शनिवार, 26 सितंबर 2026

छोले और कुलचे

घर पे Petits pois à la française' 

इतवार की सुहानी सुबह, जब आसमान से बदली ने अपनी चादर हटाई, तो घर की रसोई का मिजाज भी एक नए रंग में रंग गया। बात जब चटखारे की हो, तो भला मन कैसे माने! धर्मपत्नी जी ने भी रसोई संभाली और पंजाबी कुलचे और मटर के छोलों के उस रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री) में एक नया जादुई समीकरण जमा दिया

​थाली महज़ एक नाश्ता नहीं, कही बढ़कर एक शाहकार थी। जिसका जायका सीधे अमृतसर की उन तंग गलियों के स्वाद की तहजीब समेटे हुए था, हर निवाले में इतिहास और ज़ायके का मेल । षड-रसों से लबरेज उन मज़ेदार छोलों के साथ इमली की खटाई, तीखी हरी चटनी, और कच्चे प्याज-टमाटर का साथ मानो सोने पर सुहागा । कभी मुगल बावर्चीखाने में बादशाह शाहजहां के पसंदीदे कुलचे परोसे जाते थे,,,ये स्वाद लाहौर और पेशावर से होता हुआ फिर लौटा जब पार्टिशन के बाद 1947 में पूर्वी पंजाब से आए शरणार्थी परिवारों ने अमृतसर की गलियों में सुबह नाश्ते के लिए अपने छोटे छोटे ठेले सजाए,,,इस तरह यह हुनर अपनी रियायती विरासत के साथ आज इस अंजाम तक पहुंचा है

 मक्खन में लिपटे हुए हर इक कौर में मसालों की जुंबिश, वैसे तो मटर के ऐसे ही व्यंजन का फ्रांसीसी तर्जुमा 'Petits pois à la française' कहा जाता है,  सच तो यह है कि इस नाश्ते की प्लेट में इन मटर (पीज) का मज़ा चखने के बाद जो सुकून मिला कि मानों ज़िंदगी का सारा 'पीस' (Peace) यहीं मिल गया हो!

शनिवार, 15 अगस्त 2026

चोरी

 

​अरसे से जंगली भैंसों ने,

मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,

ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,

कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।

​चींटियों की वो मौन समझदारी,

सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,

बदले में मिले मिठास के रस से,

अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।

​दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,

बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,

इंसान ने देखा, समझा और सीखा,

उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।

​प्रकृति के इस खुले द्वार से,

मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,

पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,

अहंकार का दायरा और बड़ा।

​फिर हुनर के संग-संग उसने,

मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,

बाँटने की जो रीत थी जग की,

उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।

​आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,

पर विडंबना का दायरा देखिए—

जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,

अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!

रविवार, 9 अगस्त 2026

वक्त धरती के चक्कर के साथ चलता है,,,हाथ में बंधी घड़ी भी,,,फिर कलेंडर के पत्ते पलटे जाते है आखिरकार पूरा कलेंडर बदल जाता है,,,वक्त के जैसे,,पर कई घरों में भूख नहीं बदलती,,,वो कायम रहती है वैसे ही
                कारखाने की छत से गिरधर गिर गया ,,,तुरंत साँसे रुक गई
सर की चोट थी ,,,मुर्दा शरीर एम्बुलेंस में रखते हुए ही सब जान गए कि उसमें जान नहीं रही,,, भीड़ और नारे लोकतंत्र की पहली सीख है ,,,सारे मजदूर एक स्वर में फैक्ट्री की ईंट से ईंट बजा रहे थे,,,करेंट लगने से मरा ,,, मुवाजा देना होगा,,,प्रबंधन और प्रशासन पहले समझाइश देता है ,,,मुवावजे पर विचार करता है ,, पुलिस भीड़ को संभालती है कभी भीड़ भी पुलिस को संभालती है,,,लोकतंत्र आगे बढ़ता है जब राजनेता आते है,, मरे गिरधर के बचे परिवार से मिलने,,,चाय भी पड़ोस की झोपड़ी से आती है,, क्यूँ की रसोई खाली है,,,गिरधर भी खाली पेट फैक्ट्री गया था,,,नई नौकरी 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

सेल्युलेज पचता नहीं है
पचा देता है
आखिर मुक्त हो लेता है

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

चिड़ियाघर का किराया

चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी  ,,,आखिर बारिश का मौसम था,, खपरैल से कई मोरियां एक साथ चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी मां तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू सब्जी पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,पूरा क्लास महक जाता,,गुरुजी जान जाते,,कौन है रे
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया ,,,, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,सफेद धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी पीपल की छोटी सी कलम भी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
 
           
                       
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,क्यों आगे बताता हु,,,छत पर घांस भी उग आई थी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,विशाल वृक्ष,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता था उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले पूरा माहौल फिर जाग जाता,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखा बोला था न मिम्मी खुश हो जाता मै सोच में,,,अजीब सी बास उस आंगन में फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली बनती थी पर वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे