जीवन रहे सदा निरंतर
कभी मृदा होकर सो जाऊ
कभी लहर उफन बह जाऊ
कभी फूल कभी तितली सा बिखरू
कभी पतझड़ बन कर बिछ जाऊं
मुझे अहसास सा अमृत देकर
मिटा भी देना बना भी देना
मेधा देकर मानुष जना
पर अपना अस्तित्व गंवाया मैने
अब जब फिर रच जाऊंगा
विभग,,, वृक्ष सा स्मृति लेकर
तब सबके साथ चलूंगा
निर्भीक होकर निश्चिंत होकर
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें