साहब बोले उल्लू हो
फिर पब्लिक बोली उल्लू हो
अब खुद लगाता है उल्लू हूं
जब दुनिया चूहों का घर है
तो,,उल्लू होना बेहतर है,,,
अनुभव
साहब बोले उल्लू हो
फिर पब्लिक बोली उल्लू हो
अब खुद लगाता है उल्लू हूं
जब दुनिया चूहों का घर है
तो,,उल्लू होना बेहतर है,,,
अनुभव
सन्तुलित और संयमित आहार,,,जीवन की दशा और दिशा तय करते है,,,भोजन की ऊर्जा से शरीर चलता है पर स्वाद की भूख इसे एक ऐसा गोडाउन बना देती है जिसमे हम वसा की परतें जमा करते जाते है,,जाहिर है भंडार गृह हुआ शरीर धीमा और मष्तिष्क मन्द होगा,,आज डिजिटल इंडिया के दौर में अब शरीर से डिजिटल स्फूर्ति की दरकार है केलोरी की काउंटिंग ही आपको समय के साथ भागने की शक्ति दे सकती है,,,,एक शहरी व्यक्ति 2200 केलोरी ऊर्जा से अधिक जो कुछ भी खाता है ,, वो भोजन उसे रोगों के अलावा और कुछ नही दे सकता,,, इसी ऊर्जा का मैनजमेंट ,,अब सबसे बड़ा मैनजमेंट है,, जो स्वच्छ भारत और स्वस्थ्य भारत के सपने को साकार करेगा
भट्टी किथें बत्ती ल
हाय दई,, बहिनी
किसे बुत्ता गेस ओ
मारे बग्ग बग्ग जरत रेहेस
यहा गर्मी में सिता गेस ओ
का करबे भट्टी ,,
देश हर बदलत हे
टट्टी खोली नई बनाय कि के
अधिकारी तको बदलत हे
अध्धि पौवा सकेल ले
लोकतंत्र भारी हे
ज्यादा झन मेच मेंचा
आज मोर ता ,,काली तोर बारी हे
अनुभव
योगी बनिस राजा,,ता
पलट दिस कहिनी
रोमियो किथें जूलियट ल
पावँ परत हो बहिनी,,,
जेन मजनू मुहब्बत
के दरिया सुखाय,,अब
शेक्सपियर के हीरो,,संग
उठक बैठक लगाय
कुँवारा मनखे के
इही रिथे बाय
हम निही पायन ता
कोनो नही पाय
अनुभव
गल्ली साफ़ हे नँल्ली साफ़ हे
अब जिल्ला मुंगेली साफ़ हे
जेकर घर के मोरी सुख गे
ते बिकट शर्मिंदा हे,,,,
फेर,,, शौचालय सब जिन्दा हे जिन्दा हे जिन्दा हे
अब आघु के चिंता हे चिंता है चिंता है
बाहिर नही जाना,,ममा
बनगे हे पैखाना ,,ममा
चघा अपन पैजामा ,,ममा
साफ़ सफई के जमाना ,,ममा,,,
अब ममा तको शर्मिंदा हे
फेर ,,,शौचालय सब जिन्दा हे,,,
अब आघु के चिंता है,,,,
उठो बबा अब आँखि खोलो
लोटा धरो,,शौचालय होलो,,
खेत कोती फिर जाना नही
गावँ के नाम डुबाना नही
बबा तको शर्मिंदा हे
स्वयम साक्छात,,,शिव शम्भू
चाचा ,,,प्रणाम
जय हो ,,,,चौक में समाधिस्थ चाचा की आवाज गूंज गई,, बुलेट के फ़टे सायलेंसर सी ,,हाथो का इशारा,,,जिसका सांकेतिक अर्थ था,,बैठो,, चूतिया कही के,,,दीवान चाचा जैसे पहुचे धर्मज्ञ के समक्छ पूरा मोहल्ला ही अज्ञान की लद्दी में लथपथ था,, सीधे कहे तो ,,चूतिया कंही के,,,
चाचा आपातकाल के दौर की छात्र राजनीति से छनी ,,बसियाई चायपत्ती थे,,जो अब धर्म और दर्शन की चाय में महक रही थी,,,चाय डबक
पड़ी,,, देखो !! सामने स्वयम साक्छात,,,प्रणाम करो,,मेरी नजर पड़ी,, समाने खड़े पूछ को खुले जबड़े से खुजाते कुत्ते पर ,,सोचा स्वान पूजा की कोई गुप्त तांत्रिक परम्परा होगी ,,तो हाथ जोड़ने में ही खैर है,, मोहल्ले में चाचा के प्रतिरोध पश्चात लोकप्रिय गलियों के उच्चारण और भयंकर चपाटे के किस्से कुख्यात थे,, इसलिए,,प्रणाम करना ही उचित था,,
,चाचा ने अपनी बोटराई आँखे तरेरी,,क्या,,मैं कौतुहल से भरा कुत्ते की ओर उन्मुख हुआ,,,बोले,,बेवकूफ,,उधर नही ,,वँहा,,,मन में प्रश्न उठा कहाँ,,, अबके सामने बने संडास को आँखे चली गई ,,लगा शायद स्वच्छ भारत अभियान की सफलता का अभिवादन करवा रहे हो,,चाचा फिर गुर्राए,,प्रणाम करो,,मैंने फिर प्रणाम किया,,,स्वयम साक्छात,,,चाचा श्लोक बुदबुदा रहे थे,,और ,,,प्रणाम करो,,पिछले आधे घण्टे मैं बीस पच्चीस मिस्गाइडेड प्रणाम फ़ेंक चुका था,,निशाने पर थे कल्लू का चाय ठेला ,,संडास के पीछे का बरगद या उसमें बैठा सफेद उल्लू और न जाने क्या क्या ,,फिर चाचा का श्लोक भी सिरा गया,,,,बोले ध्यान से देखो,, दिखे स्वयम साक्छात,,,
मैंने सर अचरज में हिला दिया,,चाचा गरजे ,,बेवकूफ नितो,,वो देखो सामने ,,इस बार इशारा सीधे आसमान की ओर था,,हशिऐ जैसा चाँद मुस्कुरा रहा था ,,वो क्या है,,मैंने कहा चाँद!!!! चाँद क्या ,,,मैंने कहा पृथ्वी का उपग्रह,,,अब चाचा बिफर गये ,,बेवकूफफ़फ़फ़फ़फ़ तुम्हारे विज्ञानं की तो,, उपगरह ,,, भोले बाबा के माथे में सजा दिव्य स्वरूप नही दिखाई देता,,स्वयम साक्छात,,,मुझे तत्काल ज्ञान प्राप्ति हुई,,और औचक ही चन्द्रमा के साथ प्रभु शंकर की हम दो हमारे दो फैमली ,,मय नंदी की कल्पना साकार हुई ,,,हाथ जोड़ कर फिर प्रणाम किया ,,ये प्रश्न ध्यान,,या विज्ञानं का नही अपितु शिव प्रसाद ""भांग"" का था,,जिसकी तीन चार गोलियां गटक कर ,,चाचा को महाशिव ने माथे में चाँद धरे दिव्य दर्शन दिये थे, ,,स्वयम साक्छात,,,,