधिक थी कि देवताओं और ऋषियों ने शिवजी की इस महापीड़ा को शांत करने के लिए उन्हें ठंडी प्रकृति वाली और विष का प्रभाव काटने वाली औषतियाँ अर्पित कीं। कालकूट विष के प्रचंड ताप से पीड़ित शिवजी की पीड़ा को शांत करने में धतूरे ने अपनी मुख्य भूमिका निभाई, इसलिए भगवान शिव को धतूरा अतिप्रिय माना गया है।
​हैरत की बात यह है कि धतूरे की तरह ही पीला कनेर का फूल भी मैक्सिको से पुर्तगालियों द्वारा पंद्रहवीं सदी में ही आया था (हालांकि सफेद कनेर भारत में पहले से होता था) और यह पीला कनेर भी शिव पूजन में अत्यधिक लोकप्रिय है। आखिरकार 'द विंची कोड' की तरह के इस रहस्य, भगवान शिव की मैक्सिकन संस्कृति से साम्यता और धतूरे की इस अलौकिक-अज्ञेय यात्रा के कई प्रश्न अभी सुलझने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।किसी जीव द्वारा या समुद्र में बह कर आने के विषय पर शोध आवश्यक है इसलिए  मध्य काल के कवि बिहारीदास के शब्दों में—
​कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय,
वा खाए बौराय जग, इहि पाए बौराय।
​इसी 'कनक' (धतूरे) की मादकता का भारत में विशेष धार्मिक व सांस्कृतिक प्रभाव आज भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

धतूरा

धतूरैः पूजनं शंभोः सर्वकामफलप्रदम्।

विषनाशकरं चैव सर्वसौभाग्यवर्धनम्॥


(अर्थात: भगवान शिव का धतूरे के फूलों या फलों से पूजन करना सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला, विष (नकारात्मकता और कष्टों) का नाश करने वाला तथा समस्त सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।) भगवान शिव को धतूरा अर्पित करने का महात्म्य दर्शाने वाला यह श्लोक शिव पुराण से है ,,पर यह आश्चर्यजनक है कि महादेव का प्रिय धतूरा ,,,मूलतः भारतीय ही नहीं है यह तो प्रशांत महासागर के उस पार स्थित अमेरिका महाद्वीप के मेक्सिको की मूल प्रजाति है ,,,जिसका वैज्ञानिक नाम है डातुरा स्ट्रामोनियम (Datura stramonium) ,,,लगभग दो हज़ार वर्षों पहले इसका उल्लेख चरक संहिता में उन्मत्त या धत्तूर के रूप में मिलता है जो इसे भ्रम पैदा करने वाली ओषधि बताते है वहीं महर्षि सुश्रुत इसे कुत्तों के काटने से होने वाले रोग रेबीज के उपचार में उपयोगी मानते है,,वात्स्यायन के कामसुत्र के अनुसार नागरक या शहरी लोग धतूरे को ताम्बूल पान के साथ मिला कर एक सुगंधित लेप तैयार करते थे,,महाकवि बाणभट्ट अपनी रचना हर्ष चरित्र में विंध्यांचल के वनों के आट विक जनजातियों द्वारा तंत्र में प्रयुक्त ओषधि के रूप में इसका उल्लेख करते है

उद्गत-धत्तूर-प्ररोह-संकुलैः, प्रगुणीकृत-शबर-पल्लव-कुटीरैः...


(भावार्थ):

(वह विंध्य के जंगल का क्षेत्र था, जो बाहर निकले हुए धतूरे के पौधों के अंकुरों से घिरे हुए थे और जहाँ शबरों (जंगली जातियों) की पत्तों से बनी कुटियाएँ थीं...)

चोल काल के प्रसिद्ध ऐरावतेश्वर मंदिर में भगवान शिव की कंकाल मूर्ति की जटाओं और आभूषण में धतूरे के फूल का अंकन मिलता है इन साक्ष्यों से ये जाहिर है कि धतूरा ईस्वी संवत् के आस पास से भारत भूमि में आ चुका था,,इसके पहले वेदों या उपनिषदों में या फिर सैन्धव सभ्यता में यह पूर्णतः अनुपस्थित मिलता है,,, प्रश्न यह है कि फिर यह आदिदेव शिव का प्रिय फूल कैसे हुआ

कोलम्बस की अमेरिका की खोज 1492 ईस्वी संवत् के बाद ही नई दुनियां की वनस्पतियां एशिया और यूरोप के संपर्क में आई,,जिसमें आलू टमाटर मिर्च ,,कद्दू से लेकर तंबाकू जैसी आज की प्रचलित किस्में शामिल है,,,फिर धतूरा कैसे ईस्वी संवत् की शुरूआत में भारत तक पहुंचा,,,क्या प्री कोलम्बस टाइम में भी अमेरिकन महाद्वीप से भारतीय संपर्क हुआ ,,यह इतिहास की अबूझ पहेली है,,,मेक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के नवीन अनुसंधानों में यह साबित हुआ है कि आस्ट्रेलिया के मूल नेटिव आदिवासियों में लगभग चार हजार साल पहले भारतीय डी एन ए पाए गए है जो द्रविड़ एवं तटीय भारतीय व्यापारिक संबंधों की पुष्टि करते है,,पर मेक्सिको के संदर्भ में ऐसे किसी भी आदान प्रदान के साक्ष कोलम्बस के पहले नहीं  मिलते,,,

हालांकि ऐसी विकास अवधारणाओं  को  "अभिसारी विकास" (Convergent Evolution) के रूप में भी देखा जाता है

​जब अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले जीवों या पौधों को पर्यावरण, जलवायु या जीवनशैली की लगभग एक जैसी चुनौतियाँ मिलती हैं, तो प्रकृति उन्हें जीवित रहने के लिए समान शारीरिक या जैविक रूप ढालने पर मजबूर कर देती है। भारत एवं मेक्सिको दोनों देश उत्तरी गोलार्ध में लगभग एक ही अक्षांश बैंड के आसपास आते हैं, जिसके कारण दोनों जगहों पर उष्णकटिबंधीय (Tropical) और उपोष्णकटिबंधीय (Subtropical) प्रकार की जलवायु का प्रभाव देखने को मिलता है।और इसके प्रभाव से दोनों जगह अगेवे (Agave) या फिर एक कैक्टस जिससे वंहा की शराब टकीला बनती है या फिर कपास जो दोनों ही ओर अपनी विशेषताओं के साथ पनपा ,,,

जैसे हमारे धार्मिक प्रयोजनों में धतूरा भगवान शिव को समर्पित होता है ठीक वैसे ही विशेषकर एज़्टेक और वहाँ की अन्य स्थानीय संस्कृतियों) में धतूरे (जिसे स्थानीय भाषा में 'तोलुआत्ज़िन' / Toloatzin या 'तलोअचे' / Toloache कहा जाता है) का उपयोग एक पवित्र और मादक पौधे के रूप में किया जाता था।

​हिंदू धर्म में जैसे धतूरे को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता है और उनके अनुष्ठानों या पूजन में इसका विशेष स्थान है, उसी प्रकार मेक्सिको की प्राचीन मान्यताओं में यह पौधा मुख्य रूप से मौत, अंडरवर्ल्ड (पाताल लोक), और अंधकार या रात की शक्तियों से जुड़े देवताओं से जुड़ा हुआ था।

​इससे जुड़े प्रमुख देवता

  • टिकटेलहोएके (Tloque Nahuaque) या ओमेटेकुटली (Omeyocan शक्तियों से जुड़े देवी-देवता): एज़्टेक पौराणिक कथाओं में धतूरे जैसे शक्तिशाली मतिभ्रम पैदा करने वाले पौधों को पाताल लोक और रहस्यों के देवताओं के अधीन माना जाता था।
  • टलालोक (Tlaloc) और मिक्ट्लांतेकुत्ली (Mictlantecuhtli): यद्यपि धतूरा सीधे तौर पर किसी एक एकल देवता का 'प्रिय फूल' नहीं था जैसे शिव का माना जाता है, लेकिन इसके अनुष्ठानिक उपयोग मुख्य रूप से मृत्यु के देवता (मिक्ट्लांतेकुत्ली) और वर्षा एवं सृजन के देवता (टलालोक) से जुड़े कर्मकांडों में भविष्य देखने (Divination), आत्माओं से संपर्क करने और चेतना को शून्य में ले जाने के लिए किए जाते थे।

सांस्कृतिक समानता:

जैसे भारत में शिव को अघोर, योग, वैराग्य और चेतना की ऐसी अवस्था का प्रतीक माना जाता है जहाँ सामान्य नियम लागू नहीं होते, वैसे ही मेक्सिको के आदिवासी और तांत्रिक अनुष्ठानों में धतूरे का उपयोग करने वाले पुरोहित (शामन) इसे पारलौकिक दुनिया (Spirit World) के द्वार खोलने वाली जड़ी-बूटी मानते थे। एज़्टेक संस्कृति में इसे एक पावन लेकिन अत्यंत खतरनाक देवता की देन माना जाता था जिसके गलत इस्तेमाल पर भारी प्रकोप का डर होता था। माया सभ्यता के देवता प्रजनन और सृजन के देवता चाक तो लींग की तरह मंदिरों के छत के नीचे स्थापित किये जाते थे जिस पर बारिश का जल सतत गिरता था,,,धतूरा इन सभ्यताओं में  अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण हिस्सा था,, फिर क्या ये सांस्कृतिक समानताएं किसी ऐसे भूतहा डी एन ए (गोस्ट डी एन ए) से जुड़ी है जिसकी पहचान अब तक नहीं हो पाई है,,,नवी दसवीं शताब्दी में स्कैंडिनेविया के वाइकिंग्स ने जरूर अमेरिका में अपनी बस्ती बसाई थी,,पर हमारा धतूरा उससे बहुत पहले ही भारत भूमि पहुंच चुका था,,पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन से निकले विष पान के कारण भगवान शिव को नील कंठ कहा गया है हलाहल विष की उष्णता इतनी अधिक थी कि देवताओं और ऋषियों ने शिवजी की इस महापीड़ा और शरीर की उष्णता को शांत करने के लिए उन्हें ठंडी प्रकृति वाली और विष का प्रभाव काटने वाली औषतियाँ अर्पित कीं।कालकूट विष के प्रचंड ताप से पीड़ित शिवजी की पीड़ा को शांत करने में धतूरे ने अपनी भूमिका निभाई, इसलिए भगवान शिव को धतूरा अतिप्रिय माना गया है। हैरत यह है कि धतूरे की तरह पीला कनेर का फूल भी मेक्सिको से पुर्तगालियों द्वारा पन्द्रहवीं सदी में ही आया,,हालांकि सफेद कनेर भारत में होता था,,और यह पीला कनेर भी शिव पूजन में लोकप्रिय है आखिरकार इस विंची कोड की तरह के रहस्य ,,भगवान शिव की मेक्सिकन संस्कृति से साम्यता और ,,,धतूरे के इस अलौकिक अज्ञेय यात्रा के कई प्रश्न अभी सुलझने की प्रतीक्षा कर रहे है

मध्य काल के कवि बिहारीदास के शब्दों में ,,कनक कनक के सौ गुणी ,,मादकता अधिकाय

एक खाए बोराय नर ,,एक पाए ब्यौराय की तर्ज में,,,इस कनक की मादकता का भारत में विशेष धार्मिक सांस्कृतिक प्रभाव आज भी देखा जा सकता है