बुधवार, 28 मई 2025

विनोद कुमार शुक्ल की शब्दावली में उनसे भेंट करना एक सरल, गहरी और कवित्वपूर्ण अनुभूति है। उनकी भाषा सहज है, मगर उसमें जीवन के गूढ़ सत्य छिपे होते हैं। यदि आप उनकी शैली में उनसे मिलने की कल्पना करें, तो शायद कुछ ऐसा होगा:  

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**"विनोद जी से भेंट**  

दरवाज़ा खुला था,  
मैंने अंदर झाँका—  
'आइए,' उन्होंने कहा,  
'बैठिए ज़मीन पर,  
कुर्सी तो है ही नहीं।'  

हाथ में चाय का प्याला,  
आँगन में धूप का टुकड़ा,  
बातें हो रही थीं  
किसी पेड़ के बारे में  
जो खिड़की से दिख रहा था।  

'क्या लिख रहे हैं अभी?' मैंने पूछा।  
उन्होंने काप पर लिखा हुआ एक शब्द दिखाया—  
'बारिश'  
फिर उसे काट दिया,  
'नहीं, यह नहीं,' वे बोले,  
'यह तो अभी होनी बाकी है।'  

चुप्पी में उनकी हँसी  
कमरे में गूँजी,  
जैसे कोई कविता  
अधूरी छोड़ दी गई हो  
ख़ुद ही अपने आप को याद दिलाने के लिए।"  

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विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं की तरह यह काल्पनिक भेंट सादगी में भी गहराई समेटे हुए है—जहाँ सामान्य चीज़ें असाधारण हो उठती हैं। उनकी कविताओं और उपन्यासों (जैसे *नौकर की कमीज़* या *दीवार में एक खिड़की रहती थी*) में यही भाष्य झलकता है।  

यदि आपको उनकी किसी खास रचना पर चर्चा करनी हो, तो बताइए!

सोमवार, 12 मई 2025

ji

इस दुनिया में आ ने के बाद क्या देखा मैने 
हमंम्मम,,
सुरज ,, चांद,,बादल ,, या डॉक्टर का चेहरा देखा मैने
कुछ भी याद नहीं,,बस मम्मी पापा का चेहरा देखा मैने

मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

शुक्ल जी

हाथी आगे निकलता जाता था,,हाथी की खाली जगह पीछे छूटती थी,,,कौतूहल ,, पाठक के रूप में ऐसा वाक्य विन्यास खलबला देती है,,, मायने खोजने की मशक्कत नहीं वो अपनी गहराइयों में बिंबों के साथ जम जाते हैं,,,शब्द बिंबों के साथ ऊंचाइयों तक चढ़ते है फिर इतनी गहराइयों पर उतार लाते हैं कि हर एक पन्ना पलटना एक नए अध्याय की शुरुवात लगता है,,ये है विनोद कुमार शुक्ल जी के सृजन का जादुई लोक,,जिससे हमारा परिचय भी वैसा ही जादुई था
                   2002 का यह वह दौर था जब  हिंदी साहित्य से जुड़ाव एक विषय से 

गुरुवार, 20 मार्च 2025

मेरी कविता

एहसासों की पंक्तियां
भावनाओं के छंद
नोंकझोंक के अलंकार
खामोशी के स्वर
खुशियों के बिम्ब 
दुखों का रस
तुम्हारी आंखों में 
रचती है मेरी कविता
जिस भाव पे मै विभोर रहता हु

बुधवार, 24 जुलाई 2024

दर्द हृदय का जब्त रहा खामोशी से
तूने ऐसे क्यों छेड़ा की बह निकला

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

सर दर्द का कोई है तो इलाज बताइए
गर्मी बढ़ गई है जनाब प्याज खाइए





बुधवार, 26 जुलाई 2023

मधुमेय के रसिया

मधुमेय के रसिया
औचक ही डॉक्टर अवाक अर्जुन की भांति ,,मरीज को घूरने लगा,, जानो उसने कुरुक्षेत्र के मैदान में विराट स्वरूप का विहंगम दर्शन कर लिया हों ,मेज के  ठीक सामने  अधरों पे मन्द मन्द मुस्कुराता मनो भारी मरीज विद्यमान था ,, ठीक केसव के भांति ,,,
   हे तात !!! आपकी रक्त वाहिनियों में शक्कर का गाढ़ा सीरा प्रवाहित हो रक्खा है,,ये रिपोर्ट कहती है,,,,कंही शरीर के बगलों में मधुमक्खियों ने छत्ता तो नही बना रखा है जरा देखिए,,,,मरीज अब भी मुस्कुरा रहा था,,मानो वो परीक्षा पूर्व ही रिजल्ट से परिचित हो,,,डॉक्टर साब नियमित दवाई तो खा ही रहा हु,,,सुबह की कब्ज से ही किसी तरह निपट कर ,,,,अनुपम उद्यान की तीन परिक्रमा ,,करेले के काढ़े के संग शामिल है,,,नियमित,,,अनजाने अनाजों के आटे में गुथी विचित्र चपातियां  मुर्दे सलाज़ के ढेर में लपेट कर ,,, कंठ से धकेलता हूं,,, एक चम्मच चावल संग,,,और फिर हर गुजरते घण्टे फूटती किस्मत संग फूटा चना ,,,आखिर ये शर्करा आता कन्हा से है ,,,,मरीज ने आधा मुह बंद कर प्राचीन गाली को निकलने के पहले ही फट से चबा लिया,,,
          पर डॉक्टर तक भावनाएं  सम्प्रेषित हो चुकी थी,,, कुछ घड़ी में  मती में लीन होकर ,,,समाधान निकला,, इन्सुलिन ,,बस अब यही चारा है,,,मानो मरीज भी इसी निष्कर्ष के साथ ही हॉस्पिटल की सीढ़ियां चढ़ा था,,इसलिए हुंह स्वर से समर्थन किया,, ये अंदर बैठे शरीर के ,,कलेजे गुर्दे भी जानते थे उन्होंने भी ढुंह करके दूसरी ध्वनि भीतर से छोड़ी,,,,,दवाई लिखते डॉक्टर को फिर कुछ छटपटाहट हुई,,, वैसे समोसे के संदर्भ में आपके क्या विचार हैं,,   
              मेज के उस पार वो मुख झट कटोरे भर लार से लबरेज हो गया,, झटकती हुई गरदन में से गटकते हुए,,वो गम्भीर होकर बोला,,,नही ,, कभी नही मैदे से तो मुझे एलर्जी है,,उफ्फ,तेल में डूबा हुआ वो पिरामिड ,,,ममी ही तो बनाएगा और क्या,,,उससे तो बेसन बेहतर है,,,चने की तासीर तेल की वसा को नेस्तानाबूद कर देती है वाट्स एप का मैसेज है फारवर्ड करूँ,,उसने मोबाइल उठा लिया,,, डॉक्टर की कलम प्रिस्क्रिप्शन में कंही अटक गई, नही जरूरत नही,,,फिर आलू गुंडे या  भजिये,,,  मरीज को डॉक्टर पर अपनी बातों का प्रभाव तत्काल दिखा,, उसने बेसन का जार खोल दिया,,,, आलू चाप ,,हगरु हॉटल के आपने खाये है कभी ,,,,अरे यंही अग्रसेन चौक पे,,,, गरमा गरम  चार बजे ही मिलते हैं,,, पीले बटरे और लाल फटाका चटनी संग,,,लार फिर भरती जा रही थी,,सर ट्राई कीजिए बस,,,पतली बेसन की परत ,,,खड़े धनिये की महक ,,,और हरी तली मिर्च,,,मतलब ऊपर जितने कुरकुरे ,,भीतर से उतने ही गुतुर,,, परसा पत्ता के दोना में सपेट के खाइये,,,कन्हे तो मंगाउ,,,,लखन ले आएगा अभी,,अपना ड्राइवर,,, 
       पता नही कैसे !!डॉक्टर साहब को बच्चन जी की पंक्तिया याद आ गई,, मेल कराती मधुशाला,,, मधुमेय के इस रोगी की दिनचर्या की परतें यदि और खोली जाती तो वो मेज भांति भांति के जायकों और उनके साथियों से भर जाती ,,लखन ले आता अरे वही ड्राइवर,,  ,,, इन्सुलिन में सहमति तो पहले ही बन चुकी थी,,, प्रिस्क्रिप्शन का उपसंहार था,,आलू गरिष्ठ होते है अतः चाप की बजाय भजिये पकोड़े ही बेहतर होंगे ,, पर सदा इन्सुलिन के साथ ,,,,

अनुभव