शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

यहाँ पूरा लेख प्रस्तुत है:

​मिम्मी मेरा प्राचीन मित्र
इसके आठ
​मित्रता या दोस्ती की एक अजीबो-गरीब दास्तान है। यह हमेशा से ही मौजूद रही। रक्त संबंधों से परे  ये पहले चुनाव पर आधारित है,,,
 खासतौर पर बचपन में हम ऐसे लोगों को चुनते हैं, जिनके साथ हमारे जस्बात और रुझान मिलता-जुलता हो।

​यह बात रही उसी दौर की ,,, 80 के दशक में मैं मिम्मी से मिला। मिम्मी मेरे छुटपन  का यार,  पहली और दूसरी में मेरा सहपाठी,फिर शायद दूसरी के बाद उसने स्कूल को अलविदा कह दिया,,खैर

मुलाकात ऐसे रही , उसके खपरैली घर के आंगन ,, एक वयोवृद्ध नीम पेड़ हुआ करता था। विशाल ,, गठिया  से ग्रस्त टेढा मेढ़ा,उस नीम की कनगियों  में  अजीबो गरीब घोंसले सजे होते रहे,,,कोलाहल से सजे,  भारतीय सफेद  गर्दन वाला गिद्ध जो रात गए जाने कैसी भाषा बोलता या फिर,फिर मौजूद रहे किस्म किस्म के कोकड़े, जिसमें काली पंख वाला हेरोन और फिर भूरी पंख वाला कैटल हेरोन, , अजीबोगरीब आदिम गीत,,जिससे कर्ण गीत झुंझला जाये

​इस घर में मानसून थक जाता रहा ऐसी बारिश  जो विचित्र सुगंध से भरी होती थी। यह सुगंध थी,, लाहौल बिलकुबत ,खासतौर पर जलीय जीवों के कैल्शियम और उनके प्रभाव से।

​जब हम उसके घर जाते थे, मैं और मिम्मी इस बात पर गौर करते थे कि एक अजीब किस्म की आदिम सुगंध उसके घर में भरी पड़ी है। इसके अलावा हम दोनों का रिश्ता अजीबोगरीब था, क्योंकि उसकी मां ढेलाबाई मेरे घर में नौकरानी का काम करती थी, और अपनी नौकरानी के बच्चे के साथ मैं उन दिनों नगर निगम के एक स्कूल में पढ़ता था।

​मेरा और मिम्मी का संबंध यह था कि उसके पास कुछ बुनियादी सुविधाएं थीं। वह धरती के कुछ ऐसे खूबसूरत संबंधों को समझता था, जो मेरे लिए समझ पाना बड़ा कठिन होता था। भौंरे को रिवर्स स्विंग देने की कला मैंने उसमें पहली बार देखी। जब भौंरे एक दिशा में फेंके जाते थे, लेकिन वह मुड़कर दूसरी दिशा में घूमने लगते थे, तो अब मुझको ऐसा लगता है कि सरफराज नवाज या वसीम अकरम की जो लाल गेंद टेस्ट मैच में रिवर्स स्विंग के रूप में घूमती थी, उस कला का असली आविष्कार हमारे यहां भौरों की इस दिशा और दशा से हुआ था। उन दिनों भौंरे बिना कील के मिलते थे, उन्हें बढ़ई से खरीदना पड़ता था, और बढ़ई से खरीदकर हम उन्हें लोहार के पास ले जाकर उस पर कील ठुकवाते थे।

​और उसके बाद शुरू होता था, उसके और मेरे घर के बीच मौजूद एक बरगद के पेड़ के नीचे जो पाटा बना था, जिसमें पता नहीं किस-किस किस्म के देवता, जिसमें आराध्य शिव से लेकर कई किस्म के पत्थर रखे होते थे।

