अरसे से जंगली भैंसों ने,
मोटी घास को चर-चर कर छाँटा था,
ताकि बारिश की पहली बूँद से पहले,
कोमल नन्हीं दूब को उगाने का रास्ता बाँटा था।
चींटियों की वो मौन समझदारी,
सफेद इल्लियों को पत्तों पर चराती थी,
बदले में मिले मिठास के रस से,
अपनी छोटी-सी दुनिया चलाती थी।
दर्जिन चिड़िया पत्तों को सिलती थी,
बुनकर चिड़िया नीड़ बुनती थी,
इंसान ने देखा, समझा और सीखा,
उनकी कारीगरी से अपनी कला चुनी थी।
प्रकृति के इस खुले द्वार से,
मानव ने हुनर का हर पाठ पढ़ा,
पर जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता गया,
अहंकार का दायरा और बड़ा।
फिर हुनर के संग-संग उसने,
मक्कारी की नई चाल भी सीख ली,
बाँटने की जो रीत थी जग की,
उसे अपनी मुट्ठी में भींच ली।
आज वो सब जानता है जो वे जानते हैं,
पर विडंबना का दायरा देखिए—
जो कुछ भी उसने सीखा है इस जहाँ से,
अब अपने सिवा किसी और को नहीं बताता!
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