घर पे Petits pois à la française'
इतवार की सुहानी सुबह, जब आसमान से बदली ने अपनी चादर हटाई, तो घर की रसोई का मिजाज भी एक नए रंग में रंग गया। बात जब चटखारे की हो, तो भला मन कैसे माने! धर्मपत्नी जी ने भी रसोई संभाली और पंजाबी कुलचे और मटर के छोलों के उस रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री) में एक नया जादुई समीकरण जमा दिया
थाली महज़ एक नाश्ता नहीं, कही बढ़कर एक शाहकार थी। जिसका जायका सीधे अमृतसर की उन तंग गलियों के स्वाद की तहजीब समेटे हुए था, हर निवाले में इतिहास और ज़ायके का मेल । षड-रसों से लबरेज उन मज़ेदार छोलों के साथ इमली की खटाई, तीखी हरी चटनी, और कच्चे प्याज-टमाटर का साथ मानो सोने पर सुहागा । कभी मुगल बावर्चीखाने में बादशाह शाहजहां के पसंदीदे कुलचे परोसे जाते थे,,,ये स्वाद लाहौर और पेशावर से होता हुआ फिर लौटा जब पार्टिशन के बाद 1947 में पूर्वी पंजाब से आए शरणार्थी परिवारों ने अमृतसर की गलियों में सुबह नाश्ते के लिए अपने छोटे छोटे ठेले सजाए,,,इस तरह यह हुनर अपनी रियायती विरासत के साथ आज इस अंजाम तक पहुंचा है
मक्खन में लिपटे हुए हर इक कौर में मसालों की जुंबिश, वैसे तो मटर के ऐसे ही व्यंजन का फ्रांसीसी तर्जुमा 'Petits pois à la française' कहा जाता है, सच तो यह है कि इस नाश्ते की प्लेट में इन मटर (पीज) का मज़ा चखने के बाद जो सुकून मिला कि मानों ज़िंदगी का सारा 'पीस' (Peace) यहीं मिल गया हो!
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