बुधवार, 5 अगस्त 2026

धतूरा

महाशिव का प्रिय,,विदेशी धतूरा

धतूरैः पूजनं शंभोः सर्वकामफलप्रदम्।
विषनाशकरं चैव सर्वसौभाग्यवर्धनम्॥
(अर्थात: भगवान शिव का धतूरे के फूलों या फलों से पूजन करना सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला, विष—यानी नकारात्मकता और कष्टों—का नाश करने वाला तथा समस्त सौभाग्य को बढ़ाने वाला होता है।)
​भगवान शिव को धतूरा अर्पित करने का महात्म्य दर्शाने वाला यह प्राचीन श्लोक  है। परंतु यह आश्चर्यजनक है कि महादेव का प्रिय धतूरा मूलतः भारतीय ही नहीं है, बल्कि यह प्रशांत महासागर के उस पार स्थित अमेरिका महाद्वीप के मैक्सिको की मूल प्रजाति है, जिसका वैज्ञानिक नाम डातुरा स्ट्रामोनियम (Datura stramonium) है। पशुपति नाथ की सेंधव मुहरों से लेकर ऋग्वेद के रुद्र शिव तक भारत में शैव पूजा का हजारों वर्ष प्राचीन इतिहास है इसी कारण शिव आदिदेव भी कहे जाते है परन्तु धतूरे को वनस्पति शास्त्री मूलतः मेक्सिको का पौधा बताते है जो बाद में भारत पहुंचा,,परन्तु प्रश्न है कब और कैसे
​लगभग दो हज़ार वर्षों पहले इसका उल्लेख चरक संहिता में 'उन्मत्त' या 'धत्तूर' के रूप में मिलता है, जो इसे भ्रम पैदा करने वाली औषधि बताते हैं। वहीं, महर्षि सुश्रुत इसे कुत्तों के काटने से होने वाले रोग 'रेबीज' के उपचार में उपयोगी मानते हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र के अनुसार, नागरक या शहरी लोग धतूरे को तांबूल (पान) के साथ मिलाकर एक सुगंधित लेप तैयार करते थे। महाकवि बाणभट्ट अपनी रचना 'हर्षचरित' में विंध्यांचल के वनों की आटविक (जंगली) जातियों द्वारा तंत्र में प्रयुक्त औषधि के रूप में इसका उल्लेख इस प्रकार करते हैं:
​उद्गत-धत्तूर-प्ररोह-संकुलैः, प्रगुणीकृत-शबर-पल्लव-कुटीरैः...
(भावार्थ: वह विंध्य के जंगल का क्षेत्र था, जो बाहर निकले हुए धतूरे के पौधों के अंकुरों से घिरे हुए थे और जहाँ शबरों—जंगली जातियों—की पत्तों से बनी कुटियाएँ थीं...)
​चोल काल के प्रसिद्ध ऐरावतेश्वर मंदिर में भगवान शिव की कंकाल मूर्ति की जटाओं और आभूषणों में धतूरे के फूल का अंकन मिलता है। इन साक्ष्यों से यह ज़ाहिर है कि धतूरा ईस्वी सन के आस-पास ही भारत भूमि में आ चुका था, जबकि इसके पहले वेदों, उपनिषदों या फिर सैन्धव सभ्यता में यह पूर्णतः अनुपस्थित मिलता है। प्रश्न यह है कि फिर यह आदिदेव शिव का प्रिय फूल कैसे हुआ?
​कोलम्बस की अमेरिका की खोज (1492 ईस्वी सन) के बाद ही 'नई दुनिया' की वनस्पतियां एशिया और यूरोप के संपर्क में आईं, जिसमें आलू, टमाटर, मिर्च, कद्दू से लेकर तंबाकू जैसी आज की प्रचलित किस्में शामिल हैं। फिर धतूरा ईस्वी सन की शुरुआत में भारत तक कैसे पहुंचा? क्या प्री-कोलम्बस काल में भी अमेरिकी महाद्वीप से भारतीय संपर्क हुआ था? यह इतिहास की एक अबूझ पहेली है। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के नवीन अनुसंधानों में यह साबित हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया के मूल नेटिव आदिवासियों में लगभग चार हजार साल पहले भारतीय डीएनए पाए गए हैं, जो द्रविड़ एवं तटीय भारतीय व्यापारिक संबंधों की पुष्टि करते हैं, परंतु मैक्सिको के संदर्भ में ऐसे किसी भी आदान-प्रदान के साक्ष्य कोलम्बस से पहले नहीं मिलते।
​हालांकि, ऐसी विकास अवधारणाओं को 'अभिसारी विकास' (Convergent Evolution) के रूप में भी देखा जाता है। जब अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले जीवों या पौधों को पर्यावरण, जलवायु या जीवनशैली की लगभग एक जैसी चुनौतियाँ मिलती हैं, तो प्रकृति उन्हें जीवित रहने के लिए समान शारीरिक या जैविक रूप ढालने पर मजबूर कर देती है। भारत एवं मैक्सिको दोनों देश उत्तरी गोलार्ध में लगभग एक ही अक्षांश बैंड के आसपास आते हैं, जिसके कारण दोनों जगहों पर उष्णकटिबंधीय (Tropical) और उपोष्णकटिबंधीय (Subtropical) प्रकार की जलवायु का प्रभाव देखने को मिलता है। इसके प्रभाव से दोनों जगहों पर अगेवे (Agave), कैक्टस (जिससे वहाँ की शराब 'टकीला' बनती है), और कपास जैसी प्रजातियाँ अपनी विशेषताओं के साथ पनपीं।