​उनके बीच और उनके सामने बच्चों का एक खेलों का ओलंपिक होता था, जहाँ कई किस्म के खेल खेले जाते थे। भौंरे वहाँ घूमते थे, और उन दिनों कंचे वहाँ फेंके जाते थे, और कंचों के ऊपर भी ऐसे बड़े चीनी मिट्टी के कंचे होते थे जो एक दूसरे को निशाने लगाते थे।

​इस पूरी परिधि के आसपास जो व्यंजन हम लोग अपने सुपीरियरिटी काम्प्लेक्स में खाते थे कि शायद 25 पैसा मुझे मिल जाता था जो मिम्मी को पाँच पैसे के रूप में मिलता था, मैं नड्डा खा सकता था और खस्ता खा सकता था, और मिम्मी उस चैलेंज को स्वीकार करता था कि शाम को जब चाट का ठेला लगेगा तब आना। चाट के उस ठेले में जो आलू की टिकिया बनती थी और भटूरा उबलता था, और आलू टिक्कियों के बीच जब वो सामंजस्य स्थापित होता था, जिसमें उन दिनों लाल मिर्च, साथ में कटी हुई हरी मिर्च, प्याज, टमाटर, और साथ में इमली की खटाई होती थी। इमली की खटाई से बना हुआ यह पूरा व्यंजन चाट नहीं 'चाट' होता था। इसी चाट को हम खाते थे और इस गरमागरम चाट के साथ इसी गरमागरम मसाले को उन दिनों आधे पके गुपचुपों में ठूंसकर, जब इमली पानी के साथ अपने उदर को समृद्ध करते थे, तो ऐसा लगता था कि इससे बड़ा व्यंजन और कोई नहीं होता था। यह वो दौर था जब पिज़्ज़ा, बर्गर, या फिर और कोई भी विदेशी डिश इस भूभाग के संपर्क में नहीं आ पाई थी, लेकिन वो स्वाद आज भी जीभ में हाजिर है।

​स्कूल के बाहर एक कसेर महिला छोटा सा बाँसों की टोकरी लेकर बैठती थी, जिसमें एक जर्मन की गंजी होती थी। उसके अंदर से निकलता था एक बड़ा, और उस बड़े के ऊपर चना और साथ में भटूरा उसकी तरी डलती थी, और हल्की सी इमली की चटनी, और उस इमली चटनी के साथ पता नहीं किस किस्म के अजीबोगरीब मसाले उसमें छिड़के जाते थे, और 25 पैसे में वो व्यंजन हमको उपलब्ध होता था। ठीक उसके किनारे एक नाली होती थी जिसमें काई जमी होती थी, लेकिन ये गौरतलब है कि उन दिनों हाइजीन को लेकर ऐसी आशंकाएं हमारे मन में नहीं होती थी।

​फिर दौर आता था गर्मियों का, जब महानदी की रेत के अंदर पहले पहल बड़े-बड़े काले कलंदर - जो शायद आज के चितकबरे कलंदरों से भिन्न हैं - उनकी फांकी 10 पैसे में बिकती थी। साथ ही बिकती थी बोईर की गुड़ से डली हुई एक खास किस्म की डेजर्ट की चटनी। नाग पंचमी आती थी तो बड़े-बड़े खीरे उभर आते थे, और रेत में उगे इन खीरों को जब काटकर उसमें नमक-मिर्ची लगाया जाता था, तो वो स्वाद आज भी जीभ के डीएनए में दर्ज है। वैसा स्वाद आज भी नहीं मिल पाता, क्योंकि उन दिनों खीरों के ऊपर एक खास किस्म के रोए हुआ करते थे।

​इन सारे व्यंजनों और उनकी स्मृतियों के साथ एक बार मैं अपने परिवार के साथ राजिम से गुजर रहा था। गंज रोड के पास अचानक एक ठेले पर मेरी नजर पड़ी, और मुझे अपने बचपन का वही मित्र मिम्मी मिल गया, जिसने मुझे कोकड़ों और गिद्धों के बीच का अंतर समझाया था।

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