शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

चिड़ियाघर,,,,का  किराया
माटी का घर था,मिम्मी का,,,गेरु पुता हुआ पर उन दिनों धुल गया था,,, छत थी लाल खपरैल की जिस पर सफेद सलेटी छींटे ,,,,,छत पर घांस भी उग आई थी पीपल की छोटी सी कलम भी ,,,बारिश का मौसम ,, खपरैल से कई मोरियां चुचवाती,,नीचे रखी जर्मन बाल्टी पहले भरती फिर घर का आंगन भी भर जाता ,,छोटे डबरा माफिक ,,,उसमें कागज के जहाज़ तैरते हमारे,,,  और मेढ़क के छोटे बच्चे,,,लाल गैंगरवा,,,अंधा सांप,,,उस आंगन के बीचों बीच एक चौरा था,,,चूना रंगा हुआ जिसमें एक झाड़ रहा या फिर तमीज से कहे तो ,,,बड़ा सा पेड़,,,, मोटे तने वाला लीम यानि नीम,, गजब झाड़ था,,,एकदम सीधा उठता फिर छाते जैसे पूरे घर आंगन के आसमान को घेर लेता,,,,निम्बोली हरी,,फिर पीली,,,खाने में बोईर जैसी जरा कड़वी सी,,,टपकती थी,,, मिम्मी इकट्ठे करता रहता,, उसकी अम्मा तेल निकालती थी ,,  चुपड़ने से जूं मर जाते थे बालों के,,,
               बात आगे निकल गई ,,,झाड़ पर ही चलते है,,,जिसके सबसे ऊपर डंगाली पर घोंसले फैले थे,,,बड़े घोंसले ,,छोटे घोंसले जाने कितने सारे,,झाड़ के बाल जैसे ,,,और उनमें कोकड़े के बच्चे,,,सफेद,,,भूरे बगुले के
चिचयाते रहते सुबह,,शाम ,,, चोंच खोल कर ,,,एक बोलता तो सब शुरू हो जाते ,,,हमारे स्कूल के पहाड़ा जैसे,,दु एकम दु,,,दु दूनी चार,,रटते हुए एक संगीत पैदा हो जाता,,,सीलन भरी कक्षा में संभरलाल गुरुजी को झपकी आ गई,,, मिम्मी को पांच के आगे पहाड़ा याद नहीं था,,,मुझे तो बीस तक आ गया,,,बीस एकम बीस बीस दूनी चालीस,,,अरे फिर बात छूट गई,,,
 घोंसले में चूजों के कोकड़े मां बाप तेजी से आते जाते ,,एक एक कर कभी साथ में,,,,उनके उतरने के पहले सब  जाग जाते,,,,,वो कभी डंडिया पकड़ कर तो कभी मेढक पकड़ कर लाते,,,पंख फैला कर चूजे स्वागत करते उनका,,,,, मिम्मी गाना गाता ,,,दूध दे कोकड़ा दूध दे एकर मुड़ी में मूत दे,,, कोकड़ा झट सफेद सलेटी बीट करता जो छत और आंगन को चितकबरा कर देता और मेरे नाखून में भी  सफेद धब्बे निकल आते,,,देखे बोला रहा न मिम्मी खुश होता मै सोच में,,मेरी मां मानती ही नहीं कि कोकड़े उसकी बात सुनते है,,,वो मुझे कैल्शियम की गोली निगलवाती ,मेरे घर नीम का पेड़ नहीं है पीपल का है बाहर पर उसमें कोकड़े घोंसले नहीं बनाते क्यों नहीं ,,बनाते तो दिखता मां को,, कोकड़े घर वाले की बात सुनते है
,,,अजीब सी बास उस आंगन में हमेशा फैली रहती,, बिसरईन मछली जैसी,,, मिम्मी के घर भी चूल्हे पर मछली डबकती थी  वो इतना महकती नहीं थी,,, टेंगना है खाबे,,,ढोल ढोल रसा संग गरम गुरमटीया भात का कौर,,, बिना मुड़ी के मछरी,,,लालच को रोके रखने में भला है,,,, मैने उसके घर फूटू साग खाया था,,घर में नहीं बताया,,बेहद मिठाया,,,
      इस घर को ही चिड़ियाघर कहना चाहिए,,,मैने सोचा,,,कितना कुछ है यंहा,, मैत्री बाग में शेर ,,भालू है,,पर पिंजरे में ,,,यंहा शेर भालू तो नहीं पर जो भी है बिलकुल खुल्ला,,,,कभी तो काला मुंह वाला बंदर भी उतरता है बारी में,, छीता फल और बिही जो है,,,उसकी मां साल भर सब्जी भाजी का बिजा इकट्ठा करती है लमेरा में,,,बारिश में छिड़क देती है कुछ दिन में चारों ओर नार,,,बारह मासी करेला,,,रामकेरिया,,, चिरपोटी पताल,,,लाल भाजी,,पूरा बाजार भर जाता है,,,हरा ही हरा,,पर खतरनाक जंगल,,,पीटपीटी सांप रोज दिखता है जोत्था जोत्था,,, केंवट कीड़ा ,,,लाल रानी कीड़ा,,और बस्साने वाला बूंदिया कीड़ा चमकीला,,,मुर्गी अपने चूजों को  लाइन में लगा कर झुरमुट में घुस जाती ,,हिम्मती,,,मैने नेवला और बन बिलवा भी देखा है बारी में शायद डोमी भी है फुस्स फुस्स करता है दिखा नहीं,,, मिम्मी भी हिम्मती है,,,अंदर से चिरपोटी पताल तोड़ लाता है,,उसकी बहन सिलबट्टा में चटनी पिसती है ,, अंगाकर रोटी खाने अलसी तेल के साथ,,,मै घर में सरसों तेल के साथ खाता हु,,,,वो टिफिन नहीं लाता ,,स्कूल में बहुत बच्चे नहीं लाते ,,उसे मेरे टिफिन का मेथी आलू पराठा मिठाता है,,कभी भी निकाल कर खा लेता है मेरे बस्ते से,,
        फिर उस रोज फड़फड़ाता कोकड़ा चूजा नीचे गिर गया,,, मिम्मी और उसकी बहनी ने पकड़ लिया,,,चल बाड़ी में राधेंगे,,, मैने मना भी किया  कहता था कुकुर हबक दीही अच्छा है मै खा लूं,,,मेरे घर का किराया, इंटा का चूल्हा बन चुका था ,,,दोनों भाई बहन मगन होकर कोकड़ा भून रहे थे,,, और ऊपर इसके माँ बाप चीख रहे थे,,,,मै सोचा मेरे सामने वाले पीपल में घोंसला बनाते तो मैं नहीं खाता,  ,,फिर  मुझे लगा चलो अब तो ये मिम्मी के गाने पर नहीं मुतेंगे,,,मै अपने नाखून देख रहा था ,,,धब्बे मिटने लग गए थे,,,

अनुभव
 
           
                       

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