वो पहली मुहब्बत थी याकि पहली बियर
जरा कहिए कैसे भूल जाए
गहरे कुएं सी प्यास थी जन्मों जनम की
और तेरी भूरी बोतल ,
,पसीने से लथपथ
लंगड़ी स्टूल पर तली फल्लियों के संग पेश हुई
वो कमबख्त खट्ट का शोर
ढक्कन उछल कर अरमानों को झकझोर गया
मग भी छुक सदका कर बैठा,,
सुनहरी धार जैसे सोने का लहू
बुलबुले ख्वाब के माफिक क्या कन्हू
फिर पहली चुस्की तबस्सुम सी,, होठों पे जा लगी
आय हाय,,,,,
जरा खट्टी जरा कड़वी
हलक को खुरदुराते गुजर ली जिस तमीज से
हर जर्रा हिल गया बवाल हुआ
कभी जो मदहोशी
हमने तो तेरी आंखों में कभी झांकी थी
आज फिर वही अहसास वही कमाल हुआ
दो मग हलाक हुए जन्नत जमी उतर आया
तेरे जस्बातो से शख्सियत का सवाल हुआ
या तू हकीकत है ,,या वो
खैर रहने दे ,,,तेरे जाने का गम