बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

जोशी जी की कहानी

टिहरी गढ़वाल की हिम चोटियों में एक रहा ,,भृगु पर्वत,,,बूढ़े वैद्य राम बिचारा जोशी,,,  पुराणिक कथा बाँचते,,,नौना ऋषि भृगु ने भगवान बिष्णु के छाती में लात दे धरी ,,,भृगु संहिता यंहा लिखी ,,,नौना सरकती रात के तारों में उलझते हिम शिखरों को घूरता ,,, जाड़े की हवा घाटियों के देवदार चीड़ के जंगलों से गुजरती हुई ऐसे चिचियाती जानो महादेव की भूत प्रेतों की बारात गुजर रही हो,,,जंगली गीदड़ दूर हुवा हुवा कर चेतावनी जारी कर रहे होते ,,तब खटिया में बचपन की आँखों में नीद उतर आती,,,
                       ओम की मां जल्द गुजर गई ,,रहे पिता तो सन्यासी होकर हरिद्वार जा बसे,,,बूढ़े वैद्य दादा के साथ ही बचपना गुजारा,,,, मेढ़े चराने झुंड लेकर बकरवालों के साथ हरियाते बुग्याल में पहाड़ी बचपना,,,, बालगंगा नदी माफिक चंचल साफ ,,,तेजी से बहता ,,,नदी सुनहरी महाशीर और ट्राउट मछलियों से भरी,,,, जाल में उछलती मछली,,,, सूखी लकड़ियों के ढेर पर पुडिय़ा से निकले मसालों से चुपड़ी भुनी जाती ,,कैसा जादुई स्वाद और महक एक ही होते है,,
        चौतारा गांव में स्कूल नहीं रहा,,,नीचे घाटी में जाना होता ,,आखिर 150 घरों के गांव में कोई सुविधा होगी ,,, तो बच्चों की टोलियां कतार बना कर पतली पगडंडियों से उतरती ,,जीतू बगड़वाल के गीत गाते,​सुणो सुणो, हे जीतू बगड़वाला!

बांसुरी बजै दे, खैट का धार मा।

, घाटियों के मुहानों से फिर जंगल लग लेते ,,,कितने घने ऊंचे ,,,गंभीर वृक्षों की कतारे,,,जिन से लग कर कस्तूरी वाला हिरण भी चरता,,, और उनकी तलाश में भटकता गुलदार ,,कई बार भेंट  हुई ,,इसी लिए हर हाथ झाड़ियों  से ठंडियां तोड़ लेते,,,पर मायने रखता पहाड़ी हौसला जो कन्हीं डिगेगा ,,, स्कूल की पढ़ाई तो ओम को जेल सी लगती वह खिड़की से भी दूर फैले पर्वतों को घूरता,,,जिनके ऊपर से श्वेत हंसों के झुंड गुजरते ,, चहकते,,,,वो बुरांश का मौसम था,,, अहा ,,,स्वर्ग के फूल,, सुर्ख लाल गुलाबी ,,,,पूरी घाटी को लाल ,,,, 
           जंगली काले तीतर और चित्तीदार कुछ छोटे बटेर के फांदें इन्हीं झाड़ियों पे बांधे जाते,,,,लजीज मीठा मांस पकता  ,,,सब दोस्त बांट लेते,,, वहीं खाओ ,,, 
पत्थर के छत वाली अब की भाषा में झोपड़ी कहे जाएगा ,,कुछ एक मकान थे,,,बिखरे हुए,,पतली गलियों में बच्चों का झुंड दौड़ता था,,,दादा चाहते ओम जड़ी बूटी पहचाने और कथा बांचे,,पर वो तो शहर से आने वाली बस की ओर हसरत से देखता,,,आखिर मैट्रिक पूरी हुई और शुरू हुआ पलायन,,,
              बॉम्बे में गढ़वाली बावर्ची कला सीखने का मौका हुआ,,,बचपन की शरारती मसालों की सीखे गए खुरदुरे अभ्यास ने अब सैफ कला की फनकारी का पारंगत रूप ले लिया,,कई प्रसिद्ध रेस्तरां समूहों में हुनर निखरा,,विदेश जाने की बारी भी लगी,,पर आखिर छत्तीसगढ़ के राजभवन के मुख्य बावर्ची की सरकारी जिम्मेदारी हासिल हुई ,,गांव और पहाड़िया तो कितनी दूर रह गई  ,,क्या वाकई ,,,बच्चे और महराजिन रोज कहानियां सुनते ,,,जो उन्हें भी अब कण्ठस्थ हो चली थी,,,क्या पापा कम से कम सौ बार सुना है,, ओम मुस्कराता पर कहानी पूरी जरूर करता,,,शहर की भरी हुई सड़कों और मरी हुई हवा में उन घाटियों के ख्वाब उसे आते जिसके खिले हुए बुरांश में बैठी खूबसूरत तितलियों के पीछे उसका बचपन दौड़ा था,,,रुई जैसी बरसती बर्फ की याद में उसने इन मैदानों की तथा कथित जाड़ों में शायद ही कभी ऊनी स्वेटर पहना हो,,,, रेस्तरां के ट्रेंड सैफ जिसे स्पेशल खुद का मसाला बताते,, ओम झट उसे पहचान लेता ,,पुरानी पहाड़ी बूटियां,,,राज्यपाल महोदय को उसके परोसे जायके से ज्यादा अचरज उसके वानस्पतिक ज्ञान पर करते,,, सर यह टिमरू है,,इसकी चटनी भी बनती है और छौंक भी लगता है,,,गजब
             

       

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