सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

गालिया


हो ख़ैर तो हर शख़्स को सम्मान देता हूँ,
गुस्ताख़ रहे कोई, उसे भी मक़ाम  देता हूँ।

ख़ामोश हूँ जब तक कोई  बदतमीज़ी, न हो
गर हो गई तो तेरी ,,?? कुनबे को नाम देता हु

अच्छा हूँ मगर इतना नहीं, कि गिरेबाँ धर लो,
मोहल्ले भर में तेरे पाजामे को टांग देता हूँ!

हम्माम में नंगे हैं सभी, फिर वहाँ क्यूं जाएँ?
भरी महफ़िल में ही सबको कलाम देता हूँ।

ये गुलुच, ये गालियाँ, 'अनुभव' की विरासत हैं,
जब जी करे, इनको तकिया-कलाम देता हूँ।

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