भाई साहब ये छत्तीसगढी जिह्वा का सबसे उम्दा इम्तिहान होता है ,, गुजरी रात बचे भात के जसबात का समागम,, नवा चावुर आटा और पुरातन आचार का सरसों तेल एक साथ,,सादगी भरे जीरा ,, कटी हरी मिर्च और धनिया के साथ जिन्हें संग गूथ कर फदकाया जाता है हथेलियों की थपक,,, इसी चपटी किसम की रोटियों वास्ते शब्द आया चपाती या विलायती भाषा में कन्हे तो फ्लैट ब्रेड,,पर हमारी अंगाकर यहीं नहीं रुकती ,,उसकी सलवटों में ममता की उंगलियां छपी होती है,,मानो स्नेह की पंक्तियां हो,,अब बारी धुले हुए परसा या अंडा पत्ता की परतों की जो रोटी पर करीने से बिछा दी जाती है,,,, इटेलियन पिज़्ज़ा के माफिक अब इस कशीदाकारी को,,चूल्हे के अंगारों के हवाले सौंप दिया जाता है,,,और कुछ अंगार ऊपर कुछ नीचे,,ताकि फलसफा अधपका या अधूरा न रहे,, धीमी आंच में परसा का पसीना और अंगार का धुंगयाईं अंदाज जर्रे जर्रे में रच बस जाता है,, प्रतीक्षा भी एक परीक्षा होती है,,, खैर जब सुबह का खाली उदर गीतों में बात करे तब पहली खेप प्रकट होती है,,अंगार को हटा कर,,,,
वहीं किनारे जो पाताल मिर्चा भी भुने गए होते है वो चिमटे से निकलते है और सील बट्टे में हरी धनिया संग कुचरे जाते है,,ये डिप है या सालसा या फिर हमारी खालिस चटनी जो मानिये,, मां पत्तों और राख को झड़ा कर,,,रोटी को बीच से जब तोड़ती है,,तो धुंए के संग सभी स्वाद इंद्रिया सजग हो लेती है कांसे की थाली में एक ओर यह रोटी जिसकी ऊपरी परत जहींन कुरकुरी,, और भीतर गहराइयों में उतनी ही गुतूर,,साथ देने वास्ते फिर से वो आचारी तेल और चटनी,, मुग्ध होकर खाइये ,,और मंत्रमुग्ध हो जाइए,,,यह जलवा है पानपुरवा अंगाकर का,,,,वैसे इसे तवे में भी सेका जाता है पर वो अंगाकार क्या जो अंगार से न गुजरे
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