​जैसे हमारे धार्मिक प्रयोजनों में धतूरा भगवान शिव को समर्पित होता है, ठीक वैसे ही विशेषकर एज़्टेक और वहाँ की अन्य स्थानीय संस्कृतियों में धतूरे (जिसे स्थानीय भाषा में 'तोलुआत्ज़िन' / Toloatzin या 'तलोअचे' / Toloache कहा जाता है) का उपयोग एक पवित्र और मादक पौधे के रूप में किया जाता था। हिंदू धर्म में जैसे धतूरे को भगवान शिव से जोड़कर देखा जाता है और अनुष्ठानों व पूजन में इसका विशेष स्थान है, उसी प्रकार मैक्सिको की प्राचीन मान्यताओं में यह पौधा मुख्य रूप से मौत, अंडरवर्ल्ड (पाताल लोक), और अंधकार या रात की शक्तियों से जुड़े देवताओं से जुड़ा हुआ था।
​इससे जुड़े प्रमुख देवता निम्नलिखित हैं:
​ओमेटेकुटली (Omeyocan): शक्तियों से जुड़े देवी-देवता। एज़्टेक पौराणिक कथाओं में धतूरे जैसे शक्तिशाली मतिभ्रम पैदा करने वाले पौधों को पाताल लोक और रहस्यों के देवताओं के अधीन माना जाता था।
​ यद्यपि धतूरा सीधे तौर पर किसी एक एकल मदेवता का 'प्रिय फूल' नहीं था, लेकिन इसके अनुष्ठानिक उपयोग मुख्य रूप से मृत्यु के देवता (मिक्ट्लांतेकुत्ली) और वर्षा एवं सृजन के देवता (टलालोक) से जुड़े कर्मकांडों में भविष्य देखने (Divination), आत्माओं से संपर्क करने और चेतना को शून्य में ले जाने के लिए किए जाते थे।
​सांस्कृतिक समानता की बात करें तो जैसे भारत में शिव को अघोर, योग, वैराग्य और चेतना की ऐसी अवस्था का प्रतीक माना जाता है जहाँ सामान्य नियम लागू नहीं होते, वैसे ही मैक्सिको के आदिवासी और तांत्रिक अनुष्ठानों में धतूरे का उपयोग करने वाले पुरोहित (शामन) इसे पारलौकिक दुनिया (Spirit World) के द्वार खोलने वाली जड़ी-बूटी मानते थे। एज़्टेक संस्कृति में इसे एक पावन लेकिन अत्यंत खतरनाक देवता की देन माना जाता था, जिसके गलत इस्तेमाल पर भारी प्रकोप का डर होता था। माया सभ्यता में प्रजनन और सृजन के देवता 'चाक' के मंदिर इस तरह स्थापित किए जाते थे कि उन पर लगातार बारिश का जल गिर सके। धतूरा इन सभ्यताओं में अनुष्ठानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
​तो क्या ये सांस्कृतिक समानताएं किसी ऐसे 'घोस्ट डीएनए' (Ghost DNA) से जुड़ी हैं जिसकी पहचान अब तक नहीं हो पाई है? नौवीं-दसवीं शताब्दी में स्कैंडिनेविया के वाइकिंग्स ने ज़रूर अमेरिका में अपनी बस्ती बसाई थी, पर हमारा धतूरा उससे बहुत पहले ही भारत भूमि पहुंच चुका था। पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन से निकले विष पान के कारण भगवान शिव को 'नीलकंठ' कहा गया है। कालकूट विष की उष्णता इतनी अधिक थी कि देवताओं और ऋषियों ने शिवजी की इस महापीड़ा को शांत करने के लिए उन्हें ठंडी प्रकृति वाली और विष का प्रभाव काटने वाली औषतियाँ अर्पित कीं। कालकूट विष के प्रचंड ताप से पीड़ित शिवजी की पीड़ा को शांत करने में धतूरे ने अपनी मुख्य भूमिका निभाई, इसलिए भगवान शिव को धतूरा अतिप्रिय माना गया है।
​हैरत की बात यह है कि धतूरे की तरह ही पीला कनेर का फूल भी मैक्सिको से पुर्तगालियों द्वारा पंद्रहवीं सदी में ही आया था (हालांकि सफेद कनेर भारत में पहले से होता था) और यह पीला कनेर भी शिव पूजन में अत्यधिक लोकप्रिय है। आखिरकार 'द विंची कोड' की तरह के इस रहस्य, भगवान शिव की मैक्सिकन संस्कृति से साम्यता और धतूरे की इस अलौकिक-अज्ञेय यात्रा के कई प्रश्न अभी सुलझने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।किसी जीव द्वारा या समुद्र में बह कर आने के विषय पर शोध आवश्यक है इसलिए  मध्य काल के कवि बिहारीदास के शब्दों में—
​कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय,
वा खाए बौराय जग, इहि पाए बौराय।
​इसी 'कनक' (धतूरे) की मादकता का भारत में विशेष धार्मिक व सांस्कृतिक प्रभाव आज भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

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